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महाराष्ट्र : 'रेंगेपार कोहली' गांव के 'एनर्जी मॉडल' का कमाल, यहां एलपीजी पर नहीं बनता खाना

भंडारा, 27 मार्च (आईएएनएस)। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के भंडारा जिले का 'रेंगेपार कोहली' गांव एलपीजी सिलेंडर की कमी में रोल मॉडल बनकर उभरा है। यहां के लोग 'बायो गैस' से आत्मनिर्भर बन रहे हैं। जहां एक ओर पूरे देश में एलपीजी सिलेंडर को लेकर चिंतित हैं। वहीं, भंडारा जिले के लखनी तालुका में 2,000 लोगों के रेंगेपार कोहली गांव में सिलेंडर की कोई चिंता नहीं है। गांव में सुचारू रूप से लगभग 200 से 225 बायो गैस प्लांट जारी हैं।
 
महाराष्ट्र : 'रेंगेपार कोहली' गांव के 'एनर्जी मॉडल' का कमाल, यहां एलपीजी पर नहीं बनता खाना

भंडारा, 27 मार्च (आईएएनएस)। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के भंडारा जिले का 'रेंगेपार कोहली' गांव एलपीजी सिलेंडर की कमी में रोल मॉडल बनकर उभरा है। यहां के लोग 'बायो गैस' से आत्मनिर्भर बन रहे हैं। जहां एक ओर पूरे देश में एलपीजी सिलेंडर को लेकर चिंतित हैं। वहीं, भंडारा जिले के लखनी तालुका में 2,000 लोगों के रेंगेपार कोहली गांव में सिलेंडर की कोई चिंता नहीं है। गांव में सुचारू रूप से लगभग 200 से 225 बायो गैस प्लांट जारी हैं।

भंडारा जिले के लखनी तालुका में 2,000 लोगों वाले इस गांव में एलपीजी सिलेंडर की कोई चिंता नहीं है। इस गांव में करीब 200 परिवारों के पास 'गोबर गैस' और 'बायो गैस' प्रोजेक्ट हैं। गांव के हर घर में दुधारू मवेशी हैं, उनके गोबर से गांव में गैस बन रही है। इस गांव ने दिखाया है कि पारंपरिक एनर्जी का इस्तेमाल हमें कैसे आत्मनिर्भर बना सकता है। रेंगेपार कोहली के इस 'एनर्जी मॉडल' की अब पूरे देश में चर्चा हो रही है।

रेंगेपार कोहली के सरपंच मनोहर बोरकर ने बताया कि 1987 में हमारे गांव में बायोगैस की एक योजना आई थी। उस समय लोगों को लगता था कि गोबर से भला गैस कैसे बन सकती है? जब इसकी शुरुआत हुई और 1987 के अंत तक लगभग 200 बायोगैस प्लांट तैयार हो गए, तो लोगों का नजरिया बदल गया।

उन्होंने बताया, "आज हमारे गांव में हर उस घर में बायोगैस की सुविधा है, जहां मवेशी और पर्याप्त जगह उपलब्ध है। गांव में लगभग 200 से 225 बायोगैस प्लांट सुचारू रूप से चल रहे हैं। आज जहां हर जगह रसोई गैस (एलपीजी) की किल्लत और बढ़ती कीमतों की चर्चा होती है, हमारे गांव रेंगेपार कोहली पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है। बायोगैस के माध्यम से हर परिवार का खाना आसानी से बन जाता है। इसके अलावा, हमारी ग्राम पंचायत ने सुबह 6 से 9 बजे तक पूरे गांव के लिए गर्म पानी की भी व्यवस्था की है।"

उन्होंने कहा, "जहां अन्य गांवों में लोग गैस सिलेंडरों के लिए लंबी लाइनों में खड़े रहते हैं, हमारे यहां ऐसी कोई समस्या नहीं है, क्योंकि हमारा बायोगैस सिस्टम बहुत मजबूत और टिकाऊ है। इससे न केवल ईंधन की बचत हो रही है, बल्कि परिवारों का गुजारा भी बेहतर तरीके से हो रहा है।"

भंडारा जिले के रहने वाले गोबरगैस प्रोजेक्ट होल्डर, देवदास रघुनाथजी लांजेवार ने बताया कि हमारे गांव में यह प्रोजेक्ट 1987 से चल रहा है। यह खाना बनाने में कभी फेल नहीं होता। हम रोज खाना बनाते हैं और बची हुई गैस से पानी गर्म भी करते हैं। मान लीजिए अगर हमारे परिवार में मेहमान आते हैं, तो हम मेहमानों के लिए पूरा खाना भी गोबर गैस पर बनाते हैं और हमारे यहां 5-6 जानवर हैं, हम उनके गोबर से गैस बनाते हैं और इस्तेमाल करते हैं।

गांव के रहने वाले बायोगैस प्रोजेक्ट होल्डर, ईश्वरदास बाबूराव हटवार ने बताया कि हमारे पास पुरानी व्यवस्था है, जो अभी भी चल रही थी। कुछ समय बाद, मवेशी कम होने की वजह से वह कम हो गई। इसके बाद बायोगैस स्कीम आई। हमने बायोगैस का इस्तेमाल किया।

उन्होंने कहा, "हम गैस सिलेंडर का इस्तेमाल नहीं करते हैं। हमारे पास यह बायोगैस प्लांट है। हमारा खाना बनाना वगैरह ठीक से हो जाता है। मुझे यह बायोगैस प्लांट बहू के नाम पर मिली है। मैं सरकार का शुक्रिया अदा करता हूं।"

--आईएएनएस

डीके/एबीएम