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मां आदि शक्ति भगवती को समर्पित शक्ति मंदिर, दिव्य त्रिशूल है मुख्य आकर्षण

देहरादून, 29 जुलाई (आईएएनएस)। उत्तराखंड की पावन धरा उत्तरकाशी में स्थित 'शक्ति मंदिर' अपनी आध्यात्मिक महत्व और अनूठी पौराणिक गाथा के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर में लगभग 6 मीटर (20 फीट) ऊंचा त्रिशूल इस स्थान का सबसे मुख्य आकर्षण है।
 

देहरादून, 29 जुलाई (आईएएनएस)। उत्तराखंड की पावन धरा उत्तरकाशी में स्थित 'शक्ति मंदिर' अपनी आध्यात्मिक महत्व और अनूठी पौराणिक गाथा के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर में लगभग 6 मीटर (20 फीट) ऊंचा त्रिशूल इस स्थान का सबसे मुख्य आकर्षण है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार को सोशल मीडिया के जरिए इसकी महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर वीडियो शेयर करते हुए लिखा, "उत्तरकाशी जिले में स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के अंदर बना 'शक्ति मंदिर' मां आदि शक्ति भगवती को समर्पित है। यह मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मंदिर में स्थापित प्राचीन और दिव्य त्रिशूल शक्ति, भक्ति और मां भगवती के स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ इसकी पूजा-अर्चना करते हैं।"

उन्होंने लिखा, "धार्मिक मान्यताओं और आध्यात्मिक वातावरण से भरपूर यह पवित्र स्थान हर भक्त को शांति और दिव्यता का अनुभव कराता है। यदि आप उत्तरकाशी जाएं, तो इस पवित्र शक्ति मंदिर के दर्शन अवश्य करें और मां भगवती का आशीर्वाद प्राप्त करें।"

मंदिर को लेकर गहरी आस्था है कि इसके अंदर मौजूद त्रिशूल को देवी दुर्गा ने अपने शक्ति स्वरूप से फेंका था, जिससे यह आज भी इस स्थान पर स्थिर है। लोहे और तांबे से बने इस प्राचीन त्रिशूल पर मौसम का कोई असर नहीं होता, जो इसे और भी रहस्यमयी और चमत्कारी बनाता है। बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर के ठीक सामने स्थित यह पावन मंदिर न केवल आस्था का बड़ा केंद्र है बल्कि उत्तरकाशी की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का एक जीवंत प्रतीक भी है।

इस त्रिशूल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जोर से बल लगाने पर यह बिल्कुल नहीं हिलता, लेकिन आस्था के साथ केवल एक उंगली से छूने पर यह हिलता हुआ महसूस होता है। मंदिर के कपाट साल भर खुले रहते हैं, और चारधाम यात्रा तथा नवरात्रि के दौरान यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है

स्कंद पुराण के केदारखंड में इस मंदिर का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि देवासुर संग्राम के दौरान माता दुर्गा (शक्ति) ने इसी त्रिशूल से असुरों का वध किया था, जिसके बाद इसे यहां स्थापित किया गया। इस शक्ति स्तंभ के गर्भगृह में अष्टधातु का एक गोलाकार कलश है, जिसे 13वीं शताब्दी में राजा गणेश द्वारा स्थापित किया गया था।

--आईएएनएस

एनएस/पीएम