Aapka Rajasthan

लोकनायक जयप्रकाश नारायण: संघर्ष से संपूर्ण क्रांति तक, सत्ता नहीं बदलाव की राजनीति को चुना

नई दिल्ली, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर लोकतंत्र की रक्षा के लिए चले आंदोलनों तक, जयप्रकाश नारायण का जीवन संघर्ष, त्याग और विचारों के प्रति अडिग रहने की मिसाल रहा। उन्होंने राजनीति को कभी व्यक्तिगत सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं माना, बल्कि समाज में व्यापक बदलाव का जरिया बनाया। यही वजह है कि देश उन्हें सम्मान के साथ ‘लोकनायक’ के नाम से याद करता है।
 

नई दिल्ली, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर लोकतंत्र की रक्षा के लिए चले आंदोलनों तक, जयप्रकाश नारायण का जीवन संघर्ष, त्याग और विचारों के प्रति अडिग रहने की मिसाल रहा। उन्होंने राजनीति को कभी व्यक्तिगत सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं माना, बल्कि समाज में व्यापक बदलाव का जरिया बनाया। यही वजह है कि देश उन्हें सम्मान के साथ ‘लोकनायक’ के नाम से याद करता है।

बिहार के सारण जिले के सिताब दियारा में जन्मे जयप्रकाश नारायण का बचपन सामान्य ग्रामीण परिवेश में बीता। महज नौ वर्ष की उम्र में वह गांव छोड़कर पढ़ाई के लिए पटना आ गए। कम उम्र में ही उनके भीतर देश और समाज को लेकर एक अलग तरह की बेचैनी दिखाई देने लगी थी।

साल 1920 में, जब उनकी उम्र करीब 18 वर्ष थी, उनका विवाह 14 वर्षीय प्रभावती से हुआ। इसी दौर में देश में स्वतंत्रता आंदोलन जोर पकड़ रहा था और जयप्रकाश भी उससे प्रभावित हुए। वर्ष 1919 के रॉलेट एक्ट के विरोध और असहयोग आंदोलन के प्रभाव ने उनके जीवन की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने का फैसला किया।

महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित जयप्रकाश नारायण स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़े विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय रहे। बाद में वह अपनी पत्नी प्रभावती को साबरमती आश्रम में छोड़कर उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए। अमेरिका में पढ़ाई के दौरान उनके सामने आर्थिक चुनौतियां थीं। अपनी शिक्षा और जीवन-यापन का खर्च निकालने के लिए उन्होंने खेतों में मजदूरी की, होटलों में बर्तन साफ किए और कई दूसरे छोटे-मोटे काम भी किए। लेकिन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने आत्मसम्मान और अपने उद्देश्य से समझौता नहीं किया।

अमेरिका से लौटने के बाद वर्ष 1929 में जयप्रकाश नारायण कांग्रेस में शामिल हुए। हालांकि, उनकी राजनीतिक सोच में समाजवादी विचारों की मजबूत छाप थी। कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने साथियों के साथ कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1952 में उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के गठन में भी योगदान दिया, लेकिन आजादी के बाद की राजनीति धीरे-धीरे उन्हें निराश करने लगी। उन्होंने महसूस किया कि सत्ता और राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव के बावजूद समाज की बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। इसी कारण उन्होंने सक्रिय दलीय राजनीति से खुद को दूर कर सामाजिक परिवर्तन और जन आंदोलनों पर अपना ध्यान केंद्रित किया।

वर्ष 1974 में जयप्रकाश नारायण एक बार फिर देश के राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में आए। बिहार में छात्रों ने भ्रष्टाचार, महंगाई और व्यवस्था में बदलाव को लेकर आंदोलन शुरू किया। जेपी ने इस आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया और यह आंदोलन आगे चलकर व्यापक जनआंदोलन में बदल गया। इसे ही देश में ‘जेपी आंदोलन’ के नाम से जाना गया।

5 जून 1974 को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया। उनका संदेश केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं था। वह सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक स्तर पर व्यापक परिवर्तन चाहते थे। उनका मानना था कि लोकतंत्र तभी सार्थक होगा, जब समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी निर्णय प्रक्रिया और सत्ता में सम्मानजनक स्थान मिले।

उनका प्रसिद्ध विचार था कि संपूर्ण क्रांति का उद्देश्य समाज के सबसे दबे-कुचले व्यक्ति को सत्ता के शिखर तक पहुंचाना है। उस दौर में गांधी मैदान से उठी आवाज ने देशभर में राजनीतिक चेतना को नई दिशा दी। ‘जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो’ जैसे नारों ने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी व्यापक संदेश दिया।

इमरजेंसी के दौर में जयप्रकाश नारायण ने लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के लिए मुखर आवाज उठाई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ उनका आंदोलन देशव्यापी राजनीतिक संघर्ष में बदल गया। जेपी की अपील पर विभिन्न विचारधाराओं और दलों के नेता एक मंच पर आए। बाद के वर्षों में इसी आंदोलन से निकले कई नेता भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।

जयप्रकाश नारायण के व्यक्तित्व की सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने सत्ता को अपने जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें देश के सर्वोच्च संवैधानिक और राजनीतिक पदों के प्रस्ताव मिले, लेकिन उन्होंने उन्हें स्वीकार करने के बजाय जनसेवा और सामाजिक परिवर्तन का रास्ता चुना।

समाजसेवा के क्षेत्र में उनके योगदान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। वर्ष 1965 में उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक परिवर्तन में उनके योगदान के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत वर्ष 1999 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।

8 अक्टूबर 1979 को जयप्रकाश नारायण का निधन हुआ। लेकिन उनका जीवन और ‘संपूर्ण क्रांति’ का विचार आज भी भारतीय लोकतंत्र की यात्रा में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने दिखाया कि बिना किसी पद पर रहे भी कोई व्यक्ति जनता की आवाज बन सकता है और सत्ता से बड़ा नैतिक प्रभाव पैदा कर सकता है।

यही कारण है कि हर वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए देश न केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी को श्रद्धांजलि देता है, बल्कि उस विचार को भी स्मरण करता है जिसमें राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं, बल्कि समाज का अंतिम व्यक्ति था।

--आईएएनएस

डीएससी