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यादों में कमलेश्वर: ‘नई कहानी’ के आधार स्तंभ, जो साहित्य को मानते थे समाज बदलने का हथियार

नई दिल्ली, 5 जनवरी (आईएएनएस)। हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर कमलेश्वर का नाम आते ही ‘नई कहानी’ आंदोलन के आधार स्तंभ की याद आती है। उनकी लेखनी सिर्फ कहानियों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फिल्म पटकथा और टेलीविजन के लिए भी शानदार लेखन किया। ‘नई कहानी’ और ‘समांतर कहानी’ जैसे आंदोलनों को दिशा देने वाले कमलेश्वर ने समाज की विसंगतियों को बेबाकी से उकेरा।
 
यादों में कमलेश्वर: ‘नई कहानी’ के आधार स्तंभ, जो साहित्य को मानते थे समाज बदलने का हथियार

नई दिल्ली, 5 जनवरी (आईएएनएस)। हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर कमलेश्वर का नाम आते ही ‘नई कहानी’ आंदोलन के आधार स्तंभ की याद आती है। उनकी लेखनी सिर्फ कहानियों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फिल्म पटकथा और टेलीविजन के लिए भी शानदार लेखन किया। ‘नई कहानी’ और ‘समांतर कहानी’ जैसे आंदोलनों को दिशा देने वाले कमलेश्वर ने समाज की विसंगतियों को बेबाकी से उकेरा।

हिंदी साहित्य में शानदार योगदान के लिए उन्हें साल 2003 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और साल 2005 में पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया। 6 जनवरी को शब्दों के जादूगर की जयंती है।

6 जनवरी 1932 को जन्मे कमलेश्वर को हिंदी साहित्य के सबसे प्रभावशाली लेखकों में गिना जाता है। कमलेश्वर हिंदी की ‘नई कहानी’ आंदोलन के प्रमुख आधार स्तंभ थे। उन्होंने इस आंदोलन का ढांचा गढ़ा और बाद में मोहन राकेश और राजेंद्र यादव उनके साझेदार बने। इन तीनों की तिकड़ी ने हिंदी कथा साहित्य की दिशा ही बदल दी।

कमलेश्वर की चर्चित कहानियां जैसे ‘राजा निरबंसिया’, ‘कस्बे का आदमी’, ‘जार्ज पंचम की नाक’, ‘मांस का दरिया’ और ‘नागमणि’ ने नई कहानी के युग की शुरुआत की। इन कहानियों में समाज की विसंगतियों, मध्यवर्गीय जीवन और मानवीय संवेदनाओं को बेबाकी से उकेरा गया। कमलेश्वर की एक और बड़ी देन ‘समांतर कहानी’ आंदोलन है, जिसकी शुरुआत 1972-74 में हुई।

कमलेश्वर का मानना था, "‘समांतर कहानी’ आम आदमी की जिंदगी के समांतर चलने वाली सार्थक कहानियां हैं। समांतर कहानी में व्यक्ति को टुकड़ों में नहीं, संपूर्ण रूप में देखा गया और उसकी पूरी लड़ाई को दिशा देने का प्रयास किया गया।"

भीष्म साहनी, शैलेश मटियानी, और राजेंद्र यादव जैसे लेखक इस आंदोलन से जुड़े। कमलेश्वर ने ‘सारिका’ पत्रिका के माध्यम से समांतर कहानी पर तीन विशेषांक भी निकाले। साल 1967 में ‘सारिका’ का संपादन संभालने के बाद कमलेश्वर ने इसे नई कहानी का वैचारिक मंच बनाया। उन्होंने ‘प्रेत बोलते हैं’ जैसे तीखे संपादकीय लिखकर पुराने विचारों और आलोचकों का मुंहतोड़ जवाब दिया।

यही नहीं, जब हिंदी कहानी में अश्लीलता और सेक्स-कुंठा का दौर आया, तो कमलेश्वर ने कलम को पकड़ा और ‘धर्मयुग’ में तीन किस्तों में प्रकाशित ‘अय्याश प्रेतों का विद्रोह’ लेख से इस प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना की।

कमलेश्वर आंचलिक कहानियों को भी हमेशा महत्व देते थे। उनका मानना था कि आंचलिक कहानियों में बाजारवाद का जवाब और वैश्विक प्रतिरोध का स्वर मौजूद है। साहित्य के अलावा कमलेश्वर ने पत्रकारिता और दूरदर्शन में अतिरिक्त महानिदेशक का पद संभाला और ‘सारा आकाश’, ‘मिस्टर नटवरलाल’, ‘द बर्निंग ट्रेन' समेत 100 से ज्यादा फिल्मों की पटकथा लिखी।

कमलेश्वर साहित्य को समाज बदलने का हथियार मानते थे। उनके शब्दों में, “कहानी जिंदगी को बदल तो नहीं सकती, लेकिन विचार के ऐसे बिंदु तक जरूर ले जाती है, जहां पाठक की सोच में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कहानी जनतांत्रिक मूल्यों की साझी विरासत है।”

कमलेश्वर मानते थे कि अभिव्यक्त करने के लिए कलम और सादा कागज काफी है। इसी के परिणामस्वरूप उन्होंने 12 उपन्यास, 17 कहानी संग्रह और 300 से अधिक कहानियां लिखीं। उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।

--आईएएनएस

एमटी/डीकेपी