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कदावुल मंदिर: भारत से 7 हजार मील दूर घने जंगलों में अनोखे रूप में विराजे हैं भगवान शिव; नटराज अवतार को समर्पित है मंदिर

नई दिल्ली, 21 अप्रैल (आईएएनएस)। देशभर में भगवान शिव को समर्पित मंदिर हैं, जिनका अपना-अपना इतिहास है। देश में बारह ज्योतिर्लिंगों की मान्यता बहुत है, जिन्हें स्वयं भगवान शिव का जीवांत और चमत्कारी रूप माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत की सीमा के पार भी ऐसा शिव मंदिर मौजूद है, जहां खुद भोलेबाबा जंगल की रक्षा करते हैं।
 
कदावुल मंदिर: भारत से 7 हजार मील दूर घने जंगलों में अनोखे रूप में विराजे हैं भगवान शिव; नटराज अवतार को समर्पित है मंदिर

नई दिल्ली, 21 अप्रैल (आईएएनएस)। देशभर में भगवान शिव को समर्पित मंदिर हैं, जिनका अपना-अपना इतिहास है। देश में बारह ज्योतिर्लिंगों की मान्यता बहुत है, जिन्हें स्वयं भगवान शिव का जीवांत और चमत्कारी रूप माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत की सीमा के पार भी ऐसा शिव मंदिर मौजूद है, जहां खुद भोलेबाबा जंगल की रक्षा करते हैं।

यह मंदिर भारत से सात हजार मील से अधिक दूरी पर अमेरिका के हवाई राज्य के काउई द्वीप के जंगलों में स्थापित है।

काउई द्वीप संयुक्त राज्य अमेरिका के हवाई राज्य का सबसे पुराना और चौथा सबसे बड़ा द्वीप है, जहाँ के घने जंगलों के भीतर कदावुल मंदिर स्थापित है। माना जाता है कि मंदिर के आस-पास एक तेज ऊर्जा का प्रवाह महसूस होता है, जो वहां दर्शन करने वाले भक्तों को महसूस होता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह ऊर्जा भगवान शिव की है, जो हमेशा मंदिर के भीतर निवास करती है और शिव भक्तों को महसूस होती है।

कदावुल मंदिर आस्था के साथ-साथ खूबसूरती का भी प्रतीक है। मंदिर के भीतर बहुत खूबसूरत पेड़-पौधे हैं, और भगवान शिव के अलावा मंदिर के भीतर मां पार्वती, नंदी महाराज, मुरुगन, और गणेष भगवान की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। मंदिर के भीतर पानी का एक बड़ा कुंड भी है, जिसमें निरंतर पानी भरा रहता है। मंदिर के बनाव में श्री लंकाई शैली देखने को मिलती है। मंदिर के शंभों पर बने चित्र भारतीय परंपरा से बिल्कुल अलग हैं।

बात अगर मंदिर के गर्भगृह की करें तो मंदिर के भीतर 700 पाउंड वजनी और 3 फुट के स्वयंभू स्फटिक के शिवलिंग मौजूद हैं और एक विशाल भगवान शिव नटराज के रूप की प्रतिमा भी विराजमान हैं। आमतौर पर मंदिर में पत्थर के बने शिवलिंग की पूजने की प्रथा सदियों से चली आई लेकिन काउई द्वीप पर बने इस मंदिर में स्फटिक के पारदर्शी शिवलिंग की पूजा रोजाना की जाती है।

इसके साथ ही गर्भगृह के सामने लावा चट्टान और रेडवुड की लकड़ी से बना एक मंडप है, जिसमें 32,000 पाउंड वजन की एक ही पत्थर से तराशी गई नंदी की प्रतिमा स्थापित है। बताया जाता है कि मंदिर की स्थापना सतगुरु शिवाय सुब्रमण्यस्वामी ने 1973 में की थी। यह मंदिर भगवान शिव के नटराज रूप को समर्पित है।

ध्यान रखने वाली बात यह है कि मंदिर में दर्शन का समय सुबह 9 बजे से लेकर दोपहर के 12 बजे तक रहता है। 12 बजे के बाद श्रद्धालुओं को मंदिर में दर्शन करने की मनाही है।

--आईएएनएस

पीएस/पीएम