झारखंडः भोगनाडीह के बूढ़े बरगद तले फिर जीवंत होंगी 171 साल पुरानी हूल क्रांति की यादें, सिदो-कान्हू को किया जाएगा नमन
साहिबगंज, 29 जून (आईएएनएस)। झारखंड के साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गांव में पचकठिया का विशाल बूढ़ा बरगद यूं तो खामोश रहता है, लेकिन हर वर्ष 30 जून को जब इसकी छांव तले हजारों लोग जुटते हैं, तो इसकी शाखाओं से 171 वर्ष पुरानी उस जनक्रांति की गूंज फिर सुनाई देने लगती है, जिसने संथाल परगना से लेकर बंगाल के बड़े भूभाग तक अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी।
इसी ऐतिहासिक स्थल से 30 जून 1855 को सिदो, कान्हू, चांद, भैरव, फूलो और झानो के नेतृत्व में 'संथाल हूल' का बिगुल फूंका गया था, जिसे जनजातीय इतिहास के अनेक अध्येता भारत का पहला संगठित स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं। इस वर्ष भी मंगलवार को यहां राज्य के कोने-कोने से हजारों लोग बलिदानी जनजातीय नायकों को याद करने जुटेंगे।
राजकीय स्तर पर भी यहां बड़ा कार्यक्रम होगा। झारखंड में हूल दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि स्वाभिमान, प्रतिरोध और जनअस्मिता के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक माना जाता है।
भोगनाडीह के साथ-साथ पूरे राज्य में कई कार्यक्रम आयोजित होते हैं। भारतीय इतिहास की मुख्यधारा में 1857 के विद्रोह को लंबे समय तक प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में दर्ज किया गया, लेकिन जनजातीय इतिहास के शोधकर्ताओं का मानना है कि उससे दो वर्ष पहले भोगनाडीह से शुरू हुआ संथाल हूल अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ पहला व्यापक और संगठित जनयुद्ध था।
उनका कहना है कि यह कोई स्वतःस्फूर्त विद्रोह नहीं, बल्कि स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य, रणनीति और संगठन के साथ शुरू किया गया आंदोलन था। रांची स्थित रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान के सेवानिवृत्त निदेशक और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रणेंद्र बताते हैं कि संथाल हूल का उल्लेख राजनीतिक दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने भी अपनी चर्चित रचना 'नोट्स ऑन इंडियन हिस्ट्री' में किया है। उस दौर में लंदन से प्रकाशित कई अखबारों ने भी इस जनविद्रोह पर विस्तार से रिपोर्टें प्रकाशित की थीं, जिनके माध्यम से दुनिया को आदिवासियों के इस संघर्ष की जानकारी मिली।
इतिहासकारों के अनुसार, सिदो और कान्हू मुर्मु मुर्मू ने अपने भाइयों चांद और भैरव तथा बहनों फूलो और झानो के साथ मिलकर भोगनाडीह में करीब 20 हजार लोगों की सभा बुलाई थी। इसी सभा में अंग्रेजी शासन को क्षेत्र छोड़ने का खुला संदेश दिया गया। इसके बाद संथालों और स्थानीय समुदायों ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष शुरू किया। तीर-धनुष, फरसा और पारंपरिक हथियारों से लैस विद्रोहियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की आधुनिक हथियारों से सुसज्जित सेना को कई मोर्चों पर कड़ी चुनौती दी। 16 जुलाई 1855 को पीरपैंती और 21 जुलाई को वीरभूम में अंग्रेजी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
झारखंड इनसाइक्लोपीडिया के लेखक सुधीर पाल शोध दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताते हैं कि हूल आंदोलन के लिए सैन्य टुकड़ियां, गुप्तचर तंत्र, रसद व्यवस्था और प्रचार दल तक गठित किए गए थे। उनके अनुसार यह आंदोलन केवल संथाल समुदाय तक सीमित नहीं था, बल्कि पहाड़िया, अहीर, लोहार और अन्य स्थानीय समुदाय भी इसमें शामिल हुए थे।
लगभग 52 गांवों के 50 हजार से अधिक लोगों ने इस संघर्ष में प्रत्यक्ष भागीदारी की, जबकि एक वर्ष से अधिक समय तक चले अभियान में दस हजार से ज्यादा लोग शहीद हुए। विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई की। संघर्ष के दौरान चांद और भैरव शहीद हो गए।
बाद में सिदो और कान्हू को गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई। सिदो को पचकठिया के उसी बरगद पर फांसी दी गई, जो आज भी इस इतिहास का मौन साक्षी है, जबकि कान्हू को भोगनाडीह में फांसी पर चढ़ाया गया। वर्ष 2002 में भारत सरकार ने सिदो-कान्हू की स्मृति में डाक टिकट जारी किया था। इसके बावजूद जनजातीय समाज और इतिहासकारों का मानना है कि संथाल हूल को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अब भी वह स्थान नहीं मिल पाया है, जिसका वह वास्तविक हकदार है।
--आईएएनएस
एसएनसी/वीसी
