जम्मू-कश्मीर में रिजर्वेशन फाइल एलजी ऑफिस में अटकी, सरकार यूटी मॉडल की चुनौतियों में काम कर रही है: इमरान नबी डार
श्रीनगर, 21 अक्टूबर (आईएएनएस)। नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने यूटी मॉडल और नौकरशाही के दबदबे को जम्मू-कश्मीर सरकार के कामकाज में सबसे बड़ी बाधा बताया है। उन्होंने आरक्षण और दैनिक वेतनभोगियों के दो अहम मुद्दों पर प्रशासन को घेरा है। डार ने कहा कि आरक्षण पर बनी सब-कमेटी ने तय समयसीमा में अपनी रिपोर्ट और सिफारिशें सरकार को सौंप दीं, लेकिन तमाम आपत्तियों का निराकरण कर भेजे जाने के बावजूद फाइल अब एलजी दफ्तर में अटकी हुई है।
वहीं 20-25 साल से सेवाएं दे रहे डेली वेजर्स के भविष्य को लेकर मुख्य सचिव की ओर से मांगा गया छह महीने का समय एक साल में बदल चुका है, फिर भी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है, जिससे हजारों कर्मचारियों का भविष्य अधर में है।
इमरान नबी डार ने कहा कि सरकार कई चुनौतियों के बीच काम कर रही है। जम्मू-कश्मीर में केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) का मौजूदा मॉडल और सरकारी दफ्तरों में नौकरशाही का प्रभाव कामकाज में दिक्कत पैदा कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस समय आरक्षण और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों (डेली वेजर्स) से जुड़े मुद्दे सबसे महत्वपूर्ण हैं। आरक्षण के मामले को हल करने के लिए सरकार ने एक उप समिति (सब-कमेटी) बनाई है।
उन्होंने कहा कि छह महीने का समय दिया गया था और उस सब-कमेटी ने छह महीने में अपना काम पूरा करके दिया। जो सिफारिशें देनी थीं, वे संबंधित कार्यालयों में गईं। उसके बाद वहां से जो चिंताएं आईं, उन्हें हमने संबोधित करके वापस भेज दिया। अब दुर्भाग्यवश वह फाइल एलजी ऑफिस में पड़ी हुई है और लोग हमसे सवाल कर रहे हैं। मैं आपके जरिए वली साहब से भी गुजारिश करना चाहता हूं कि रिजर्वेशन की जो फाइल पड़ी हुई है, उसे जल्द से जल्द मंजिल तक पहुंचाया जाए और संबंधित कार्यालयों में भेजा जाए।
इमरान नबी ने कहा कि दूसरा, डेली वेजर्स का मुद्दा है। यह बहुत पुरानी मांग है और हम चाहते हैं कि इस मुद्दे को जल्द से जल्द संबोधित किया जाए, क्योंकि इसमें जो लोग शामिल हैं, वे लगभग रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच गए हैं। 20-25 साल से काम कर रहे हैं। चीफ सेक्रेटरी ने छह महीने का समय लिया था। छह महीने भी हो गए, एक साल होने को आया और अभी तक वह रिपोर्ट सामने नहीं आई।
उन्होंने कहा कि हम चीफ सेक्रेटरी से भी गुजारिश करते हैं कि उस रिपोर्ट को जल्द से जल्द सार्वजनिक किया जाए और सिफारिशों के लिए उमर अब्दुल्ला की सरकार को भेजा जाए, ताकि जो हमने लोगों से वादे किए हैं, वे पूरे हो सकें।
उन्होंने कहा कि कई मुद्दे हैं, जैसे विशेष राज्य के दर्जे और अन्य प्रस्तावों से जुड़े मामले। उन्होंने बताया कि सरकार राज्य का दर्जा (स्टेटहुड) बहाल करने का प्रस्ताव लाई थी, जिसे बीजेपी को छोड़कर सभी दलों का समर्थन मिला। साथ ही फॉरेस्ट राइट्स एक्ट लागू किया गया, दरबार मूव की व्यवस्था वापस लाई गई और पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) को फिर से शुरू किया गया।
इमरान नबी ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो पहले एमएलए का सीडीएफ डेढ़ करोड़ होता था, उसे उमर साहब के आग्रह और उनकी मंजूरी के बाद चार करोड़ किया गया। हाल ही में यह भी तय किया गया कि कोई माननीय एमएलए हार्ट पेशेंट्स, सीकेडी पेशेंट्स या अग्निकांड पीड़ितों के लिए भी अपना सीडीएफ इस्तेमाल कर सकता है। प्राइवेट यूनिवर्सिटी बिल, जो बहुत पुरानी मांग थी, उसे लाया गया। मैरिज असिस्टेंस को 50 हजार से बढ़ाकर 75 हजार किया गया। हमारी माताओं और बहनों के लिए फ्री बस सर्विस को आगे बढ़ाया गया। दिव्यांग लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।
उन्होंने कहा कि जहां तक वंचित परिवारों की बात है, वहां अभी और काम करने की जरूरत है। फिलहाल ऐसे परिवारों को 6 सिलेंडर, मुफ्त राशन और 200 यूनिट मुफ्त बिजली मिल रही है। इस पर और काम करने की जरूरत है। हमारा मैनिफेस्टो 5 साल के लिए बना हुआ है। सिर्फ दो साल में तमाम चुनौतियों के बावजूद हमने यह सब किया है। यह सरकार कोशिश कर रही है कि लोगों से किए गए वादों को आगे कैसे पूरा किया जाए।
एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि जेकेएनसी के प्रवक्ता ने कहा कि दुर्भाग्यवश आपने यह मुद्दा दिलाया। हमारे प्रतिनिधि गृह मंत्री से मिले थे। अब उसको भी एक साल हो गया है। उन्होंने कहा था कि हम बिजनेस रूल्स लाएंगे, जो जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम का हिस्सा हैं लेकिन उन बिजनेस रूल्स को भी अभी तक लागू नहीं किया गया है।
कहीं न कहीं ऐसा लग रहा है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को सजा दी जा रही है। मुझे नहीं पता कि हमारी खता क्या है। क्या हमारी खता यह है कि यहां जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस को बहुमत मिला? क्या हमारी खता यह है कि हम एक मुस्लिम बहुल राज्य हैं?
इमरान नबी ने कहा कि ये सभी बातें भारत सरकार को अपने स्तर पर समझनी होंगी कि हम भी इस देश का हिस्सा हैं। यहां के लोग भी अधिकार रखते हैं। यहां भी कई मसले हैं, जिन्हें संबोधित करने की जरूरत है।
--आईएएनएस
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