जम्मू-कश्मीर को मिले राज्य का दर्जा, जौहर यूनिवर्सिटी पर बुलडोजर न चले: मौलाना शहाबुद्दीन रजवी
बरेली, 22 जुलाई (आईएएनएस)। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने, रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी पर प्रस्तावित कार्रवाई और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होने के बाद राज्य का दर्जा बहाल किया जाना चाहिए। साथ ही, उन्होंने यूसीसी के मसौदे पर सवाल उठाते हुए इसे संविधान की भावना के विपरीत बताया।
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में काफी हद तक शांति स्थापित हुई है और आतंकवादी गतिविधियों पर नियंत्रण हुआ है। विकास कार्यों में भी तेजी आई है और हालात पहले की तुलना में सामान्य हुए हैं। राजनीतिक दल लंबे समय से जम्मू-कश्मीर को दोबारा राज्य का दर्जा देने की मांग करते रहे हैं। वह स्वयं भी इस मांग का समर्थन करते हैं। जब केंद्र सरकार ने आर्टिकल 370 हटाया था, तब यह भी कहा गया था कि परिस्थितियां सामान्य होने पर जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा दिया जाएगा। इसलिए अब जब हालात सामान्य बताए जा रहे हैं और विकास के दावे किए जा रहे हैं, तो राज्य का दर्जा बहाल करने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।
रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी पर प्रस्तावित बुलडोजर कार्रवाई को लेकर मौलाना रजवी ने कहा कि यह विश्वविद्यालय स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर स्थापित है, जिन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने महात्मा गांधी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी और लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन के दौरान ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रभावशाली ढंग से भारत का पक्ष रखा था। उनके निधन के बाद उन्हें फिलिस्तीन के बैतुल मुकद्दस (यरुशलम) स्थित मस्जिद अल-अक्सा परिसर में दफनाया गया।
रजवी ने कहा कि यदि विश्वविद्यालय का निर्माण आजम खान ने कराया है और यदि उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो रही है, तो उसकी सजा विश्वविद्यालय या शिक्षा व्यवस्था को नहीं मिलनी चाहिए। एक स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर स्थापित संस्था को नुकसान पहुंचाना उचित नहीं होगा।
समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा कि मध्य प्रदेश विधानसभा में पारित मसौदे पर कई गंभीर सवाल हैं। एक ही समिति की अध्यक्ष द्वारा उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार किया जाना विचारणीय है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि अनुसूचित जनजातियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा गया है, तो फिर यह समान नागरिक संहिता कैसे कही जा सकती है। यदि सभी नागरिक समान हैं, तो सभी समुदायों पर एक समान कानून लागू होना चाहिए।
मौलाना रजवी ने आरोप लगाया कि यूसीसी का मसौदा तैयार करने से पहले विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समुदायों से व्यापक स्तर पर राय-मशविरा नहीं किया गया। संविधान की भावना यह है कि ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर सभी संबंधित पक्षों से चर्चा की जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केवल समान विचारधारा वाले लोगों से सलाह लेकर कानून तैयार करना उचित प्रक्रिया नहीं है। यह संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है। मेरी राय में समान नागरिक संहिता का उद्देश्य मुस्लिम पर्सनल लॉ और शरीयत में हस्तक्षेप करना है। देश का मुस्लिम समाज कानून का सम्मान करता है, संविधान का पालन करता है और देश से प्रेम करता है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के विपरीत किसी कानून को स्वीकार करना उनके लिए कठिन होगा। इस विषय पर सरकार को सभी समुदायों से संवाद स्थापित करना चाहिए ताकि किसी भी वर्ग में असंतोष की स्थिति उत्पन्न न हो।
--आईएएनएस
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