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जमीयत उलमा-ए-हिंद की मजलिस-ए-मुन्तजिमा का वार्षिक अधिवेशन शुरू

नूह (मेवात), 30 अक्टूबर (आईएएनएस)। जमीयत उलमा-ए-हिंद की मजलिस-ए-मुन्तजिमा का वार्षिक अधिवेशन शुक्रवार को मेवात के डीएलएफ स्प्रिंगफील्ड, सहसौला पट्टी, पीपाका, जिला नूह (हरियाणा) में अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी द्वारा ध्वजारोहण के साथ शुरू हुआ। अधिवेशन में देशभर से लगभग दो हजार सदस्य, प्रमुख हस्तियां और प्रसिद्ध उलमा भाग ले रहे हैं।
 

नूह (मेवात), 30 अक्टूबर (आईएएनएस)। जमीयत उलमा-ए-हिंद की मजलिस-ए-मुन्तजिमा का वार्षिक अधिवेशन शुक्रवार को मेवात के डीएलएफ स्प्रिंगफील्ड, सहसौला पट्टी, पीपाका, जिला नूह (हरियाणा) में अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी द्वारा ध्वजारोहण के साथ शुरू हुआ। अधिवेशन में देशभर से लगभग दो हजार सदस्य, प्रमुख हस्तियां और प्रसिद्ध उलमा भाग ले रहे हैं।

अधिवेशन के प्रारंभिक सत्र में इस्लामी मदरसों के संरक्षण, देशभर में मस्जिदों, ईदगाहों और अन्य इस्लामी धार्मिक स्थलों के विरुद्ध की जा रही ध्वस्तीकरण की कार्रवाइयों पर रोक तथा समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। इस अवसर पर जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने अपने संक्षिप्त संबोधन में मुसलमानों के वर्तमान हालात पर भी प्रकाश डाला। उनका विस्तृत संबोधन बाद में होगा।

पारित प्रस्तावों में मदरसों को मान्यता और जांच के नाम पर परेशान करने, उनके विरुद्ध निराधार प्रचार करने तथा अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को विवादों में घसीटने की कोशिशों पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। भारत सरकार और संबंधित कानूनी संस्थाओं से मांग की गई कि ऐसी कार्रवाइयों को तत्काल बंद किया जाए और भारतीय संविधान के अंतर्गत मदरसों को प्राप्त अधिकारों एवं संरक्षण की गारंटी सुनिश्चित की जाए।

अधिवेशन ने मदरसों के जिम्मेदारों को भी ध्यान दिलाया कि वे अपने संस्थानों की भूमि संबंधी दस्तावेज, स्वीकृत नक्शे, छात्रावासों में रहने वाले विद्यार्थियों के पहचान संबंधी विवरण तथा वित्तीय खातों का ऑडिट पूरी पारदर्शिता के साथ तैयार करके सुरक्षित रखें।

मस्जिदों और अन्य इस्लामी धार्मिक स्थलों के संरक्षण से संबंधित दूसरे प्रस्ताव में देशभर में मस्जिदों, ईदगाहों, दरगाहों और अन्य धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया कि मस्जिदें केवल इमारतें नहीं हैं, बल्कि मुसलमानों की आस्था, सामूहिक पहचान और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 के अंतर्गत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता की व्यावहारिक अभिव्यक्ति हैं।

प्लेसेज ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजन्स) एक्ट, 1991 के महत्व पर जोर देते हुए कहा गया कि इस कानून का मूल उद्देश्य धार्मिक स्थलों की धार्मिक स्थिति को यथावत बनाए रखना और ऐतिहासिक विवादों को दोबारा खोलने से रोकना है। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या फैसले में भी इस कानून को संविधान के मूल धर्मनिरपेक्ष ढाँचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है।

अधीनस्थ अदालतों द्वारा इस कानून की भावना की अनदेखी करते हुए धार्मिक स्थलों के सर्वेक्षण के आदेश जारी किए जाने पर चिंता व्यक्त की गई। इस संबंध में संभल की ऐतिहासिक जामा मस्जिद का उल्लेख करते हुए कहा गया कि एकतरफा सर्वेक्षण के आदेश के बाद पैदा हुई स्थिति ने शांति और कानून-व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया।

मजलिस-ए-मुन्तजिमा ने भारत सरकार और उच्च न्यायपालिका से मांग की कि सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर 2024 के अंतरिम आदेश का पूरी तरह पालन सुनिश्चित किया जाए तथा 1991 के प्लेसेज़ ऑफ वर्शिप एक्ट के विपरीत नए दावों को प्रारंभिक चरण में ही खारिज किया जाए।

इसी प्रकार नगरपालिका, राजस्व और विकास प्राधिकरणों द्वारा उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए बिना तथा प्रभावित पक्ष को अपना पक्ष रखने का न्यायसंगत अवसर दिए बिना मस्जिदों को ध्वस्त करने की कार्रवाइयों पर रोक लगाई जाए। कानून का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए।

अधिवेशन का एक महत्वपूर्ण निर्णय यह है कि जमीयत उलमा-ए-हिंद की सभी प्रांतीय, जिला और तहसील इकाइयां केंद्रीय जमीयत द्वारा निर्धारित एक ही तारीख और समय पर अपने-अपने संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन सौंपेंगी।

इसके साथ ही जमीयत की सभी इकाइयों को निर्देश दिया गया कि वे मस्जिदों की प्रबंध समितियों की सहायता करते हुए मस्जिदों की भूमि, खसरा-खतौनी के अभिलेख, नगरपालिका करों तथा अन्य कानूनी दस्तावेजों की जाँच और उन्हें दुरुस्त कराने का काम आगामी छह महीनों में पूरा कराएं।

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से संबंधित प्रस्ताव में इस कानून को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए इसे अपने स्वरूप में ही भेदभावपूर्ण बताया गया।

मस्जिदों के संरक्षण से संबंधित प्रस्ताव मौलाना प्रोफेसर नोमान शाहजहांपुरी, उपाध्यक्ष जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश ने पेश किया। इसका समर्थन मास्टर एहसान इलाही, महासचिव जमीयत उलमा उत्तराखंड तथा मुफ्ती जमीलुर्रहमान, महासचिव जमीयत उलमा पूर्वी उत्तर प्रदेश जोन ने किया।

मदरसों से संबंधित प्रस्ताव मौलाना शम्सुद्दीन बजली ने पेश किया, जिसका समर्थन मुफ्ती अब्दुल कवी, अध्यक्ष दीन तालीमी बोर्ड जमीयत उलमा तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश ने किया। यूसीसी पर प्रस्ताव मौलाना अब्दुल वाहिद खत्री, महासचिव जमीयत उलमा राजस्थान ने पेश किया। इसका समर्थन मौलाना इस्लामुल हक असजद, अध्यक्ष जमीयत उलमा मध्य उत्तर प्रदेश, मौलाना महमूद हसन खैरवा, सदस्य शूरा दारुल उलूम देवबंद तथा मौलाना मुफ्ती अब्दुर्रज्जाक अमरोहवी ने किया।

इससे पूर्व 29 अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित मदनी हॉल, केंद्रीय कार्यालय जमीयत उलमा-ए-हिंद में मजलिस-ए-आमिला की बैठक आयोजित हुई थी, जिसमें मजलिस-ए-मुन्तज़िमा के लिए विभिन्न प्रस्तावों के प्रारूपों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। मजलिस-ए-आमिला द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव आज मजलिस-ए-मुन्तज़िमा के समक्ष प्रस्तुत किए गए।

अधिवेशन की शुरुआत में मौलाना मुहम्मद याह्या करीमी, महासचिव जमीयत उलमा हरियाणा, पंजाब एवं हिमाचल प्रदेश ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। इसके बाद जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने पिछली कार्यवाही का वाचन करने के साथ सचिवीय रिपोर्ट पेश की। इस अवसर पर प्रसिद्ध शायर कारी एहसान मोहसिन ने अपना कलाम भी प्रस्तुत किया। जमीयत उलमा-ए-हिंद (उत्तर भारत) के नाज़िम-ए-तंजीम मौलाना मुफ्ती ज़ाकिर हुसैन कासमी ने प्रस्ताव-ए-ताजियत पेश किया।

अधिवेशन 31 अक्टूबर को दोपहर तक जारी रहेगा। इसमें देश की वर्तमान स्थिति तथा मुसलमानों के समक्ष मौजूद सामाजिक, शैक्षिक, राष्ट्रीय और संगठनात्मक चुनौतियों से संबंधित कई अन्य महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश किए जाएंगे। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी का महत्वपूर्ण संबोधन भी अधिवेशन का प्रमुख हिस्सा होगा।

--आईएएनएस

डीकेपी/