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बारीक नक्काशी वाले खंभों और मारू-गुर्जर शैली की छतों वाला सौंदर्य, जैन तीर्थंकरों को समर्पित राजस्थान का यह मंदिर

चित्तौड़, 12 मई (आईएएनएस)। मंदिरों का देश कहे जाने वाले भारत में सनातन के साथ ही अन्य धर्मों के भी खूबसूरत व अद्भुत पवित्र स्थल हैं। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ किले में फतेह प्रकाश पैलेस के पास स्थित साथी देवरी मंदिर या सती देवरी मंदिर भी कुछ ऐसा ही है। यह न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि वास्तुकला की उत्कृष्ट कृति भी है। बारीक नक्काशी वाले खंभों से लेकर मारू-गुर्जर शैली में निर्मित छतों तक, यह मंदिर जैन तीर्थंकरों को समर्पित अपनी भव्यता और शांति के लिए लोकप्रिय है।
 
बारीक नक्काशी वाले खंभों और मारू-गुर्जर शैली की छतों वाला सौंदर्य, जैन तीर्थंकरों को समर्पित राजस्थान का यह मंदिर

चित्तौड़, 12 मई (आईएएनएस)। मंदिरों का देश कहे जाने वाले भारत में सनातन के साथ ही अन्य धर्मों के भी खूबसूरत व अद्भुत पवित्र स्थल हैं। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ किले में फतेह प्रकाश पैलेस के पास स्थित साथी देवरी मंदिर या सती देवरी मंदिर भी कुछ ऐसा ही है। यह न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि वास्तुकला की उत्कृष्ट कृति भी है। बारीक नक्काशी वाले खंभों से लेकर मारू-गुर्जर शैली में निर्मित छतों तक, यह मंदिर जैन तीर्थंकरों को समर्पित अपनी भव्यता और शांति के लिए लोकप्रिय है।

सती देवी मंदिर वास्तव में 27 जैन मंदिरों का एक समूह है, जिसे साथी देवरी या सत्तविश देवरी के नाम से भी पुकारा जाता है। 11वीं शताब्दी ईस्वी में जैन समुदाय के फलने-फूलने के दौरान निर्मित यह स्थल आज भी अपनी वास्तुकला और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।

मंदिर का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व है। भारत सरकार के अतुल्य भारत पोर्टल पर सती जैन मंदिर के विषय में जानकारी मिलती है। किंवदंतियों के अनुसार, महाभारत के पांडवों द्वारा भगवान शिव को समर्पित सतीश देवरी मंदिर का उल्लेख मिलता है। समय के साथ यह जैन तीर्थंकरों के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ। हालांकि, समय के प्रभाव से कई संरचनाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, लेकिन मुख्य मंदिर अभी भी अपनी भव्यता बनाए हुए है। पूरा परिसर चित्तौड़गढ़ किले का हिस्सा होने के कारण यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है।

जैन और मारू-गुर्जर वास्तुकला का सुंदर मिश्रण साथी देवरी मंदिर वास्तुकला का अद्भुत नमूना कहा जा सकता है। इस मंदिर में प्रवेश करते ही बारीक नक्काशी वाले खंभे आकर्षित करते हैं, जिन पर जैन तीर्थंकरों की सूक्ष्म मूर्तियां उकेरी गई हैं। पॉलिश किए हुए मार्बल के फर्श पर खिड़कियों से छनकर आने वाली धूप एक दिव्य और खूबसूरत दृश्य उकेरती है। छत मारू-गुर्जर शैली में बनी है, जिसमें कमल के फूल, पौराणिक जीवों और जैन ग्रंथों की घटनाओं को दर्शाती नक्काशी है।

गलियारों में खड़े खंभे और ऊंची छतें प्राचीन कारीगरों की कुशलता और समर्पण की गवाही देते हैं। मंदिर के अंदर का माहौल शांत और ठंडा रहता है, जहां खुशबू और धीमे मंत्रों की ध्वनि मन को शांति प्रदान करती है। मंदिर के गर्भगृह में प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ की शांत मुद्रा वाली भव्य मूर्ति स्थापित है। ध्यान मुद्रा में बैठी यह मूर्ति भक्तों के मन में शांति, अहिंसा, सत्य और वैराग्य की भावना जगाती है। आसपास के छोटे-छोटे मंदिर अन्य तीर्थंकरों को समर्पित हैं, जहां भक्त रंग-बिरंगे फूल चढ़ाकर ध्यान करते हैं।

साथी देवरी मंदिर की यात्रा जैन संस्कृति से गहरा जुड़ाव कराती है। यहां सफेद वस्त्र धारण किए जैन साधु-मुनियों को ध्यान और प्रार्थना में लीन देखा जा सकता है। मंदिर न सिर्फ आराधना का स्थान है, बल्कि आंतरिक शांति और आत्म-चिंतन का केंद्र भी है।

यहां आने वाले पर्यटक व श्रद्धालु प्रार्थना, ध्यान और चिंतन के लिए समय निकालते हैं। मंदिर का शांत वातावरण मन को शांत करता है। यह मंदिर धार्मिक यात्रा के साथ ही इतिहास और वास्तुकला से भी रूबरू कराता है।

--आईएएनएस

एमटी/डीकेपी