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जब मंगल पांडे की देशभक्ति से जल्लाद भी हुए प्रभावित, फांसी देने से कर दिया था इनकार

नई दिल्ली, 18 जुलाई (आईएएनएस)। यह कहानी है, 1857 के संग्राम के नायक, अद्वितीय योद्धा और राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा मंगल पांडे की। मंगल पांडे ने 1857 के संग्राम को अपने पराक्रम की चिंगारी से विशाल ज्वाला बनाकर अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी। उनके नेतृत्व में बैरकपुर छावनी आजादी के आंदोलन का केंद्र बन गई और देशभर में आजादी की एक ऐसी लहर चली, जिससे अंग्रेजों की नींद उड़ गई थी।
 

नई दिल्ली, 18 जुलाई (आईएएनएस)। यह कहानी है, 1857 के संग्राम के नायक, अद्वितीय योद्धा और राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा मंगल पांडे की। मंगल पांडे ने 1857 के संग्राम को अपने पराक्रम की चिंगारी से विशाल ज्वाला बनाकर अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी। उनके नेतृत्व में बैरकपुर छावनी आजादी के आंदोलन का केंद्र बन गई और देशभर में आजादी की एक ऐसी लहर चली, जिससे अंग्रेजों की नींद उड़ गई थी।

आजादी की लड़ाई के अग्रदूत कहे जाने वाले मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ। ब्राह्मण कुल में जन्मे मंगल पांडे 1849 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए और बैरकपुर की सैनिक छावनी 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की पैदल सेना में सैनिक बने।

अंग्रेजी हुकूमत की स्वार्थ की नीतियों के प्रति मंगल पांडे के मन में पहले से ही नफरत थी। कंपनी सेना की ओर से सेना की बंगाल इकाई में राइफलों में नए कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ। यही वो कारतूस थे, जिन्हें बंदूकों में डालने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था।

कारतूसों के बारे में सैनिकों की बीच में यह खबर फैल गई थी कि इन कारतूसों को बनाने में जानवरों की चर्बी का प्रयोग किया जाता है। इस खबर ने सैनिकों के मन में ब्रिटिश सेना के विरुद्ध आक्रोश पैदा कर दिया। 9 फरवरी 1857 को जब ये कारतूस सैनिकों में बांटा गया, तब मंगल पांडे ने उसे लेने से इनकार कर दिया। 29 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया।

खफा हुए अंग्रेज अफसरों ने मंगल पांडे से उनके हथियार छीन लेने और वर्दी उतारने का आदेश दिया, जिसने मानने से मंगल पांडे ने मना कर दिया। मेजर ह्यूसन उनकी राइफल छीनने के लिए आगे बढ़े, पर मंगल पांडे ने उसी राइफल से मेजर ह्यूसन को मौत के घाट उतार दिया। एक अन्य सैनिक अधिकारी के साथ भी उन्होंने यही बर्ताव किया।

जब उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों पर हमला किया था, यह भारतीय विद्रोह के नाम से जाने जाने वाले आंदोलन की पहली बड़ी घटना थी। इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाम से भी जाना जाता है। वे इस विद्रोह के दौरान प्रतिरोध और राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गए।

हालांकि, इस घटना के बाद उन्हें अंग्रेज सिपाहियों ने गिरफ्तार कर लिया और उन पर कोर्ट मार्शल का मुकदमा चलाया। उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन उनकी देशभक्ति से जल्लाद भी प्रभावित थे। इसी कारण उन्होंने फांसी देने से इनकार कर दिया था।

इसके बाद कलकत्ता (कोलकाता) से जल्लाद बुलाए गए। 8 अप्रैल 1857 को बैरकपुर के परेड ग्राउंड में मंगल पांडे को फांसी दी गई। उनकी शहादत की खबर फैलते ही ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जगह-जगह संघर्ष हुए और अंग्रेजों के विरुद्ध पूरे देश में आजादी की चिंगारी भड़क उठी। उनकी वीरता और बलिदान ने भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों और नेताओं की भावी पीढ़ियों को प्रेरित किया, जिन्होंने स्वतंत्रता के संघर्ष को आगे बढ़ाया।

--आईएएनएस

डीसीएच/एबीएम