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जब फैज और साहिर के दौर में चमके थे मजाज लखनवी, जिनकी तस्वीरें तकिए के नीचे रखती थीं लड़कियां

नई दिल्ली, 18 अक्टूबर (आईएएनएस)। "सर शार-ए-निगाह-ऐ-नरिगस हूं, पाबस्ता-ए-गेसू-ऐ सुंबुल हूं। ये मेरा चमन है मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूं।" शेर-ओ-अदब की महफिल में गजलों-नज्मों की जब बात छिड़ती है तो उस शायर का नाम छूट नहीं सकता, जिनकी शायरी आज भी लाखों लोगों के दिलों पर राज करती है। उनकी शोहरत का आलम यह था कि उनकी तस्वीरें लखनऊ और अलीगढ़ के लड़कियों के हॉस्टल में तकियों के नीचे मिलती थी। यह उर्दू शायरी का वह दौर था, जब शायर इश्क की दुनिया में सपनों के राजकुमार जैसी हैसियत रखते थे।
 

नई दिल्ली, 18 अक्टूबर (आईएएनएस)। "सर शार-ए-निगाह-ऐ-नरिगस हूं, पाबस्ता-ए-गेसू-ऐ सुंबुल हूं। ये मेरा चमन है मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूं।" शेर-ओ-अदब की महफिल में गजलों-नज्मों की जब बात छिड़ती है तो उस शायर का नाम छूट नहीं सकता, जिनकी शायरी आज भी लाखों लोगों के दिलों पर राज करती है। उनकी शोहरत का आलम यह था कि उनकी तस्वीरें लखनऊ और अलीगढ़ के लड़कियों के हॉस्टल में तकियों के नीचे मिलती थी। यह उर्दू शायरी का वह दौर था, जब शायर इश्क की दुनिया में सपनों के राजकुमार जैसी हैसियत रखते थे।

"फिराक हूं और न जोश हूं मैं, मजाज हूं सरफरोश हूं मैं।"

यह कहानी है उर्दू शायरी के 'कीट्स' कहलाए मजाज लखनवी की, जो उन चुनिंदा शायरों में से थे, जिनकी शायरी में दो सबसे अहम पहलू झलकते थे: रोमांस और इंकलाब। उस दौर में जब फैज, सरदार जाफरी और साहिर लुधियानवी जैसे दिग्गज उर्दू शायर अपने शिखर पर थे, तब मजाज ने शोहरत हासिल की और अपनी एक अलग पहचान बनाई।

19 अक्टूबर 1911 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के रूदौली गांव में जन्मे मजाज आज भी अवाम के महबूब-तरीन शायर हैं। पहले उनका नाम असरारुल हक रखा गया था और बाद में उन्होंने 'मजाज लखनवी' नाम अपना लिया, जिन्हें फिर मजाज भी कहा जाने लगा।

"आओ, मिलकर इन्कलाबे ताजहतर पैदा करें, दहर पर इस तरह छा जाएं कि सब देखा करें।" और मजाज निकल पड़े इन्किलाब करने के लिए। पिता चाहते थे कि बेटा इंजीनियर बनेगा और इसी उम्मीद के साथ मजाज को आगरा के एक कॉलेज में भेज दिया। आगरा के बाद मजाज बीए की पढ़ाए करने अलीगढ़ गए, जहां जिंदगी ने एक नया मोड़ ले लिया। आगरा से अलीगढ़ तक आते-आते शबाब, इन्कलाब में तब्दील हो चुका था।

जब कुछ शायरों की जाहिर जवाबी के किस्से कहे जाते हैं तो उनमें मजाज के नाम भी लिया जाता है। जावेद अख्तर ने एक इंटरव्यू में कहा था, "उनके जुमले कमाल के होते थे।" मजाज लखनवी, जावेद अख्तर के बड़े मामा थे।

"शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूं,

जगमगाती,जागती सडकों पे आवारा फिरूं।

गैर की बस्ती है,कब तक दर-ब-दर मारा फिरूं

ऐ गमे दिल क्या करूं, ऐ वहशते-दिल, क्या करूं।"

मुंबई से कुछ समय बाद मजाज लखनऊ वापस आ गए, जो धीरे-धीरे उन्हें रास आने लगा था। लखनऊ के बारे में उनकी यह नज्म उनके लगाव को खूबसूरती से दर्शाती है।

"हुस्न को बे-हिजाब होना था, शौक को कामयाब होना था। हिज्र में कैफ-ए-इज्तिराब न पूछ, खून-ए-दिल भी शराब होना था।"

लखनऊ में दर्द, घुटन और अकेलापन ऐसा था कि वे ज्यादातर खामोश रहने लगे। शराब की लत तब तक उन्हें लग चुकी थी और उनकी हालात लगातार खराब होती गई। कुछ लेखों में यह जिक्र मिलता है कि इश्क में नाकामी से मजाज ने शराब पीना शुरू किया था। उसकी लत इस कदर बढ़ी कि लोग कहने लगे थे कि मजाज शराब को नहीं, शराब मजाज को पी रही है। 5 दिसंबर 1955 का वह दिन था, जब महज 44 साल की उम्र में मजाज इस दुनिया को अलविदा कह गए।

--आईएएनएस

डीसीएच/पीएम