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जब बॉम्बे राज्य को दो हिस्सों में बांटकर बुझी भाषाई आंदोलनों की आग, गुजरात और महाराष्ट्र के गठन की कहानी

नई दिल्ली, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। धर्म के आधार पर बंट चुके हिंदुस्तान में अगले लगभग एक दशक बाद भाषा के आधार पर लोगों के बीच भेदभाव शुरू हो चुका था। खासकर 1949 में पूरे देश में भाषाई आधार पर अलग-अलग राज्यों की मांग जोर पकड़ चुकी थी। कुछ इसी तरह के हालात बॉम्बे राज्य में थे, जिसमें कभी गुजराती और मराठी एकजुट रहा करते थे। हालांकि, राज्य में दो अलग-अलग समूह उभर कर सामने आए। एक समूह में मराठी और कोंकणी बोलने वाले लोग शामिल थे, जबकि दूसरे समूह में गुजराती और कच्छी बोलने वाले लोग शामिल थे। आखिरकार, वह दिन आया, जब भाषा के आधार पर 1 मई 1960 को बॉम्बे राज्य को दो राज्यों में विभाजित करके गुजरात और महाराष्ट्र का गठन किया गया।
 
जब बॉम्बे राज्य को दो हिस्सों में बांटकर बुझी भाषाई आंदोलनों की आग, गुजरात और महाराष्ट्र के गठन की कहानी

नई दिल्ली, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। धर्म के आधार पर बंट चुके हिंदुस्तान में अगले लगभग एक दशक बाद भाषा के आधार पर लोगों के बीच भेदभाव शुरू हो चुका था। खासकर 1949 में पूरे देश में भाषाई आधार पर अलग-अलग राज्यों की मांग जोर पकड़ चुकी थी। कुछ इसी तरह के हालात बॉम्बे राज्य में थे, जिसमें कभी गुजराती और मराठी एकजुट रहा करते थे। हालांकि, राज्य में दो अलग-अलग समूह उभर कर सामने आए। एक समूह में मराठी और कोंकणी बोलने वाले लोग शामिल थे, जबकि दूसरे समूह में गुजराती और कच्छी बोलने वाले लोग शामिल थे। आखिरकार, वह दिन आया, जब भाषा के आधार पर 1 मई 1960 को बॉम्बे राज्य को दो राज्यों में विभाजित करके गुजरात और महाराष्ट्र का गठन किया गया।

भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त हुई। इसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों को एकजुट करने का समय आ गया। यह महत्वपूर्ण कार्य लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को सौंपा गया। राज्यों के गठन के आधार पर एक बहस छिड़ गई। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्यों के गठन की योजना बनाना शुरू किया। 1947 में तत्कालीन सरकार ने पश्चिमी भाग में स्थित रियासतों का विलय करके तीन राज्यों की स्थापना की। ये राज्य सौराष्ट्र, कच्छ और मुंबई थे।

कुछ साल बाद भाषाई आधार पर राज्यों के बंटवारे की आवाज सुनाई पड़ने लगी थी। लगातार हो रही मांगों को शांत करने के लिए सरकार ने समय-समय पर कुछ कमेटियां बनाईं, जिनमें से एक कमेटी जून 1948 में बनाई गई। यह नेतृत्व का अवसर रिटायर्ड जज एसके धर को मिला था। इसके बाद, दिसंबर 1948 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और कहा कि 'राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुविधा के आधार पर होना चाहिए।"

कमेटी बनाने के बाद जो मामला कुछ समय के लिए शांत हुआ था, रिपोर्ट के बाद उसने और तेजी पकड़ ली थी। इस बार भी आवाज को शांत करने के लिए दिसंबर 1948 में फिर से एक कमेटी बनाई गई। इस कमेटी के सदस्य खुद जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया थे। तीनों के नाम के पहले अक्षर के आधार पर इसे जेवीपी कमेटी के नाम से जाना गया।

प्रदर्शन कर रहे लोगों को भरोसा मिला कि इस बार बड़े नेता कमेटी में शामिल हैं, इसलिए कुछ समाधान जरूर निकलेगा और मन मांगी मुराद पूरी होगी। हालांकि, जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल भाषा के आधार पर राज्यों के बंटवारे के पक्ष में नहीं थे। भाषाई राज्य भारत की एकता और अखंडता के लिए खतरा हो सकते हैं। इस कमेटी ने कुछ महीनों के बाद 1949 में अपनी रिपोर्ट पेश की और भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के विचार को खारिज कर दिया गया। समाचार लेखों में यह जिक्र मिलता है। इनमें यह भी लिखा गया है कि कांग्रेस के मुख्य आलोचक आरएसएस ने भी उस वक्त नेहरू का समर्थन किया था।

1949 में देश के अलग-अलग हिस्सों में आंदोलन और तेज हो चुके थे। मैसूर, बॉम्बे और हैदराबाद में फैले कन्नड भाषाई लोगों के लिए अलग राज्य की मांग के लिए 'ज्वाइंट कर्नाटक आंदोलन' शुरू हो गया। इसके साथ ही, महाराष्ट्र आंदोलन शुरू हुई। मलयालम और पंजाबियों के बीच भी अलग राज्य की मांग उठने लगी थी। इसी बीच, तेलुगु भाषियों ने उग्र आंदोलन करना शुरू कर दिया था।

फिर राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम 1956 के तहत कई राज्यों का गठन हुआ। कन्नड़ भाषी लोगों के लिए कर्नाटक राज्य बनाया गया। तेलुगु बोलने वालों को आंध्र प्रदेश मिला। मलयालम भाषियों को केरल और तमिल बोलने वालों के लिए तमिलनाडु राज्य मिला। हालांकि, गुजरातियों और मराठियों की मांग अभी पूरी नहीं हुई थी। वे विरोधाभाष के बीच अभी भी बॉम्बे राज्य का हिस्सा थे।

हालांकि, बाद में 'संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन' की आवाज उठी, जिसे आमतौर पर 'समिति' के रूप में जाना गया। यह एक संगठन था जिसने 1956 से 1960 तक पश्चिमी भारत और मध्य भारत में एक अलग मराठी भाषी राज्य की मांग की।

इस आंदोलन में निर्णायक मोड़ 8 अगस्त, 1956 को आया, जब अहमदाबाद के कुछ कॉलेज छात्र अलग राज्य की मांग लेकर लाल दरवाजा स्थित स्थानीय कांग्रेस कार्यालय पहुंचे। उस समय मोरारजी देसाई ने उनकी बात नहीं सुनी और पुलिस कार्रवाई में कई छात्रों की मौत हो गई। इसका गहरा असर पूरे गुजरात पर पड़ा। इंदुलाल याग्निक सेवानिवृत्ति से वापस आए और आंदोलन को दिशा देने के लिए महागुजरात जनता परिषद की स्थापना की। उस समय इंदुलाल याग्निक और दिनकर मेहता जैसे कई आंदोलनकारियों को गिरफ्तार भी किया गया था।

अलग गुजरात और महाराष्ट्र की मांग को लेकर दोनों तरफ के लोगों ने आंदोलन शुरू कर दिया। कुछ मामलों में आंदोलन हिंसा तक भी पहुंच गया।

भाषाई मतभेदों के कारण प्रस्तावित राज्य की योजना में बार-बार बाधाएं आईं। दोनों पक्षों की ओर से आंदोलन हुए। राज्य के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शनों की बढ़ती गति को देखते हुए, तत्कालीन सरकार ने बॉम्बे पुनर्गठन अधिनियम तैयार करने का निर्णय लिया। संसद में विधेयक प्रस्तुत होने के बाद यह कानून बन गया। 1 मई, 1960 को यह कानून लागू हुआ और गुजरात व महाराष्ट्र को बॉम्बे राज्य से अलग कर दिया गया। उस समय आर्थिक राजधानी मुंबई महाराष्ट्र को और दांग गुजरात को दे दी गई। तब से, 1 मई को गुजरात और महाराष्ट्र स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है।

--आईएएनएस

डीसीएच/पीएम