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इतिहास के पन्नों में 3 अगस्त: देश का पहला हार्ट ट्रांसप्लांट​, जो अंगदान जागरूकता की बन गया मिसाल

नई दिल्ली, 2 अगस्त (आईएएनएस)। 3 अगस्त भारतीय चिकित्सा जगत के लिए बेहद खास दिन है। यही वह तारीख है, जब साल 1994 में भारत ने मेडिकल साइंस के क्षेत्र में एक ऐसा इतिहास रचा, जिसने लाखों दिल के मरीजों के लिए नई उम्मीद जगा दी। इसी दिन नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में देश का पहला सफल हार्ट ट्रांसप्लांट किया गया था।
 

नई दिल्ली, 2 अगस्त (आईएएनएस)। 3 अगस्त भारतीय चिकित्सा जगत के लिए बेहद खास दिन है। यही वह तारीख है, जब साल 1994 में भारत ने मेडिकल साइंस के क्षेत्र में एक ऐसा इतिहास रचा, जिसने लाखों दिल के मरीजों के लिए नई उम्मीद जगा दी। इसी दिन नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में देश का पहला सफल हार्ट ट्रांसप्लांट किया गया था।

1994 से पहले अगर किसी भारतीय मरीज को हार्ट ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती थी, तो उसके सामने विदेश जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता था। यह इलाज बेहद महंगा था और हर किसी की पहुंच से बाहर था। भारत में डॉक्टर लगातार इस दिशा में काम कर रहे थे, लेकिन कानूनी व्यवस्था और तकनीकी चुनौतियों के कारण सफलता नहीं मिल पा रही थी।

इस दिशा में सबसे बड़ा बदलाव 7 जुलाई 1994 को आया, जब मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। इस कानून ने भारत में कानूनी रूप से अंगदान और अंग प्रत्यारोपण का रास्ता खोल दिया। इसके बाद डॉक्टरों की टीम ने पूरी तैयारी के साथ देश का पहला हार्ट ट्रांसप्लांट करने का फैसला किया।

3 अगस्त 1994 को एम्स दिल्ली में वरिष्ठ कार्डियक सर्जन डॉ. पी. वेणुगोपाल के नेतृत्व में करीब 20 विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने 42 वर्षीय मरीज देवी राम का सफल हार्ट ट्रांसप्लांट किया। यह ऑपरेशन अपने समय के हिसाब से बेहद जटिल माना जाता था। पूरी प्रक्रिया लगभग 59 मिनट में पूरी हुई और सर्जरी पूरी तरह सफल रही। इस सफलता ने भारतीय चिकित्सा विज्ञान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई।

देवी राम का सफल हार्ट ट्रांसप्लांट सिर्फ एक मरीज की जान बचाने तक सीमित नहीं था। इसने पूरे देश में अंगदान के प्रति लोगों की सोच बदलने का काम किया। लोगों को यह समझ आया कि किसी व्यक्ति के अंगदान से कई लोगों को नया जीवन मिल सकता है। इसके बाद देश में धीरे-धीरे ऑर्गन डोनेशन को लेकर जागरूकता बढ़ने लगी और कई अस्पतालों में हार्ट ट्रांसप्लांट की सुविधाएं विकसित हुईं।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि को सम्मान देने के लिए साल 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 3 अगस्त को राष्ट्रीय हृदय प्रत्यारोपण दिवस घोषित किया। पहली बार यह दिवस प्रधानमंत्री आवास पर मनाया गया, जहां उस समय तक सफल हार्ट ट्रांसप्लांट करा चुके मरीजों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री सुषमा स्वराज और एम्स के निदेशक डॉ. पी. वेणुगोपाल भी मौजूद थे।

इसी कार्यक्रम में डॉ. पी. वेणुगोपाल के प्रस्ताव पर ऑर्गन रिट्रीवल बैंकिंग ऑर्गेनाइजेशन (ओआरबीओ) को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने की भी घोषणा की गई। इसके बाद देश में अंगदान की व्यवस्था को और मजबूत बनाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।

आज भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां हार्ट ट्रांसप्लांट जैसी जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक की जा रही है। आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित डॉक्टरों और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की बदौलत हजारों मरीजों को नया जीवन मिल रहा है।

हालांकि, आज भी सबसे बड़ी चुनौती अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अधिक से अधिक लोग अंगदान के लिए आगे आएं, तो हर साल हजारों मरीजों की जान बचाई जा सकती है।

--आईएएनएस

पीआईएम/वीसी