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आई-ड्रोन पहल ने बदली टीबी जांच की तस्वीर, मरीजों का खर्च 9,451 से घटकर हुआ 91 रुपए

नई दिल्ली, 16 जुलाई (आईएएनएस)। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की 'आई-ड्रोन' पहल के तहत किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि ड्रोन की मदद से टीबी के बलगम के नमूनों को जांच प्रयोगशाला तक पहुंचाने से दूर-दराज और कम सुविधाओं वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए जांच कराना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान और तेज हो गया है। इससे जांच में लगने वाला समय कम हुआ है और मरीजों पर आर्थिक बोझ भी काफी घटा है।
 

नई दिल्ली, 16 जुलाई (आईएएनएस)। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की 'आई-ड्रोन' पहल के तहत किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि ड्रोन की मदद से टीबी के बलगम के नमूनों को जांच प्रयोगशाला तक पहुंचाने से दूर-दराज और कम सुविधाओं वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए जांच कराना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान और तेज हो गया है। इससे जांच में लगने वाला समय कम हुआ है और मरीजों पर आर्थिक बोझ भी काफी घटा है।

यह अध्ययन तेलंगाना के यादद्री-भुवनगिरी जिले में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) बीबीनगर और राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत जिला टीबी कार्यालय के सहयोग से किया गया। अध्ययन में पहले से चल रही व्यवस्था और ड्रोन आधारित नई व्यवस्था की तुलना की गई। पहले मरीजों को जांच के लिए स्वयं लंबी दूरी तय करके जांच केंद्र तक जाना पड़ता था। नई व्यवस्था में मरीजों के बलगम के नमूने उनके नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उपस्वास्थ्य केंद्र पर एकत्र किए गए और वहां से ड्रोन के माध्यम से निर्धारित टीबी जांच प्रयोगशाला तक पहुंचाए गए।

अध्ययन में 840 लोगों को शामिल किया गया। इसके नतीजों से पता चला कि ड्रोन के जरिए नमूने भेजने की व्यवस्था शुरू होने के बाद टीबी की जांच पूरी होने का औसत समय 15 दिन से घटकर केवल पांच दिन रह गया। इससे जांच में होने वाली देरी काफी कम हुई और मरीजों में बीमारी की पुष्टि पहले हो सकी। इसके कारण डॉक्टर समय पर इलाज शुरू करने का फैसला लेने में सक्षम हुए।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि मरीजों को अपनी जेब से होने वाला खर्च भी काफी कम हो गया। पहले जांच कराने के लिए यात्रा, मजदूरी के नुकसान और अन्य खर्चों को मिलाकर मरीजों को औसतन 9,451 रुपए खर्च करने पड़ते थे। वहीं ड्रोन आधारित व्यवस्था लागू होने के बाद यह खर्च घटकर औसतन केवल 91 रुपए रह गया। कई मरीजों को तो जांच के लिए यात्रा पर कोई खर्च ही नहीं करना पड़ा, क्योंकि वे अपने गांव के पास स्थित स्वास्थ्य केंद्र पर ही बलगम का नमूना जमा कर सके।

इस व्यवस्था को 'केंद्र और संपर्क केंद्र' मॉडल के आधार पर लागू किया गया। इसके तहत 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 60 उप-स्वास्थ्य केंद्र और चार टीबी इकाइयों को आपस में जोड़ा गया। इससे लोगों को दूर स्थित जांच केंद्रों तक जाने की जरूरत नहीं पड़ी और स्वास्थ्य सेवाएं उनके घरों के अधिक करीब पहुंच सकीं।

आईसीएमआर के महानिदेशक और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने कहा कि समय पर और किफायती जांच की सुविधा भारत से टीबी समाप्त करने के प्रयासों का अहम हिस्सा है। उन्होंने कहा कि यह अध्ययन दिखाता है कि आधुनिक तकनीक की मदद से भौगोलिक कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है और दूरदराज़ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर समय और खर्च का बोझ कम किया जा सकता है। उनके अनुसार, आई-ड्रोन पहल से मिले अनुभव भविष्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत बनाने में मदद करेंगे।

अध्ययन में शामिल स्वास्थ्यकर्मियों ने भी बताया कि ड्रोन के जरिए नमूने भेजने से जांच में देरी कम हुई। काम करने की क्षमता बढ़ी और लोगों ने इस व्यवस्था को आसानी से स्वीकार किया, हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि मौसम, ड्रोन की भार वहन क्षमता और कर्मचारियों के नियमित प्रशिक्षण जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखकर ही इस व्यवस्था को बड़े स्तर पर लागू किया जाना चाहिए।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह अध्ययन केवल एक जिले के अनुभव पर आधारित है। लेकिन, इससे यह स्पष्ट होता है कि ड्रोन आधारित व्यवस्था दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का प्रभावी माध्यम बन सकती है। आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल के तहत देश के कठिन इलाकों में टीके, दवाइयां, रक्त उत्पाद, जांच के नमूने, ऊतक और अन्य जरूरी चिकित्सा सामग्री को सुरक्षित और तेजी से पहुंचाने की संभावनाओं पर भी लगातार काम किया जा रहा है।

--आईएएनएस

एसएचके/वीसी