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मक्का समझौते में शामिल होना बांग्लादेश के लिए ठीक नहीं, सौ बार करे विचार: रिपोर्ट

ढाका, 5 सितंबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान-सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में बांग्लादेश के शामिल होने की अटकलों के बीच, एक रिपोर्ट ने उसे सतर्क रहने की सलाह दी है। चेतावनी दी गई है कि इस गठबंधन में शामिल होने से देश ऐसी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं में फंस सकता है जो उसके राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं होगी।
 

ढाका, 5 सितंबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान-सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में बांग्लादेश के शामिल होने की अटकलों के बीच, एक रिपोर्ट ने उसे सतर्क रहने की सलाह दी है। चेतावनी दी गई है कि इस गठबंधन में शामिल होने से देश ऐसी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं में फंस सकता है जो उसके राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं होगी।

बांग्लादेशी दैनिक 'द डेली ऑब्जर्वर' की एक रिपोर्ट कहती है कि किसी भी जंग में शामिल होने से पहले देश को सौ बार सोचने की जरूरत होगी। बांग्लादेश के सामने चुनौती बड़ी है। उसे फैसला करना है कि क्या वह किसी दूसरे देश की सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बने या अपनी सुरक्षा प्राथमिकताएं खुद तय करे? उसे अपनी समझ-बूझ नहीं खोनी चाहिए और न ही खुद को किसी "खतरनाक जाल" में फंसने देना चाहिए।

रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है, "जब कोई देश किसी सैन्य गठबंधन में शामिल होता है, तो वह सिर्फ किसी दस्तावेज पर दस्तखत नहीं करता; बल्कि अपने भविष्य के कुछ फैसले दूसरों के हाथों में सौंप देता है। पहली नजर में, ऐसी व्यवस्था दोस्ती, भाईचारे, आपसी सहयोग और सामूहिक सुरक्षा का भरोसा दिलाती हुई लग सकती है। लेकिन गहराई से देखने पर मुश्किल सवाल खड़े होते हैं। इसलिए, बांग्लादेश को 'मक्का जॉइंट डिफेंस' समझौते में शामिल करने पर हो रही बहस सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार का मामला नहीं है। यह देश की सुरक्षा, संप्रभुता, अर्थव्यवस्था और लंबे समय से चली आ रही विदेश नीति से जुड़ा मामला है।"

रिपोर्ट में आगे कहा गया, "एक मुस्लिम-बहुल देश होने के नाते, बांग्लादेश को स्वाभाविक रूप से सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग का विचार आकर्षक लग सकता है। लेकिन देशों को भावनाओं के आधार पर नहीं चलाया जा सकता। उनका अस्तित्व आखिरकार भूगोल, अर्थव्यवस्था, सैन्य क्षमता और राष्ट्रीय हित की कठोर वास्तविकताओं पर निर्भर करता है।"

बांग्लादेश फिलहाल सैन्य खतरे का सामना सीधे तौर पर नहीं कर रहा है, जबकि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की की अपनी अलग-अलग सुरक्षा चिंताएं हैं। ईरान-सऊदी प्रतिद्वंद्विता, भारत-पाकिस्तान तनाव और इजरायल को लेकर तुर्की की सुरक्षा रणनीतियां उनकी अपनी वास्तविकताओं को दर्शाती हैं, जो बांग्लादेश की स्थिति से अलग हैं। 'द डेली ऑब्जर्वर' ने कहा कि इसलिए ढाका के लिए किसी दूसरे देश की सुरक्षा प्राथमिकताओं को अपनी प्राथमिकता बनाना नादानी होगी।

रिपोर्ट में कहा गया, "एक काल्पनिक स्थिति पर विचार करें: मान लीजिए म्यांमार कल बांग्लादेश पर हमला कर देता है। क्या पाकिस्तान म्यांमार के खिलाफ युद्ध में उतरेगा? क्या सऊदी अरब, बांग्लादेश की रक्षा के लिए सेना भेजेगा? क्या तुर्की बंगाल की खाड़ी के रास्ते सैन्य मदद लेकर पहुंचेगा? व्यावहारिक वास्तविकता से जुड़े ऐसे सवाल किसी संधि की भाषा की तुलना में कहीं ज्यादा कठोर होते हैं।"

रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया, "सैन्य गठबंधनों का इतिहास बहुत भरोसेमंद नहीं रहा है। सीईएनटीओ, एसईएटीओ और नाटो—इन सभी का अपना-अपना इतिहास और हित रहे हैं। एक शक्तिशाली देश की सुरक्षा जरूरी नहीं कि कमजोर देश की सुरक्षा जैसी ही हो। कागज पर सभी सदस्य बराबर हो सकते हैं, लेकिन असल में सैन्य ताकत, आर्थिक बोझ और भू-राजनीतिक महत्व समान रूप से बंटे हुए नहीं होते।"

रिपोर्ट में कहा गया है कि भले ही बांग्लादेश के भारत के साथ सीमा, पानी के बंटवारे, प्रत्यर्पण और व्यापार जैसे मुद्दों पर मतभेद हों, लेकिन बिना सोचे-समझे भारत-विरोधी बयानबाजी करना किसी ठोस रणनीति का विकल्प नहीं हो सकता। इसमें चेतावनी दी गई है कि आर्थिक युद्ध कभी-कभी सैन्य संघर्ष से भी ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है।

रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया, "बांग्लादेश का ईंधन, बिजली, गैस, खाद, पानी और व्यापारिक रास्ते ये सभी उसके पड़ोसी देशों की हकीकत से जुड़े हैं। भारत उसका एक अहम पड़ोसी है। उसे दुश्मन बनाना और किसी दूर की ताकत की सुरक्षा-छतरी के नीचे पनाह लेना बांग्लादेश को ज्यादा सुरक्षित नहीं बनाएगा; बल्कि यह खुद को बर्बाद करने का रास्ता बन सकता है।"