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बिहार: उपेंद्र कुशवाहा ने 22 अप्रैल को ‘धिक्कार मार्च’ की घोषणा की

पटना, 21 अप्रैल (आईएएनएस)। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के सुप्रीमो और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने मंगलवार को बिहार में 22 अप्रैल को राज्यव्यापी ‘धिक्कार मार्च’ की घोषणा की। इस मार्च का उद्देश्य महिला प्रतिनिधित्व और परिसीमन से संबंधित मुद्दों पर विपक्षी दलों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना है।
 
बिहार: उपेंद्र कुशवाहा ने 22 अप्रैल को ‘धिक्कार मार्च’ की घोषणा की

पटना, 21 अप्रैल (आईएएनएस)। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के सुप्रीमो और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने मंगलवार को बिहार में 22 अप्रैल को राज्यव्यापी ‘धिक्कार मार्च’ की घोषणा की। इस मार्च का उद्देश्य महिला प्रतिनिधित्व और परिसीमन से संबंधित मुद्दों पर विपक्षी दलों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना है।

पटना में मीडियाकर्मियों को संबोधित करते हुए कुशवाहा ने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित उपायों सहित कई महत्वपूर्ण कानूनों को पारित होने से रोका है।

उन्होंने कहा, “हम विपक्ष के असली इरादों को जनता के सामने उजागर करेंगे। इसी उद्देश्य से हमारी पार्टी 22 अप्रैल को बिहार भर में 'धिक्कार मार्च' का आयोजन करेगी।"

उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और महागठबंधन के घटक दलों की कड़ी आलोचना करते हुए उन पर बिहार और पूरे देश की महिलाओं के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया।

उन्होंने दावा किया कि ये पार्टियां महिलाओं को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए तैयार नहीं हैं।

कुशवाहा ने जोर देकर कहा कि उनकी पार्टी लंबे समय से परिसीमन की वकालत कर रही है, और उनका कहना है कि अगर इसे लागू किया जाता है, तो बिहार की लोकसभा सीटें 40 से बढ़कर 60 और विधानसभा सीटें 243 से बढ़कर 365 हो सकती हैं, जिससे विधायी निकायों में महिलाओं की भागीदारी के अधिक अवसर पैदा होंगे।

उन्होंने आगे कहा, “विपक्ष बिहार, विशेषकर यहां की महिलाओं के हित में काम नहीं कर रहा है। इस मार्च के माध्यम से हम उनका असली चेहरा बेनकाब करेंगे।”

आरएलएम ने बिहार के सभी जिला मुख्यालयों में 'अधिकार मार्च' आयोजित करने की योजना बनाई है, जिसे वह एक प्रमुख राजनीतिक जनसंपर्क अभियान के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।

अपनी पार्टी के रुख को दोहराते हुए कुशवाहा ने कहा कि हम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं दोनों में महिलाओं के लिए उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। महिलाओं के साथ-साथ अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप समान अधिकार मिलने चाहिए।

--आईएएनएस

एमएस/