यूपी में सीट बंटवारे की खींचतान में दिख रही बिहार की महागठबंधन वाली गूंज?
नई दिल्ली, 30 सितंबर (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच सीट बंटवारे को लेकर उभरता विवाद बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले महागठबंधन में सामने आई खींचतान की याद दिला रहा है। दोनों ही मामलों में कांग्रेस ने गठबंधन में बड़ी भूमिका की मांग की, जबकि मजबूत क्षेत्रीय सहयोगी पार्टी अपनी सीटों में कटौती के लिए तैयार नजर नहीं आई।
उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा के गठबंधन ने प्रभावशाली प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन से विपक्षी इंडिया ब्लॉक को राज्य में मजबूती मिली और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लंबे समय से चले आ रहे वर्चस्व को चुनौती मिली।
इसी प्रदर्शन से उत्साहित कांग्रेस के नेता अब विधानसभा चुनाव के लिए जल्द सीट बंटवारे पर जोर दे रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, कांग्रेस गठबंधन में अपने लिए ‘सम्मानजनक’ संख्या में सीटें चाहती है। संकेतों के अनुसार, पार्टी 403 सदस्यीय विधानसभा में 150 से अधिक सीटों की मांग कर सकती है। हालांकि, गठबंधन में शामिल अन्य सहयोगी दल भी अपने लिए पर्याप्त सीटों की मांग कर सकते हैं।
वहीं, सपा करीब 80 सीटों तक कांग्रेस को देने के पक्ष में अधिक सहज बताई जा रही है। सीटों की संख्या को लेकर दोनों दलों के नेताओं के बीच सार्वजनिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है। दोनों ओर से नेताओं ने एक-दूसरे की राजनीतिक हैसियत, संगठनात्मक ताकत और चुनावी योगदान को लेकर टिप्पणियां की हैं। हालांकि, दोनों दलों के नेताओं ने यह भी संकेत दिया है कि सीट बंटवारे पर अंतिम फैसला पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिया जाएगा। इसका सीधा संकेत कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर है।
उत्तर प्रदेश की मौजूदा स्थिति में बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर हुई खींचतान की समानताएं दिखाई देती हैं। बिहार में भी कांग्रेस ने राहुल गांधी के नए राजनीतिक संपर्क अभियान से बने माहौल को अपने लिए बढ़ी हुई राजनीतिक बारगेनिंग पावर के रूप में देखा था।
कांग्रेस ने 2020 विधानसभा चुनाव में जितनी सीटों पर चुनाव लड़ा था, लगभग उतनी ही यानी करीब 70 सीटों की मांग पर जोर दिया था। हालांकि, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव कांग्रेस की सभी मांगों को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं थे।
राजद नेतृत्व का तर्क था कि सीटों के बंटवारे में केवल राजनीतिक आकांक्षाओं के बजाय पिछले चुनाव के प्रदर्शन को भी प्रमुख आधार बनाया जाना चाहिए। 2020 में कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 19 सीटों पर जीत दर्ज की थी। राजद ने कांग्रेस की मांगों को सीमित रखने के लिए इसी प्रदर्शन का हवाला दिया था।
सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच मतभेद बढ़ने के साथ ही अटकलें भी तेज हुई थीं। एक समय तेजस्वी यादव ने यहां तक कहा था कि राजद बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। इसे कांग्रेस पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा गया था।
बिहार में राहुल गांधी की बढ़ी राजनीतिक सक्रियता के बावजूद सीट बंटवारे में क्षेत्रीय रूप से मजबूत राजद की भूमिका निर्णायक रही। अंततः कांग्रेस 61 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हुई। हालांकि, चुनाव परिणाम में कांग्रेस को महज छह सीटें मिलीं, जो 2020 के मुकाबले 13 कम थीं। वहीं, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने विपक्षी चुनौती को पीछे छोड़ते हुए बड़ी जीत दर्ज की।
बिहार के अनुभव ने विपक्षी गठबंधन के सामने छोटे सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने की चुनौती भी रखी। कांग्रेस और राजद की सहयोगी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने बिहार के महागठबंधन में अपने लिए उचित हिस्सेदारी की मांग की थी।
झामुमो नेताओं ने आरोप लगाया था कि उनसे किए गए वादे पूरे नहीं किए गए और गठबंधन नेतृत्व ने उसके हितों का सम्मान नहीं किया। विवाद बढ़ने पर झामुमो ने अलग रास्ता अपनाने और स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की चेतावनी भी दी थी।
झामुमो ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की योजना की घोषणा की और गठबंधन के सहयोगियों पर विश्वासघात तथा राजनीतिक रूप से हाशिये पर डालने का आरोप लगाया। हालांकि, अंततः पार्टी ने वैसा चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन इस घटनाक्रम का गठबंधन के भीतर सीटों के तालमेल पर असर पड़ा।
इसी तरह, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने भी महागठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताई थी। पार्टी नेताओं ने राजद नेतृत्व से संपर्क किया और सीमित संख्या में सीटों पर चुनाव लड़ने की पेशकश भी की। एआईएमआईएम नेताओं के मुताबिक, उन्होंने लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव से गठबंधन के लिए संपर्क किया था, लेकिन उनकी पेशकश स्वीकार नहीं की गई।
इसके बाद एआईएमआईएम ने अलग गठबंधन बनाया। उसने तीसरे मोर्चे की ओर से लड़ी गई 79 सीटों में से 28 सीटों पर चुनाव लड़ा और पांच सीटें जीतीं, जो 2020 के विधानसभा चुनाव में उसके प्रदर्शन के बराबर था।
बिहार चुनाव में एनडीए ने मुस्लिम बहुल मानी जाने वाली विधानसभा सीटों में भी सेंध लगाई और ऐसी करीब 16 सीटों पर जीत दर्ज की, जिन्हें पारंपरिक रूप से विपक्षी दलों के मजबूत इलाकों के रूप में देखा जाता रहा है।
बिहार में करीब 32 विधानसभा सीटें मुस्लिम बहुल मानी जाती हैं। इनमें से अधिकांश नेपाल सीमा से लगे सीमांचल क्षेत्र के जिलों में हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक मतदान भी दर्ज किया गया था।
अब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा के बीच सीट बंटवारे को लेकर उभरती खींचतान के बीच यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या दोनों दल बिहार में सामने आई परिस्थितियों से अलग रास्ता निकाल पाते हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक राजनीतिक महत्व वाला राज्य है और यहां गठबंधन की रणनीति का असर केवल राज्य की सत्ता की लड़ाई तक सीमित नहीं माना जाता। यह विपक्षी गठबंधन की आगे की राजनीतिक दिशा और उसके भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है।
--आईएएनएस
डीएससी
