वित्त मंत्री सीतारमण से बैठक के बाद व्यापारियों ने वापस लिया 'नो यूपीआई डे' का आह्वान
नई दिल्ली, 30 सितंबर (आईएएनएस)। प्रमुख व्यापारिक संगठनों ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ हुई बैठक के बाद 2 अक्टूबर को प्रस्तावित 'नो यूपीआई डे' के आह्वान को वापस ले लिया है। यह फैसला राष्ट्रीय राजधानी में बुधवार को हुई बैठक के बाद लिया गया, जिसमें व्यापारिक समुदाय ने 2,000 रुपए से अधिक के मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत शुल्क को लेकर अपनी चिंताएं सरकार के सामने रखीं।
बैठक में देश के विभिन्न राज्यों से आए लगभग 20 व्यापार प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व चांदनी चौक से सांसद और कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने किया। व्यापारियों ने कहा कि प्रस्तावित शुल्क से छोटे और मध्यम कारोबारियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है और डिजिटल भुगतान को अपनाने की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।
प्रतिनिधियों ने सरकार से प्रस्तावित शुल्क को लेकर स्पष्टता मांगी और आग्रह किया कि इस निर्णय पर अमल से पहले व्यापारिक समुदाय की चिंताओं को ध्यान में रखा जाए। इससे पहले ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स फेडरेशन और ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन ने शुल्क के विरोध में 2 अक्टूबर को 'नो यूपीआई डे' मनाने की घोषणा की थी।
हालांकि, वित्त मंत्री के साथ चर्चा के बाद दोनों संगठनों ने अपना विरोध कार्यक्रम वापस लेने का फैसला किया।
बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि सरकार के साथ सकारात्मक और रचनात्मक संवाद हुआ तथा व्यापारियों को भरोसा दिलाया गया कि उनकी चिंताओं पर उचित विचार किया जाएगा।
प्रवीण खंडेलवाल ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल में ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन (एआईएमआरए), ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन (एआईसीपीडीएफ) और ऑल इंडिया ज्वैलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन (एआईजेजीएफ) सहित कई प्रमुख व्यापारिक संगठन शामिल थे।
इन संगठनों ने यूपीआई से संबंधित विभिन्न मुद्दों और व्यापारिक समुदाय की आशंकाओं को वित्त मंत्री के समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि वित्त मंत्री ने सभी सुझावों और चिंताओं को गंभीरता से सुना और भरोसा दिलाया कि उन पर ध्यानपूर्वक विचार किया जाएगा।
प्रवीण खंडेलवाल ने आगे कहा, "वित्त मंत्री से हुई सकारात्मक चर्चा के बाद एआईसीपीडीएफ और सीएआईटी ने 2 अक्टूबर को प्रस्तावित 'नौ यूपीआई डे' अभियान को वापस लेने का फैसला किया है।"
उन्होंने कहा कि अब 2 अक्टूबर को किसी प्रकार का 'नो यूपीआई डे' नहीं मनाया जाएगा। व्यापारिक संगठन सरकार के साथ संवाद जारी रखते हुए डिजिटल भुगतान व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने के लिए सहयोग करेंगे।
खंडेलवाल ने कहा कि अब व्यापारिक संगठन सरकार के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेंगे कि डिजिटल भुगतान प्रणाली अधिक सुरक्षित, विश्वसनीय और सभी हितधारकों के लिए लाभकारी बने।
उन्होंने कहा कि साइबर खतरों और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी सरकार के साथ चर्चा की जाएगी। इसके अलावा, विभिन्न संगठन अपने-अपने राज्यों और व्यापारिक समुदायों के बीच जागरूकता बढ़ाने का काम करेंगे ताकि डिजिटल भुगतान प्रणाली को लेकर सही जानकारी नीचे तक पहुंच सके।
उन्होंने कहा कि व्यापारिक समुदाय इस बातचीत से उत्साहित है और आगे भी इस विषय पर सरकार के साथ संवाद जारी रखेगा। हालांकि विरोध प्रदर्शन वापस लेने के बावजूद व्यापारिक संगठनों ने स्पष्ट किया कि वे प्रस्तावित शुल्क को लेकर अपनी चिंता बनाए हुए हैं।
गौरतलब है कि 2,000 रुपए से अधिक के पात्र मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लागू करने का प्रस्ताव 15 अक्टूबर से प्रभावी होने वाला है। व्यापारिक संगठनों को उम्मीद है कि उससे पहले उनकी चिंताओं का समाधान निकाला जाएगा।
इस बीच, इसी महीने नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने मीडिया के कुछ वर्गों में चल रही उन खबरों का खंडन किया था, जिनमें दावा किया गया था कि यूपीआई मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) पर जीएसटी लगने से छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और डिजिटल भुगतान महंगा हो जाएगा।
एनपीसीआई ने स्पष्ट किया था कि एमडीआर केवल 2,000 रुपए से अधिक के पी2एम (पर्सन-टू-मर्चेंट) लेनदेन पर लागू होगा। 2,000 रुपए तक के सभी यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर शून्य रहेगा और इसलिए उन पर जीएसटी का भी कोई असर नहीं पड़ेगा।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2,000 रुपए तक के लेनदेन यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन वॉल्यूम का 96 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। इसका मतलब है कि अधिकांश यूपीआई भुगतान न तो एमडीआर के दायरे में आएंगे और न ही उन पर किसी प्रकार का जीएसटी प्रभाव पड़ेगा।
फिलहाल व्यापारिक समुदाय और सरकार के बीच संवाद जारी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि 15 अक्टूबर से प्रस्तावित शुल्क अपने मौजूदा स्वरूप में लागू होता है या व्यापारियों की मांगों को ध्यान में रखते हुए इसमें कोई बदलाव किया जाता है।
--आईएएनएस
डीबीपी
