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पूर्वी हिमालय को मिले रणनीतिक और आर्थिक योगदान की पहचान, कालिम्पोंग डायलॉग में विशेषज्ञों ने रखी समावेशी विकास की रूपरेखा

कलिम्पोंग, 28 सितंबर (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल के कालिम्पोंग में सोमवार को आयोजित एक संवाद कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि पूर्वी हिमालय को भारत की आर्थिक वृद्धि, पर्यावरणीय सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और पड़ोसी देशों के साथ जुड़ाव में उसके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उचित पहचान मिलनी चाहिए इस दौरान क्षेत्र के रणनीतिक महत्व, आर्थिक संभावनाओं, जलवायु लचीलापन (क्लाइमेट रेजिलिएंस) और स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।
 

कलिम्पोंग, 28 सितंबर (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल के कालिम्पोंग में सोमवार को आयोजित एक संवाद कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि पूर्वी हिमालय को भारत की आर्थिक वृद्धि, पर्यावरणीय सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और पड़ोसी देशों के साथ जुड़ाव में उसके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उचित पहचान मिलनी चाहिए इस दौरान क्षेत्र के रणनीतिक महत्व, आर्थिक संभावनाओं, जलवायु लचीलापन (क्लाइमेट रेजिलिएंस) और स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।

चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (सीआरएफ) और ईस्टर्न हिमालयन सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी (ईएचसीपीपी) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 'ईस्टर्न हिमालयन डायलॉग 2026' का विषय 'पूर्वी हिमालय: एक रणनीतिक, लचीले और समावेशी भविष्य की ओर' था। इसमें नीति निर्माता, विद्वान, प्रैक्टिशनर, संस्थागत नेता और क्षेत्रीय हितधारक एक साथ आए।

नीति विशेषज्ञों ने कहा कि कनेक्टिविटी, सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और विकास को एक साथ संबोधित करने वाले नीतिगत ढांचे की आवश्यकता है। यह क्षेत्र सीमा-पार व्यापार, तेजी से विकसित हो रहे बुनियादी ढांचे, पर्यावरणीय संवेदनशीलता, बदलते जनसांख्यिकीय पैटर्न और राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के संगम पर स्थित है। चर्चा में इस बात पर विचार किया गया कि नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा करते हुए, संस्थागत ढांचे को मजबूत बनाते हुए और स्थानीय समुदायों के हितों को ध्यान में रखते हुए आर्थिक अवसरों का लाभ कैसे उठाया जाए।

सीआरएफ के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने पूर्वी हिमालय पर निरंतर नीतिगत ध्यान देने और स्थानीय वास्तविकताओं को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “पूर्वी हिमालय पर पूर्वी हिमालय में ही संवाद आयोजित करने से यह तय होता है कि चर्चा में कौन भाग ले सकता है और हमें किस तरह के विचार सुनने को मिलेंगे। इससे यहां रहने और काम करने वाले लोगों को उन चर्चाओं में सीधे भागीदारी का अवसर मिलता है, जो अक्सर उनसे दूर रहकर आकार लेती हैं।”

‘द ईस्टर्न हिमालयाज एंड इंडियाज़ फ्यूचर’ विषय पर मुख्य वक्तव्य देते हुए सिक्किम सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार और इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के वरिष्ठ सलाहकार महेंद्र पी. लामा ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति क्षेत्र की अत्यधिक संवेदनशीलता और मौजूदा नीतिगत दृष्टिकोणों पर पुनर्विचार की जरूरत को रेखांकित किया।

प्रोफेसर लामा ने कहा, “पूर्वी हिमालय एक खतरनाक त्रिकोणीय संकट का सामना कर रहा है। जो समुदाय जलवायु परिवर्तन में बहुत कम योगदान देते हैं, वही इसके सबसे अधिक दुष्प्रभाव झेल रहे हैं, जबकि स्थानीय ज्ञान को अभी भी पर्याप्त मान्यता नहीं मिल रही है।” उन्होंने कनेक्टिविटी को एकीकरण का साधन, सीमाओं को अवसर और सामुदायिक ज्ञान को लचीलेपन (रेजिलिएंस) के संसाधन के रूप में देखने की वकालत की।

संवाद में जलवायु लचीलापन एक प्रमुख विषय रहा। इसमें हिमनदों के तेजी से पिघलने, बदलती नदी प्रणालियों, चरम मौसमी घटनाओं और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्रों पर बढ़ते दबाव के समुदायों पर प्रभावों की समीक्षा की गई। साथ ही इनके जल सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, जैव विविधता, बुनियादी ढांचे और आजीविका पर पड़ने वाले व्यापक असर पर भी चर्चा हुई।

‘रेजिलिएंट हिमालय के विकास के लिए परिवर्तनकारी दृष्टिकोण’ विषय पर विशेष संबोधन देते हुए पद्मश्री एकलव्य शर्मा, जो एशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट में रणनीतिक सलाहकार और विशिष्ट वरिष्ठ फेलो हैं, ने हिमालय को व्यापक और समग्र दृष्टिकोण से देखने की जरूरत बताई।

उन्होंने कहा, “हिमालय को केवल संरक्षण क्षेत्रों या विकास के लाभार्थियों के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे प्राकृतिक बुनियादी ढांचे के रूप में पहचानने की आवश्यकता है जो पहाड़ों से कहीं आगे तक लोगों के जीवन, अर्थव्यवस्थाओं और पारिस्थितिकी तंत्रों को सहारा देता है। हमें बिखरी हुई परियोजनाओं से आगे बढ़कर ऐसे समग्र दृष्टिकोण अपनाने होंगे जो विज्ञान, नीति और व्यवहार को एक साथ जोड़ें और जिनमें समुदाय समाधान के सह-भागीदार हों।”

जलवायु लचीलापन संवाद का एक प्रमुख फोकस था, जिसमें चर्चाओं में इस बात की जांच की गई कि ग्लेशियरों का पिघलना, बदलती नदी प्रणालियां, चरम मौसम और पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र पर बढ़ता दबाव समुदायों को कैसे प्रभावित करता है और जल सुरक्षा, आपदा तैयारियों, जैव विविधता, बुनियादी ढांचे और आजीविका के लिए व्यापक निहितार्थ रखता है।

'लचीले हिमालय के विकास के लिए परिवर्तनकारी दृष्टिकोण' पर एक विशेष संबोधन में, अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड एनवायरनमेंट (एटीआरईई) के रणनीतिक सलाहकार और विशिष्ट वरिष्ठ फेलो, पद्मश्री एकलव्य शर्मा ने हिमालय को अधिक व्यवस्थित दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा, "हिमालय को केवल संरक्षण के क्षेत्रों या विकास के लाभार्थियों के रूप में नहीं, बल्कि प्राकृतिक बुनियादी ढांचे के रूप में पहचाने जाने की आवश्यकता है जो पहाड़ों से कहीं आगे जीवन, अर्थव्यवस्थाओं और पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखता है। हमें खंडित परियोजनाओं से आगे बढ़कर व्यवस्थित दृष्टिकोणों की ओर बढ़ने की जरूरत है जो विज्ञान, नीति और व्यवहार को एक साथ लाए, जिसमें समुदाय समाधान के सह-स्वामी हों।"

चर्चाओं में इस बात की भी जांच की गई कि कैसे प्रवास, शहरीकरण और युवा पीढ़ी की बदलती आकांक्षाएं स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं और सामाजिक संरचनाओं को नया आकार दे रही हैं। प्रतिभागियों ने सतत आजीविका, मानव पूंजी, सेवा वितरण और मजबूत संस्थानों को क्षेत्रीय विकास के लिए प्राथमिकताओं के रूप में चिन्हित किया।

प्रतिभागियों ने बुनियादी ढांचे और पारिस्थितिकी, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और स्थानीय आकांक्षाओं, और आर्थिक परिवर्तन और संस्थागत क्षमता के बीच मजबूत संबंधों का आह्वान किया।

--आईएएनएस

केके/वीसी