वित्त विभाग की सलाह का मतलब सरकार का दिवालिया होना नहीं: कर्नाटक सरकार
बेंगलुरु, 24 सितंबर (आईएएनएस)। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री और राजस्व मंत्री जी परमेश्वर ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए वित्त विभाग की ओर से दी गई सलाह का यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि राज्य सरकार दिवालिया हो गई है या उसके पास पैसे नहीं हैं।
विधानसभा में सूखे की स्थिति पर चर्चा के दौरान सरकार की ओर से जवाब देते हुए परमेश्वर ने विपक्ष के उन आरोपों को खारिज कर दिया कि सरकार सूखे से निपटने में विफल रही है या वित्तीय संकट का सामना कर रही है।
उन्होंने कहा कि वित्त विभाग की जिम्मेदारी है कि वह सरकार को जरूरत से ज्यादा खर्च करने को लेकर सतर्क करे और यह सुनिश्चित करे कि खर्च बजट और वित्त विधेयक में मंजूर सीमा के भीतर रहे।
परमेश्वर ने कहा, "अगर बजट में तय राशि से ज्यादा खर्च करने का प्रस्ताव आता है तो वित्त विभाग स्वाभाविक रूप से पूछता है कि अतिरिक्त पैसा कहां से आएगा। अगर अतिरिक्त खर्च जरूरी है तो सप्लीमेंट्री बजट पेश करना होगा और इसके लिए विधानसभा की मंजूरी लेनी होगी।"
परमेश्वर ने कहा कि पिछली सरकारों के दौरान भी वित्त विभाग की ओर से इस तरह की सलाह दी जाती रही है।
उन्होंने बताया कि फरवरी 2022 में बसवराज बोम्मई सरकार के दौरान वित्त विभाग ने चेतावनी दी थी कि तय खर्च बढ़ने और राजस्व बढ़ाने के सीमित विकल्पों के कारण राजस्व अधिशेष वाला बजट पेश करना मुश्किल हो सकता है।
फरवरी 2023 में जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार सातवें वेतन आयोग को लागू करने पर विचार कर रही थी, तब वित्त विभाग ने चेताया था कि इसे तुरंत लागू करने से एफआरबीएम की सीमा प्रभावित हो सकती है और सरकार को अतिरिक्त कर्ज लेना पड़ सकता है।
उन्होंने जनवरी 2020 में बीएस येदियुरप्पा सरकार के समय दी गई सलाह का भी जिक्र किया, जब राजस्व संग्रह लक्ष्य का करीब 70 प्रतिशत रह गया था।
परमेश्वर ने कहा, "तो क्या हम यह कह सकते हैं कि उस समय सरकार दिवालिया हो गई थी? इस तरह की सलाह देना वित्त विभाग के सामान्य कामकाज का हिस्सा है।"
राज्य की मौजूदा वित्तीय स्थिति पर परमेश्वर ने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में राजकोषीय घाटा 2.95 प्रतिशत है, जबकि एफआरबीएम व्यवस्था के तहत इसकी सीमा 3 प्रतिशत है।
उन्होंने बताया कि राजस्व घाटा 22,957 करोड़ रुपए है, जबकि राज्य की कुल देनदारियां जीएसडीपी की 24.94 प्रतिशत हैं, जो निर्धारित 25 प्रतिशत की सीमा के करीब हैं।
उन्होंने कहा कि वित्त विभाग ने 2026-27 और 2027-28 में कुल 1,000 करोड़ रुपए की जरूरत वाली एक प्रस्तावित योजना को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह दी थी। विभाग ने सुझाव दिया था कि योजना लागू करने से पहले इसके लिए पैसा निर्धारित किया जाए या दूसरी जगह से राशि का आवंटन किया जाए।
परमेश्वर ने कहा, "यह वित्तीय सलाह है। इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार के पास पैसा नहीं है।"
सूखे से निपटने के लिए उठाए गए कदमों पर परमेश्वर ने कहा कि 13 अप्रैल को भारत मौसम विज्ञान विभाग की ओर से दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से पांच प्रतिशत कम रहने की चेतावनी मिलने के तीन दिन के भीतर सरकार ने कार्रवाई शुरू कर दी थी।
उन्होंने कहा कि सिद्दारमैया ने 16 अप्रैल को उपायुक्तों और जिला पंचायत के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के साथ बैठक की थी। इस बैठक में डीके शिवकुमार समेत कई मंत्री शामिल हुए और विभागों को एहतियाती कदम उठाने के लिए आपसी तालमेल के साथ काम करने का निर्देश दिया गया।
इसके बाद से सैकड़ों बैठकें, निरीक्षण और समीक्षा की गई हैं।
कर्नाटक में कुल मिलाकर बारिश में 36 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई और 177 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया।
सरकार ने पीने के पानी की व्यवस्था को प्राथमिकता दी। इसके लिए 117 करोड़ रुपए जारी किए गए, जबकि विधायकों के जरिए 189 करोड़ रुपए उपलब्ध कराए गए। प्रत्येक विधायक को पीने के पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक करोड़ रुपए दिए गए।
परमेश्वर ने बताया कि राज्य के 111 तालुकों के 531 गांवों और 15 शहरी स्थानीय निकायों के 81 वार्डों में पीने के पानी की समस्या सामने आई है।
इन इलाकों में टैंकरों, निजी बोरवेल और नए खोदे गए बोरवेल के जरिए पानी की आपूर्ति की जा रही है।
उन्होंने कहा कि पीने के पानी और पशुओं के चारे की जरूरतों के लिए एसडीआरएफ के तहत पीडी खातों में करीब 420 करोड़ रुपए उपलब्ध हैं।
परमेश्वर ने कहा, "पानी की कोई कमी नहीं है। अगर नियमित या प्रशासनिक समस्याएं सामने आती हैं तो उनका अलग से समाधान किया जाना चाहिए।"
उन्होंने कहा कि सरकार जमीनी स्तर पर स्थिति का आकलन करने और जिला अधिकारियों के साथ तालमेल के जरिए हालात पर लगातार नजर रख रही है।
--आईएएनएस
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