शिवसेना (यूबीटी) ने गोकुल मिल्क यूनियन चुनाव में जनादेश पलटने का महाराष्ट्र सरकार पर लगाया आरोप
मुंबई, 7 नवंबर (आईएएनएस)। शिवसेना (यूबीटी) ने शनिवार को महायुति सरकार पर 'सहकारी लोकतंत्र' को कमजोर करने का आरोप लगाया। पार्टी ने कहा कि सरकार ने गोकुल मिल्क यूनियन (कोल्हापुर जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ) में गैर-आधिकारिक 'विशेषज्ञ' निदेशकों को नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। शिवसेना का आरोप है कि इस कदम का मकसद हाल ही में हुए चुनावों में मतदाताओं के फैसले को पलटना है।
पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में ठाकरे गुट ने कहा कि मुख्य विवाद गोकुल मिल्क यूनियन के हालिया चुनावों के नतीजों को लेकर है। यह यूनियन कोल्हापुर के लगभग 5.5 लाख डेयरी किसानों के लिए आर्थिक और राजनीतिक जीवनरेखा का काम करती है।
सतेज पाटिल के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 13 सीटें जीतीं जबकि हसन मुश्रीफ के नेतृत्व वाले महायुति समर्थित गुट को 12 सीटें मिलीं। अपनी हार को देखते हुए राज्य सरकार ने सहकारी नियमों में बदलाव किया और अतिरिक्त निदेशकों की नियुक्ति का प्रावधान जोड़ दिया। इस तरह, 12 सीटों वाले अल्पसंख्यक गुट को 16 सदस्यों वाले सत्ताधारी गुट में बदल दिया गया जबकि चुनाव में 13 सीटों के साथ बहुमत पाने वाले गुट को दरकिनार कर दिया गया।
संपादकीय में कहा गया है कि गोकुल यूनियन पर कब्जा करने के लिए नियमों को जल्दबाजी में बदला गया जबकि जिले के प्रमुख सहकारी बैंकों और सहकारी चीनी मिलों को इस तरह के हस्तक्षेप से दूर रखा गया।
संपादकीय में आरोप लगाया गया, "गोकुल में भगवान कृष्ण 'माखन-चोर' के रूप में प्रसिद्ध थे। 'माखन-चोर' कृष्ण के बचपन का सबसे प्यारा नाम है। गोकुल-वृंदावन में नंद और माता यशोदा के साथ बड़े होते हुए, कन्हैया (भगवान कृष्ण) माखन चुराया करते थे। अगर गोपियां माखन के मटकों को ऊंचाई पर भी टांग देतीं, तो भी वे अपने दोस्तों के कंधों पर चढ़कर मटके फोड़ देते और दही, दूध और माखन खा लेते थे। कृष्ण तो सिर्फ माखन चुराते थे लेकिन आज के भाजपाई चालबाजों ने तो पूरा 'गोकुल' ही लूट लिया है।"
शिवसेना (यूबीटी) ने संपादकीय में लिखा, "इस लूट ने न केवल महाराष्ट्र में, बल्कि पूरे देश में खलबली मचा दी है। गोकुल मिल्क यूनियन (कोल्हापुर जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ) से सत्ता छीनने के लिए, यूनियन में 'विशेषज्ञ' निदेशकों को नियुक्त करने की गुंडागर्दी शुरू की गई है।"
संपादकीय में बताया गया है कि यह पुनर्गठन विशेष रूप से उन हाई-प्रोफाइल लोगों (जिनमें शौमिका महाडिक और नावेद मुशरीफ शामिल हैं) को वापस लाने के लिए तैयार किया गया है, जिन्हें कोल्हापुर के दुग्ध उत्पादकों ने चुनावों में स्पष्ट रूप से नकार दिया था। विपक्ष के नेताओं ने कैबिनेट के इस फैसले की कड़ी आलोचना की है और इसे सत्ताधारी खेमे में मची घबराहट का संकेत बताया है।
ठाकरे गुट ने कहा, "जो सरकार लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए बहुमत को अपना नेतृत्व खुद चुनने का अधिकार नहीं देती, वह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के साथ विश्वासघात करती है।" उन्होंने राज्य स्तर पर हो रही इन चालों की तुलना राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे राजनीतिक तनावों से की।
संपादकीय के अनुसार, 'गोकुल' पर नियंत्रण के इस कदम ने पूरे महाराष्ट्र में सहकारी संस्थाओं की पवित्रता को लेकर एक तीखी बहस छेड़ दी है। ऐतिहासिक रूप से, ये संस्थाएं राज्य सरकार के सीधे हस्तक्षेप या सूक्ष्म प्रबंधन (माइक्रो-मैनेजमेंट) से स्वतंत्र होकर काम करती रही हैं। अब जब कानूनी चुनौतियां सामने खड़ी हैं, तो कोल्हापुर के डेयरी किसान और सहकारी सदस्य इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए हैं।
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना का तर्क है कि जो मामला कभी एक क्षेत्रीय दुग्ध संघ के सामान्य चुनाव जैसा था, वह अब संस्थागत स्वायत्तता, बहुमत के शासन और महाराष्ट्र में जमीनी स्तर के लोकतंत्र के भविष्य को लेकर एक बड़ी और अहम लड़ाई में बदल गया है।
--आईएएनएस
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