Aapka Rajasthan

ई-चालान को बिजली बिल से जोड़ने का आदेश एससी के लिखित आदेश में नहीं, सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी थी

नई दिल्ली, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर लंबित ई-चालान की राशि को बिजली बिल से जोड़कर वसूलने का सुझाव सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणी थी। यह निर्देश शीर्ष अदालत के लिखित आदेश में शामिल नहीं है। गुरुवार को अपलोड किए गए आदेश में अदालत ने लंबित ई-चालानों की प्रभावी वसूली के लिए कई अन्य उपायों का उल्लेख किया है।
 

नई दिल्ली, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर लंबित ई-चालान की राशि को बिजली बिल से जोड़कर वसूलने का सुझाव सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणी थी। यह निर्देश शीर्ष अदालत के लिखित आदेश में शामिल नहीं है। गुरुवार को अपलोड किए गए आदेश में अदालत ने लंबित ई-चालानों की प्रभावी वसूली के लिए कई अन्य उपायों का उल्लेख किया है।

जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ सड़क सुरक्षा से जुड़े लंबे समय से लंबित मामले की सुनवाई कर रही थी। सोमवार को सुनवाई के दौरान पीठ ने सुझाव दिया था कि लंबित ट्रैफिक चालानों की राशि की वसूली सुनिश्चित करने के लिए इसे बिजली बिलों में जोड़ने की संभावना पर संबंधित अधिकारी विचार कर सकते हैं। हालांकि, उसी दिन पारित आदेश, जिसे गुरुवार को अपलोड किया गया, उसमें ई-चालान को बिजली बिल से जोड़ने का कोई निर्देश नहीं है।

लिखित आदेश में अदालत ने लंबित ई-चालान की वसूली के लिए कई ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। इनमें ऑनलाइन वाहन संबंधी सेवाओं को फ्रीज करना, वाहन के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के नवीनीकरण या नए रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जारी करने पर रोक लगाना और लंबित बकाया का भुगतान होने तक वाहन मालिक का पता अपडेट करने के अनुरोध पर कार्रवाई नहीं करना शामिल है।

पीठ ने निर्देश दिया कि सभी लंबित ट्रैफिक जुर्माने का भुगतान होने तक वाहन का फिटनेस सर्टिफिकेट जारी नहीं किया जाए। इसके अलावा, जिन वाहनों पर ई-चालान लंबित हैं, उन्हें परिवहन पोर्टल ‘परिवहन’ पर ब्लैकलिस्ट करने को कहा गया है। इससे ऐसे वाहनों की बिक्री और उनके स्वामित्व के हस्तांतरण में भी बाधा आएगी।

अदालत ने यह भी कहा कि कई बार ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वाले मामलों में ड्राइविंग लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही, पहले से जारी लाइसेंस को निलंबित करने के लिए भी कदम उठाने का निर्देश दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लंबित चालान का भुगतान होने तक किसी भी केंद्र को वाहन का प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र यानी पीयूसी सर्टिफिकेट जारी करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। अदालत ने वाहनों की रैंडम जांच करने का भी निर्देश दिया। यदि किसी वाहन के खिलाफ जारी ई-चालान का भुगतान नहीं किया गया है, तो जरूरत पड़ने पर वाहन को जब्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है।

ये निर्देश मोटर वाहन अधिनियम, 1988 और केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के सड़क सुरक्षा तथा इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन से जुड़े प्रावधानों के क्रियान्वयन से संबंधित एक लंबे समय से लंबित रिट याचिका की सुनवाई के दौरान दिए गए।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वह इस मामले की निगरानी करीब 14 वर्षों से कर रही है। मौजूदा पीठ भी एक वर्ष से अधिक समय से मामले की सुनवाई कर रही है और इस दौरान सड़क सुरक्षा से जुड़े वैधानिक प्रावधानों को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए कई निर्देश जारी किए गए हैं।

पीठ ने कहा कि केवल नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को ई-चालान जारी करते रहना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा कि पुलिस हजारों और लाखों ई-चालान जारी कर सकती है, लेकिन सवाल यह है कि इन चालानों के माध्यम से लगाए गए जुर्माने की वसूली कैसे की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अलग-अलग समय में जारी किए गए ई-चालानों के संबंध में करीब 49,194.05 करोड़ रुपये की राशि वसूलनी है। इसमें से अब तक लगभग 26,175.05 करोड़ रुपये की वसूली की जा चुकी है।

अदालत ने कहा कि अधिकारियों को जमीनी स्तर पर काम करने और वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रभावी व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है। केवल ई-चालान जारी करना पर्याप्त नहीं है, जब तक उसके जरिए लगाए गए जुर्माने की प्रभावी वसूली सुनिश्चित न हो।

पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा 28 अक्टूबर 2025 को तैयार किए गए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) को लागू करने का निर्देश दिया। साथ ही, मोटर वाहन अधिनियम की धारा 136ए और केंद्रीय मोटर वाहन नियमों के नियम 167ए के अनुपालन को सुनिश्चित करने को कहा।

राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड को इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन की निगरानी करने का निर्देश भी दिया गया है।

पीठ ने मामले में न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल से एक चार्ट तैयार करने को कहा है। इसमें मामले की निगरानी शुरू होने के बाद जारी किए गए सभी निर्देश, प्रत्येक निर्देश की तारीख, उसके अनुपालन के लिए दी गई समय-सीमा, मौजूदा स्थिति और न्यायमित्र की टिप्पणियां शामिल होंगी।

शीर्ष अदालत ने दिल्ली के मुख्य सचिव को भी दिल्ली हाईकोर्ट और मथुरा रोड स्थित राष्ट्रीय प्राणी उद्यान के पास पैदल यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े अपने पहले के निर्देशों के अनुपालन पर रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि उसके निर्देशों का पालन नहीं हुआ तो अगली सुनवाई में दिल्ली के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उपस्थित होना पड़ सकता है।

मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर को दोपहर 2 बजे होगी।

--आईएएनएस

डीएससी