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यूपीआई एमडीआर फ्रेमवर्क पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, चार सप्ताह में केंद्र सरकार से मांगा जवाब

नई दिल्ली, 28 सितंबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार के उस हालिया फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें 2,000 रुपए से अधिक के कुछ खास हाई-वैल्यू यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने का प्रावधान है। कोर्ट ने इस चरण में इस फ्रेममवर्क को लागू करने पर तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया।
 

नई दिल्ली, 28 सितंबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार के उस हालिया फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें 2,000 रुपए से अधिक के कुछ खास हाई-वैल्यू यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने का प्रावधान है। कोर्ट ने इस चरण में इस फ्रेममवर्क को लागू करने पर तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की बेंच ने इस मामले में केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई), नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) और यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी से चार सप्ताह के अंदर जवाब मांगा है।

वकील आशुतोष दुबे के जरिए वकील अंजन दत्ता की तरफ से दायर याचिका में केंद्र सरकार के 14 सितंबर, 2026 के उस गैजेट नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई है, जो पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10ए के तहत जारी किया गया था। साथ ही, 15 सितंबर को घोषित उस फ्रेमवर्क को भी चुनौती दी गई है जिसके तहत 2,000 रुपए से रुपए के खास पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लगाया जाना है।

केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एन. वेंकटरमन ने कहा कि ये चार्ज 15 अक्टूबर से लागू होंगे और 96 प्रतिशत ट्रांजैक्शन पर यह चार्ज नहीं लगेगा।

एन. वेंकटरमन यह भी कहा कि जरूरी सेवाओं के लिए चार्ज की सीमा 5 रुपए तय की गई है। यह जबरदस्ती कब्जा करने जैसा नहीं है। उन्होंने समझाया कि प्रस्तावित चार्ज पेमेंट एग्रीगेटर और बैंकों के बीच एक सेटलमेंट फीस है और सरकार को इसका कोई हिस्सा नहीं मिल रहा है।

उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने में बैंकों का खर्च आता है और क्रेडिट व डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगते हैं, जबकि यूपीआई पेमेंट को अब तक ऐसे चार्ज से छूट मिली हुई है। उन्होंने कहा कि यूपीआई इकोसिस्टम को ठीक से काम करते रहने के लिए यह लेवी जरूरी है।

इन दलीलों को सुनने के बाद सीजेआई की अध्यक्षता वाली बेंच ने हलफनामे पर संबंधित तथ्य और जानकारी मांगी और मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद के लिए तय कर दी।

याचिकाकर्ता का कहना है कि यह ढांचा मनमाना और भेदभावपूर्ण है और बिना किसी उचित कानूनी सुरक्षा के पूरे देश पर वित्तीय बोझ डालता है। याचिका में कहा गया है कि चुनौती सुरक्षित और मजबूत पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए रखने के मकसद को नहीं, बल्कि उस तरीके को दी गई है जिससे वित्तीय बोझ बनाया, वर्गीकृत और बांटा गया है।

इसमें 2,000 रुपए की ट्रांजैक्शन सीमा 1 लाख रुपए की मासिक-प्राप्ति वर्गीकरण, अलग-अलग सेक्टर की दरें और 75,000 रुपए की अधिकतम सीमा तय करने के आधार पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का दावा है कि इन वर्गीकरणों के लिए कोई ठोस आधार नहीं बताया गया है।

याचिका में खुद उस सीमा पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिसमें बताया गया है कि 2,001 रुपए के ट्रांजैक्शन पर प्रतिशत के हिसाब से शुल्क लगेगा, जबकि 2,000 रुपए के ट्रांजैक्शन पर नहीं।

याचिकाकर्ता ने ढांचा तय करने में यूपीआई और सेवा संचालन समिति की भूमिका को भी चुनौती दी है। उनका तर्क है कि दरें तय करने और वर्गीकरण से जुड़े अहम फैसले स्पष्ट विधायी नीति, मानकों, प्रकाशन और नियामक निगरानी के बिना किसी और को नहीं सौंपे जा सकते।

याचिकाकर्ता के वकील ने फ्रेमवर्क को लागू करने पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की और तर्क दिया कि अगर चार्ज लागू होते हैं तो भ्रष्टाचार बढ़ सकता है, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस चरण में रोक लगाने से इनकार कर दिया।

यह याचिका 2,000 से ज्यादा के कुछ खास पी2एम यूपी ट्रांजैक्शन पर प्रस्तावित 0.4 फीसदी एमडीआर को चुनौती देती है। इसमें 75,000 और उससे ज्यादा के ट्रांजैक्शन के लिए चार्ज की सीमा 300 रुपए तय की गई है और कुछ सेक्टर के लिए अलग-अलग दरें रखी गई हैं।

इस याचिका में उस फैसले से जुड़े सभी रिकॉर्ड पेश करने की मांग की गई है। इसमें यूपीआई और सर्विसेज स्टीयरिंग कमिटी का कानूनी आधार, उसका गठन और अधिकार, उसके फैसले और मीटिंग की जानकारी और एमडीआर की दरें तय करने और प्राइवेट इकोसिस्टम में शामिल लोगों के बीच इसे बांटने का कानूनी आधार शामिल है।

याचिका में इस फ्रेमवर्क को रद्द करने या रोकने की भी मांग की गई है, क्योंकि यह 2,000 रुपए से ज्यादा के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लगाता है।

इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने मांग की है कि पारदर्शी बातचीत, डेटा पब्लिश करने और असर का आकलन करने के बाद इस फ्रेमवर्क पर फिर से विचार किया जाए। साथ ही माइक्रो और छोटे उद्योगों के लिए सुरक्षा उपाय भी किए जाएं।

केंद्र सरकार का कहना है कि बदले हुए फ्रेमवर्क का मकसद यूपीआई इकोसिस्टम की आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने कहा था कि अधिक कीमत वाले मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर थोड़ी फीस लेने से इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सिक्योरिटी और टियर 3-4 शहरों और ग्रामीण इलाकों में छोटे व्यापारियों की मदद के लिए फंड जुटाने में मदद मिलेगी।

केंद्र सरकार ने यह भी कहा है कि ग्राहकों के लिए यूपीआई मुफ्त रहेगा और व्यक्ति-से-व्यक्ति ट्रांजैक्शन, चाहे रकम कितनी भी हो, मुफ्त रहेंगे।

सरकार ने कहा कि यूपीआई क्यूआर कोड के जरिए हर महीने 1 लाख रुपए तक कमाने वाले व्यापारियों पर कोई चार्ज नहीं लगेगा, जबकि 2,000 रुपए से कम के 95 प्रतिशत से ज्यादा मर्चेंट पेमेंट मुफ्त रहेंगे।

आरबीआई ने भी अधिक कीमत वाले यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लागू करने को डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम की लंबे समय की स्थिरता को मजबूत करने की दिशा में एक कदम बताया है। साथ ही यह भी कहा है कि यूजर्स के लिए सभी यूपीआई ट्रांजैक्शन मुफ्त रहेंगे।

--आईएएनएस

ओपी/वीसी