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सबरीमाला समीक्षा: करोड़ों लोगों की आस्था को ‘गलत’ ठहराना अदालत के लिए सबसे कठिन काम: सुप्रीम कोर्ट

इस्लामाबाद, 15 अप्रैल (आईएएनएस)। हाल ही में इस्लामाबाद में हुई अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता से अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सके, लेकिन फारस की खाड़ी में स्थायी और न्यायपूर्ण शांति के लिए शांति प्रक्रिया को अन्य माध्यमों से आगे बढ़ाने की जरूरत है। यह बात एक रिपोर्ट में कही गई है।
 
सबरीमाला समीक्षा: करोड़ों लोगों की आस्था को ‘गलत’ ठहराना अदालत के लिए सबसे कठिन काम: सुप्रीम कोर्ट

इस्लामाबाद, 15 अप्रैल (आईएएनएस)। हाल ही में इस्लामाबाद में हुई अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता से अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सके, लेकिन फारस की खाड़ी में स्थायी और न्यायपूर्ण शांति के लिए शांति प्रक्रिया को अन्य माध्यमों से आगे बढ़ाने की जरूरत है। यह बात एक रिपोर्ट में कही गई है।

नई दिल्ली, 15 अप्रैल (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि किसी संवैधानिक अदालत के लिए सबसे कठिन कार्यों में से एक है करोड़ों लोगों की धार्मिक मान्यताओं को गलत या त्रुटिपूर्ण घोषित करना।

नौ जजों की संविधान पीठ, जिसकी अगुवाई जस्टिस सूर्य कांत कर रहे हैं, सबरीमाला समीक्षा मामले की सुनवाई कर रही है। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है।

सुनवाई के दौरान पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलों पर विचार किया, जो त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से पेश हुए। बोर्ड ने ‘आवश्यक धार्मिक प्रथाओं’ के सिद्धांत को जारी रखने का विरोध किया है।

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “अदालत के लिए सबसे कठिन काम यह हो सकता है कि वह करोड़ों लोगों की आस्था को गलत घोषित करे।” इसके साथ ही अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या धार्मिक आस्था और प्रथाओं से जुड़े मामलों में गैर-विश्वासियों द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई होनी चाहिए।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने धार्मिक मामलों में अत्यधिक न्यायिक हस्तक्षेप के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा, “सामाजिक कल्याण सुधार के नाम पर हम धर्म को खोखला नहीं कर सकते।”

वहीं, सिंगवी ने अदालत से ‘आवश्यक धार्मिक प्रथाओं’ के परीक्षण को खत्म करने की मांग की। उनका तर्क था कि यह सिद्धांत न्यायाधीशों को यह तय करने का अधिकार देता है कि किसी धर्म का कौन-सा हिस्सा ‘आवश्यक’ है और कौन-सा नहीं, जो उचित नहीं है।

उन्होंने कहा, “जैसे ही ‘आवश्यक’ या ‘अभिन्न’ शब्दों का उपयोग किया जाता है, अदालतें धर्म की परिभाषा तय करने लगती हैं, जो न्यायिक अतिक्रमण है।” सिंहवी ने यह भी कहा कि धार्मिक मान्यताओं का मूल्यांकन उसी समुदाय के नजरिए से होना चाहिए, जो उन्हें मानता है, न कि बाहरी या न्यायिक मानकों से।

उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई प्रथा ईमानदारी और सच्चे विश्वास के साथ धर्म का हिस्सा मानी जाती है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण मिलना चाहिए, बशर्ते वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक अधिकारों के खिलाफ न हो।

हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि अदालतें “अत्यधिक मामलों” में हस्तक्षेप कर सकती हैं, जैसे जब कोई प्रथा जीवन या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बनती हो। लेकिन धार्मिक मामलों में पीआईएल स्वीकार करने के लिए मानदंड अन्य मामलों की तुलना में अधिक सख्त होने चाहिए।

इस बीच, त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से दायर लिखित दलीलों में भी अदालत से अनुरोध किया गया है कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की “समुदाय-केंद्रित और व्यक्तिपरक” व्याख्या अपनाई जाए और आस्था-आधारित प्रथाओं की न्यायिक पुनर्व्याख्या से बचा जाए।

सुप्रीम कोर्ट फिलहाल यह भी जांच कर रहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता और अन्य मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए, धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा की सीमा क्या हो और अनुच्छेद 25 व 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों का दायरा कितना है।

सबरीमाला मुद्दे के अलावा, संविधान पीठ मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों और दरगाहों में प्रवेश, अंतरधार्मिक विवाह के बाद पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिरों में प्रवेश, बहिष्कार की वैधता और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला जननांग विकृति जैसे मुद्दों पर भी विचार करेगी।

--आईएएनएस

डीएससी