अतिरिक्त तरलता के बीच आरबीआई ने दूसरी ओएमओ बिक्री में स्वीकार किए 25,000 करोड़ रुपए
मुंबई, 21 सितंबर (आईएएनएस)। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करने के अपने प्रयासों के तहत सोमवार को चल रहे ओपन मार्केट ऑपरेशन (ओएमओ) बिक्री कार्यक्रम के दूसरे चरण में 25,000 करोड़ रुपए की बोलियां स्वीकार कीं।
इस नीलामी में निवेशकों की मजबूत भागीदारी देखने को मिली, जिसमें कुल 84,982 करोड़ रुपए की बोलियां प्राप्त हुईं, जो अधिसूचित राशि से तीन गुना से अधिक हैं। इससे संकेत मिलता है कि आरबीआई की तरलता अवशोषण कार्रवाई के बावजूद सरकारी प्रतिभूतियों की मांग मजबूत बनी हुई है।
नीलामी के परिणामों के अनुसार, आरबीआई ने 6.10 प्रतिशत सरकारी प्रतिभूति (जीएस) 2031 के लिए 11,512 करोड़ रुपए और 7.95 प्रतिशत सरकारी प्रतिभूति 2032 के लिए 8,758 करोड़ रुपए की बोलियां स्वीकार कीं।
इसके अलावा, केंद्रीय बैंक ने 6.75 प्रतिशत जीएस 2029 के 2,300 करोड़ रुपए, 7.17 प्रतिशत जीएस 2030 के 2,250 करोड़ रुपए और 7.17 प्रतिशत जीएस 2028 के 180 करोड़ रुपए की बोलियां भी स्वीकार कीं।
हालांकि 8.28 प्रतिशत जीएस 2027 के लिए प्राप्त किसी भी बोली को स्वीकार नहीं किया गया।
यह ताजा ओएमओ बिक्री ऐसे समय हुई है जब बैंकिंग प्रणाली में तरलता की स्थिति अभी भी काफी सहज बनी हुई है। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 20 सितंबर तक बैंकिंग प्रणाली में लगभग 6.05 लाख करोड़ रुपए की अधिशेष तरलता मौजूद थी।
ओपन मार्केट ऑपरेशन केंद्रीय बैंक का एक महत्वपूर्ण मौद्रिक नीति उपकरण है, जिसके जरिए वह वित्तीय प्रणाली से अतिरिक्त नकदी निकालता है। सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री के माध्यम से आरबीआई बाजार में उपलब्ध अतिरिक्त धनराशि को अवशोषित करता है, जिससे अल्पकालिक ब्याज दरों और समग्र मौद्रिक परिस्थितियों पर बेहतर नियंत्रण बनाए रखने में मदद मिलती है।
वर्तमान तरलता अवशोषण कार्यक्रम आरबीआई की उस व्यापक योजना का हिस्सा है, जिसके तहत कुल 1 लाख करोड़ रुपए की ओएमओ बिक्री तीन चरणों में की जानी है।
इस योजना के तहत पहला चरण 17 सितंबर को 50,000 करोड़ रुपए का था, जबकि दूसरा चरण 21 सितंबर को 25,000 करोड़ रुपए का पूरा हुआ। अंतिम 25,000 करोड़ रुपए की ओएमओ बिक्री 28 सितंबर को आयोजित की जाएगी।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आरबीआई का यह कदम बैंकिंग प्रणाली में लंबे समय से बनी हुई अतिरिक्त नकदी को धीरे-धीरे सामान्य स्तर पर लाने की रणनीति का हिस्सा है। इससे मौद्रिक नीति के प्रभावी क्रियान्वयन, ब्याज दरों के बेहतर प्रबंधन और वित्तीय स्थिरता को मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।
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