पीएम-कुसुम योजना से बदली गुजरात के आदिवासी इलाकों की खेती की तस्वीर, सोलर पंप से मिला रहा सालभर पानी
गांधीनगर, 11 जून (आईएएनएस)। गुजरात के आदिवासी और दूरदराज के इलाकों में सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई व्यवस्था ने कृषि की तस्वीर बदल दी है। नर्मदा, डांग और तापी जैसे जिलों में हजारों किसान पीएम कुसुम योजना के तहत बेहतर सिंचाई, डीजल और बिजली पर कम निर्भरता तथा साल में कई फसलें उगाने की सुविधा का लाभ उठा रहे हैं।
गुजरात में इस योजना का व्यापक विस्तार हुआ है। पीएम-कुसुम योजना के कंपोनेंट-सी के तहत 695 मेगावाट क्षमता वाले 256 सौर ऊर्जा संयंत्र चालू हो चुके हैं, जिससे लगभग 2.97 लाख कृषि पंपों का सौरकरण किया गया है। राजकोट जिला 81 मेगावाट स्थापित क्षमता के साथ राज्य में सबसे आगे है।
इसके अलावा, पूरे गुजरात में 21,000 से ज्यादा सोलर वॉटर पंप काम कर रहे हैं, जिनमें दूर-दराज के आदिवासी इलाके भी शामिल हैं, जहां सिंचाई का इंफ्रास्ट्रक्चर पहले बहुत कम था।
कई किसानों के लिए यह बदलाव बहुत बड़ा रहा है। डांग जिले के उमरपाडा गांव के रामू वाघमारे ने बताया कि खेती पहले पूरी तरह मानसून पर निर्भर थी।
रामू वाघमारे ने कहा, "अच्छी बारिश का मतलब अच्छी फसल होती थी, जबकि कम बारिश से अक्सर आर्थिक तंगी हो जाती थी। बिजली की सप्लाई ठीक न होने के कारण सिंचाई के लिए रात में खेतों पर जाना पड़ता था और पानी की कमी हमेशा एक चुनौती बनी रहती थी। अब उनके खेत में सोलर पंप लगने से सूरज उगने से लेकर डूबने तक लगातार पानी मिलता है, जिससे रात में सिंचाई करने की जरूरत खत्म हो गई है। पानी की बेहतर सप्लाई की वजह से वे अब हर साल एक से ज्यादा फसल उगा पा रहे हैं।"
तापी जिले के किसानों ने भी ऐसे ही फायदे बताए हैं। गावन गांव के गावजी वसावा ने कहा कि इस इलाके में खेती पहले सिर्फ मानसून के मौसम तक ही सीमित थी।
सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई व्यवस्था के आने से किसान अब पूरे साल कई फसलें उगा पा रहे हैं। उन्होंने कहा, "कई किसान अब चारे की फसल उगा रहे हैं और पशुपालन से अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं।"
पड़ोसी नर्मदा जिले के जूना मोसदा गांव के ईश्वर वसावा ने बताया कि खेती से कम कमाई के कारण उन्हें कभी शहरों में मजदूरी का काम करना पड़ता था।
उन्होंने कहा कि इस योजना से सिंचाई की बेहतर सुविधा मिलने के कारण अब वे साल में तीन फसलें उगा पाते हैं, जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है। राज्य के ऊर्जा मंत्री ऋषिकेश पटेल के अनुसार, यह योजना खेती की पैदावार बढ़ाने के अलावा और भी कई फायदे दे रही है।
पटेल ने कहा, "यह योजना न केवल किसानों को ऊर्जा और पानी की सुरक्षा दे रही है, बल्कि डीजल की खपत कम करके पर्यावरण संरक्षण में भी अहम योगदान दे रही है।"
इस कार्यक्रम की जानकारी देते हुए पटेल ने बताया कि पीएम-कुसुम योजना के तहत तीन हिस्से (ए, बी और सी) लागू किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा, "पीएम-कुसुम योजना के हिस्से ए के तहत 163 मेगावाट के लिए बिजली खरीद समझौते (पीपीए) किए गए हैं और इससे जुड़ा काम अभी चल रहा है।"
उन्होंने बताया कि पीएम-कुसुम योजना के तहत ए, बी और सी तीन घटक लागू किए जा रहे हैं। कंपोनेंट-ए के तहत 163 मेगावाट के लिए पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) किए जा चुके हैं और संबंधित कार्य प्रगति पर है।
कंपोनेंट-बी के अंतर्गत दूरस्थ, दुर्गम और वन क्षेत्रों में स्वतंत्र सौर कृषि पंप लगाए जा रहे हैं, जहां ग्रिड बिजली उपलब्ध नहीं है या तकनीकी और आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है। इस घटक के तहत डीजल पंपों को भी सौर पंपों से बदला जा रहा है।
मंत्री ने बताया कि योजना के तहत किसानों को कुल लागत का 30 प्रतिशत केंद्रीय वित्तीय सहायता और 30 प्रतिशत राज्य सरकार की सब्सिडी मिलती है। शेष 40 प्रतिशत राशि लाभार्थी किसान को वहन करनी होती है। यह सहायता 7.5 हॉर्सपावर तक की क्षमता वाले पंपों पर लागू है।
मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने जंगली इलाकों के किसानों के लिए अतिरिक्त सहायता के उपाय शुरू किए हैं।
उन्होंने कहा कि वन क्षेत्रों के किसानों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। आदिवासी और वन क्षेत्र के किसानों को केंद्र सरकार से 30 प्रतिशत तथा राज्य सरकार से 70 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है, जिससे उन्हें कोई आर्थिक योगदान नहीं देना पड़ता। वन क्षेत्रों के गैर-आदिवासी किसानों को भी 30 प्रतिशत केंद्रीय और 70 प्रतिशत राज्य सब्सिडी मिलती है तथा उन्हें केवल नाममात्र का निश्चित शुल्क देना होता है।
पटेल ने बताया कि कंपोनेंट-बी के तहत अब तक 22,787 सौर पंप स्थापित किए जा चुके हैं। अधिकारियों के अनुसार, सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई के विस्तार से किसानों को बिजली आपूर्ति की अनिश्चितता, डीजल लागत और वर्षा पर निर्भरता जैसी पुरानी समस्याओं से राहत मिल रही है। इससे पूरे वर्ष सिंचाई, फसल विविधीकरण और कृषि उत्पादन में स्थिरता सुनिश्चित हो रही है, जबकि पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता भी कम हो रही है।
--आईएएनएस
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