पाकिस्तान में क्षेत्रीय पुनर्गठन से संरक्षण को मिलेगी नई दिशा: रिपोर्ट
इस्लामाबाद, 5 अक्टूबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान में इलाकों के नए सिरे से बंटवारे पर बहस फिर से तेज हो गई है, जिससे सिंध प्रांत एक बार फिर विवाद का केंद्र बन गया है। एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस तरह के बंटवारे की लागत मामूली नहीं है, बल्कि हर नए प्रांत के लिए गवर्नर, कैबिनेट, सचिवालय, पुलिस कमांड, प्रशासनिक मशीनरी और संसाधनों की जरूरत होती है।
ये संसाधन स्कूलों, अस्पतालों या बुनियादी ढांचे के विकास में इस्तेमाल किए जा सकते थे, लेकिन इनके बजाय इनका इस्तेमाल राजनीतिक फायदे और सौदेबाजी के लिए होने लगता है, जिससे सीमित संसाधन जनसेवा के बजाय राजनीति की भेंट चढ़ जाते हैं।
हर कुछ सालों में पंजाब या सिंध प्रांतों को बांटने के प्रस्ताव सामने आते हैं, जिन्हें मुश्किल प्रशासन का समाधान बताया जाता है। हालांकि, प्रांतों की संख्या बढ़ाने से अपने आप निवासियों और फैसला लेने वालों के बीच नजदीकी नहीं आएगी। अगर पाकिस्तान 10 या 12 नए प्रांत बनाता है तो नतीजा ज्यादा सेक्रेटेरिएट, गवर्नर और विधानसभाओं के रूप में सामने आएगा, जिससे फाइलों पर मुहर लगाने वाली नौकरशाही की एक और परत जुड़ जाएगी। सत्ता का केंद्र भौगोलिक रूप से बदल जाएगा, लेकिन पाकिस्तान में सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल (केंद्रीय नियंत्रण) का कल्चर वैसा ही रहेगा, जैसा कि 'एशियन न्यूज पोस्ट' की एक रिपोर्ट में बताया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है, "इस तरह के पुनर्गठन की लागत कम नहीं है। हर नए प्रांत के लिए गवर्नर, कैबिनेट, सेक्रेटेरिएट, पुलिस कमांड और प्रशासनिक मशीनरी की जरूरत होती है, ऐसे संसाधन जिनका इस्तेमाल स्कूलों, अस्पतालों या बुनियादी ढांचे के लिए किया जा सकता था। इससे भी बुरा यह है कि यह संरक्षण (पेट्रोनेज) के नए रास्ते बनाता है, जिससे सीमित संसाधन जनसेवा के बजाय राजनीतिक सौदेबाजी में लग जाते हैं।"
इसमें आगे कहा गया है, "चुनावी व्यवस्था इस समस्या को और बढ़ा देती है। मेट्रोपॉलिटन अर्थव्यवस्थाओं में ऐसे नेतृत्व की जरूरत होती है जो पूरे शहर के प्रति जवाबदेह हो, फिर भी पाकिस्तान में वार्डों का बिखरा हुआ ढांचा प्रतिनिधियों को अपने इलाके के लिए ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने के लिए प्रेरित करता है। नतीजा यह होता है कि ट्रांसपोर्ट प्लानिंग, हाउसिंग और आर्थिक रणनीति में तालमेल की कमी होती है, एक ऐसा बिखराव जो खुद प्रांतीय प्रशासन की नाकामियों को दर्शाता है।"
असल में, प्रांतों को लेकर बहस सिर्फ प्रशासन के बारे में नहीं है, बल्कि संसाधनों के बारे में भी है कि उन पर किसका कंट्रोल है और फायदा किसे मिलता है। 2023 से पाकिस्तान एक मुश्किल आर्थिक स्थिरीकरण कार्यक्रम से गुजर रहा है, जिसने विकास को रोक दिया है और राजकोषीय और विदेशी मुद्रा भंडार को फिर से बनाने के नाम पर लोगों पर बोझ डाला है। वे भंडार अभी भी खाली हैं, और लोगों की इच्छा के खिलाफ प्रांतों का पुनर्गठन करने से कई जातीय समूहों वाले देश में पहचान-आधारित राजनीति बढ़ने का खतरा है।
इससे पाकिस्तान के युवाओं में भी असंतोष पैदा होगा, जो पहले से ही बेरोजगारी, गरीबी और सिस्टम की नाकामी का सामना कर रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान की आधी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है, 2.8 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते, 10 में से चार बच्चों का विकास ठीक से नहीं हो पाता (स्टंटेड ग्रोथ), तीन-चौथाई लोगों को दूषित पानी मिलता है, और घरेलू व विदेशी निवेशक असुरक्षा के कारण दूर रहते हैं। 'एशियन न्यूज पोस्ट' की रिपोर्ट के अनुसार, इन सभी समस्याओं के बीच, पाकिस्तान में नए प्रांत बनाना गलत और खतरनाक लगता है। जुलाई में, पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने कहा कि देश का मौजूदा गवर्नेंस सिस्टम (शासन-प्रणाली) फेल हो चुका है और देश के सामने आ रही समस्याओं को हल करने में असमर्थ है।
पाकिस्तान इकोनॉमिक समिट में अपने भाषण में, नकवी ने मौजूदा गवर्नेंस सिस्टम में सुधार लाने के लिए राजनीतिक दलों के बीच बातचीत का आह्वान किया और नए प्रांत बनाने तथा प्रशासनिक सुधार लाने का प्रस्ताव रखा।
पाकिस्तान के प्रमुख अखबार 'डॉन' ने नकवी के हवाले से कहा, "हम जिस सिस्टम के तहत जी रहे हैं, वह फेल हो चुका है। इसके जरिए समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता।"
उन्होंने कहा कि अगर यह सिस्टम जारी रहा तो पाकिस्तान 10 साल बाद भी इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करता रहेगा और इस बात पर जोर दिया कि सिस्टम को नए सिरे से शुरू करना (रीसेट करना) जरूरी है। नकवी ने कहा कि पाकिस्तान में यह 'फेल सिस्टम' 70 सालों से चल रहा है। 'डॉन' की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने जिक्र किया कि कृषि प्रधान देश होने के बावजूद पाकिस्तान गेहूं का आयात कर रहा है।
--आईएएनएस
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