पाकिस्तान का आत्मनिर्णय का दावा पीओके में दमन की हकीकत से आंखें मूंदता है: रिपोर्ट
ढाका, 8 जनवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान द्वारा हर साल “आत्मनिर्णय” के अधिकार को लेकर दिए जाने वाले बयान इतिहास की चुनिंदा व्याख्या पर आधारित हैं और उसके कब्जे वाले क्षेत्रों में मौजूद अनसुलझी समस्याओं से ध्यान भटकाने का काम करते हैं। एक रिपोर्ट में गुरुवार को यह बात कही गई। रिपोर्ट के अनुसार, वास्तविक आत्मनिर्णय इस बात से झलकता है कि लोग अपना जीवन कैसे जीते हैं और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी कैसी है, न कि हर साल दिए जाने वाले बयानों से।
हर वर्ष 5 जनवरी को पाकिस्तान “आत्मनिर्णय के अधिकार दिवस” के रूप में मनाता है और भारत के जम्मू-कश्मीर पर अपना दावा दोहराता है।
यूरेशिया रिव्यू में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के ये बयान उसके नियंत्रण वाले क्षेत्रों- पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) और पाकिस्तान अधिकृत गिलगित-बाल्टिस्तान की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करते हैं। इन क्षेत्रों में वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति इस्लामाबाद स्थित संघीय सरकार के पास है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन इलाकों में स्थानीय प्रशासन के अधिकार सीमित हैं, स्वतंत्रता समर्थक समूहों का दमन किया जाता है, मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश है और संवैधानिक व्यवस्थाएं आत्मशासन को बाधित करती हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2019 के बाद भारत सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में किए गए विकासात्मक कदमों से आम जीवन पर सकारात्मक असर पड़ा है। सड़कों, रेलवे, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में निवेश बढ़ा है।
रिपोर्ट के अनुसार, यात्रा और व्यापार संपर्क बेहतर हुए हैं, पर्यटन में वृद्धि हुई है जिससे रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अधिक लोगों तक पहुंचा है और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) से सरकारी सहायता तक पहुंच आसान हुई है। कानूनी बदलावों से महिलाओं और वंचित वर्गों के संपत्ति अधिकार मजबूत हुए हैं और स्थानीय चुनाव भी संपन्न हुए हैं।
इसके विपरीत, रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्रों में इस तरह की प्रगति देखने को नहीं मिलती, जहां विकास की रफ्तार धीमी है और स्थानीय प्रशासन के पास सीमित नियंत्रण है।
रिपोर्ट ने पाकिस्तान के रुख में विरोधाभास को भी रेखांकित किया। इसमें कहा गया है कि पाकिस्तान कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग करता है, लेकिन अपने शासन की जांच-पड़ताल से बचता है। वह भारत पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाता है, जबकि अपने नियंत्रण वाले इलाकों में राजनीतिक स्वतंत्रताओं को सीमित करता है। वह सैन्यीकरण की आलोचना करता है, लेकिन अपने हितों के लिए सशस्त्र समूहों पर निर्भर रहता है।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और यहां संवैधानिक दर्जा, चुनावों के जरिए प्रतिनिधित्व और कार्यशील राजनीतिक संस्थाएं मौजूद हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 2019 के बाद से चुनाव और स्थानीय शासन की प्रक्रिया जारी है। मतदाता भागीदारी, आर्थिक गतिविधियों और पर्यटन के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि बड़ी संख्या में लोग स्थिरता और बेहतर आजीविका चाहते हैं। यहां के कई निवासी शिक्षा, रोजगार और विकास को प्राथमिकता देते हैं, न कि लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष को। उनकी आकांक्षाएं स्पष्ट रूप से भारतीय चरित्र की हैं, जो अस्थिरता नहीं बल्कि स्थिरता और अतीत की शिकायतों के बजाय भविष्य पर केंद्रित हैं।
पाकिस्तान की ओर से आने वाले वे कथानक, जो “हिंसा का महिमामंडन करते हैं या कश्मीर को केवल पीड़ा के क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं”, इन प्राथमिकताओं को नहीं दर्शाते, बल्कि रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान के बजाय अस्थिरता को बढ़ावा देते हैं।
--आईएएनएस
डीएससी
