'ऑपरेशन सिंदूर' ने सेना की संयुक्त, एकीकृत और भविष्य के युद्ध के लिए तैयार युद्धक क्षमता को साबित किया: जनरल द्विवेदी (आईएएनएस साक्षात्कार)
नई दिल्ली, 30 जून (आईएएनएस)। भारतीय सेना के निवर्तमान प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने मंगलवार को कहा कि हाल के वर्षों में सेना की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक ऑपरेशन सिंदूर रहा है। उन्होंने कहा कि इस अभियान ने सेना की "संयुक्त, एकीकृत और भविष्य के युद्ध के लिए तैयार युद्धक क्षमता" को प्रमाणित किया है और साथ ही भारत के सुरक्षा तंत्र की "सामूहिक ताकत" का भी प्रभावी प्रदर्शन किया है।
भारतीय सेना के निवर्तमान प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने आईएएनएस को दिए विशेष साक्षात्कार में कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने न केवल सेना की संयुक्त, एकीकृत और भविष्य के युद्ध के लिए तैयार युद्धक क्षमता को प्रमाणित किया बल्कि सेना के परिवर्तन को एक "एकीकृत संस्थागत प्रक्रिया" तथा "मल्टी-डोमेन इंटीग्रेशन" के रूप में आगे बढ़ाने की आवश्यकता को भी और मजबूत किया।
सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने राष्ट्रीय सुरक्षा में आत्मनिर्भरता, स्वदेशी रक्षा उत्पादन, युद्ध की बदलती जरूरतों के अनुरूप नई सैन्य इकाइयों, वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की स्थिति तथा अग्निपथ योजना जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी विस्तार से अपनी बात रखी।
आईएएनएस: सेना प्रमुख के रूप में अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि आप किसे मानते हैं? क्या कोई ऐसा अधूरा एजेंडा है जिसे आप आगे बढ़ाना चाहते थे?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: मैंने हमेशा उपलब्धियों को व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थागत लक्ष्यों की प्राप्ति के रूप में देखा है। हमारा ध्यान सेना के परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देने, संयुक्तता (जॉइंटनेस) को मजबूत करने, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने, नई तकनीकों को अपनाने और इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में सैनिक को रखने पर रहा है।
यदि हाल के वर्षों में भारतीय सेना की सबसे बड़ी उपलब्धि की बात करूं तो सबसे पहले ऑपरेशन सिंदूर का नाम आता है। इस अभियान ने भारतीय सेना की संयुक्त, एकीकृत और भविष्य के युद्ध के लिए तैयार युद्धक क्षमता को प्रमाणित किया। यह किसी एक व्यक्ति की सफलता नहीं थी बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था की सामूहिक शक्ति का परिचायक था। वर्षों से चल रहे कई परिवर्तनकारी प्रयास, जैसे नई तकनीकों का समावेश, संयुक्त सैन्य संचालन, सुरक्षित संचार, मल्टी-डोमेन ऑपरेशन और सटीक सैन्य कार्रवाई, इस अभियान के दौरान व्यवहारिक रूप में देखने को मिले।
दूसरी बड़ी उपलब्धि 'डिकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन' को मिली गति रही। इस दौरान सेना केवल आधुनिकीकरण पर चर्चा करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसे लागू भी किया। रुद्र ब्रिगेड, भैरव बटालियन, अशनि ड्रोन प्लाटून, शक्तिबाण रेजिमेंट, दिव्यास्त्र बैटरी और बाज़ बटालियन जैसी नई संरचनाओं और क्षमताओं को विकसित किया गया, जिससे सेना की फुर्ती, निगरानी क्षमता, सटीकता, पहुंच और तकनीक आधारित युद्धक्षेत्र जागरूकता को मजबूत किया गया।
तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र मानव संसाधन प्रबंधन, सभी रैंकों के कल्याण और पूर्व सैनिकों से बेहतर संवाद रहा। हमने सैनिकों के जीवन स्तर में सुधार, शिकायत निवारण प्रणाली को मजबूत करने, प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण, कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार और पूर्व सैनिकों तथा उनके परिवारों तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान दिया।
जहां तक अधूरे एजेंडे का सवाल है, सेना का परिवर्तन एक सतत संस्थागत प्रक्रिया है। विशेष रूप से सैन्य सिद्धांतों के विकास, तकनीक के समावेश और मानव संसाधन सुधार जैसे क्षेत्रों में निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है। दिशा स्पष्ट है और भारतीय सेना सही मार्ग पर आगे बढ़ रही है।
आईएएनएस: ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना में बड़े पैमाने पर पुनर्गठन और बदलाव तेज हुए हैं। यह प्रक्रिया किस चरण में है और अगली प्राथमिकता क्या होगी?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: भारतीय सेना का परिवर्तन एक एकीकृत संस्थागत प्रक्रिया के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। अब आधुनिकीकरण केवल नए हथियार या प्लेटफॉर्म शामिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि सैन्य सिद्धांत, संगठनात्मक ढांचा, तकनीक, प्रशिक्षण, आत्मनिर्भरता और मानव संसाधन नीतियों को साथ लेकर चलने पर आधारित है।
ऑपरेशन सिंदूर ने इस परिवर्तन की आवश्यकता को और मजबूत किया। इससे स्पष्ट हुआ कि भविष्य के युद्धों में सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि खुफिया जानकारी, सेंसर, हथियार प्रणाली, संचार नेटवर्क और कमांडरों को कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से एकीकृत किया जा सकता है। इसने यह भी रेखांकित किया कि भूमि, वायु, साइबर, अंतरिक्ष, विद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम और संज्ञानात्मक क्षेत्र के बीच समन्वित संचालन भविष्य की जरूरत है।
हाल ही में गठित नई सैन्य इकाइयां इसी परिवर्तन का हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य सेना को अधिक फुर्तीला, सटीक, नेटवर्क आधारित और त्वरित प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाना है, साथ ही अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों तक तकनीक पहुंचाना है।
फिलहाल हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता नई प्रणालियों को केवल शामिल करना नहीं, बल्कि उन्हें रणनीति, प्रशिक्षण, संगठन और कमांड प्रक्रिया का हिस्सा बनाना है। हमारा लक्ष्य तकनीक-सक्षम ऐसे सैनिक और सैन्य संरचनाएं तैयार करना है, जो नेटवर्क आधारित हों, त्वरित प्रतिक्रिया देने में सक्षम हों और मल्टी-डोमेन वातावरण में प्रभावी ढंग से काम कर सकें।
आईएएनएस: 'बाज बटालियन' का उद्देश्य क्या है?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: बाज बटालियन भारतीय सेना की रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट (आरपीए) क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इन्हें मौजूदा आरपीए फ्लाइट्स के आधार पर विकसित किया जाएगा और इनमें ऐसे विशेषज्ञ कर्मी होंगे, जिन्हें इन विमानों के संचालन और पूरे तंत्र के प्रबंधन का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसका उद्देश्य एकीकृत हवाई निगरानी, युद्धक्षेत्र की सतत जानकारी और त्वरित प्रतिक्रिया के माध्यम से खुफिया, निगरानी और टोही (आईएसआर) क्षमता को बढ़ाना है।
आईएएनएस: पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर हाल के घटनाक्रम और सैन्य-राजनयिक वार्ताओं के बाद सेना ने सबसे बड़ा सबक क्या सीखा है? वर्तमान सुरक्षा स्थिति का आपका आकलन क्या है?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: सबसे बड़ा सबक यह है कि एलएसी पर स्थिरता बनाए रखने के लिए निरंतर सतर्कता, विश्वसनीय सैन्य तैयारी और स्थापित संवाद तंत्र के माध्यम से लगातार संपर्क बनाए रखना आवश्यक है। उत्तरी सीमाओं पर स्थिति फिलहाल स्थिर है, लेकिन संवेदनशील बनी हुई है। सैनिकों की वापसी से जुड़े समझौतों ने जमीनी स्थिति को बेहतर बनाया है और दोनों पक्ष एक-दूसरे की चिंताओं के प्रति पहले से अधिक संवेदनशील हैं।
एलएसी की अलग-अलग धारणाओं से जुड़े स्थानीय मुद्दों का समाधान सैन्य स्तर की बातचीत, हॉटलाइन, फ्लैग मीटिंग और कमांडर स्तर की बैठकों के जरिए किया जाता है। दोनों पक्षों के बीच हर वर्ष एक हजार से अधिक जमीनी स्तर की बातचीत होती है, जिससे सीमा प्रबंधन और गलतफहमियों को रोकने में मदद मिलती है। हालांकि स्थिरता का अर्थ लापरवाही नहीं है। भारतीय सेना मजबूत तैनाती बनाए हुए है और किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। उत्तरी सीमाओं पर बुनियादी ढांचे का विकास, निगरानी, रसद, गतिशीलता और सैन्य क्षमता बढ़ाना हमारी प्रमुख प्राथमिकताएं हैं।
हमारा दीर्घकालिक दृष्टिकोण स्पष्ट है- शांति और स्थिरता बनाए रखना, संवाद के माध्यम से स्थानीय मुद्दों का समाधान करना और हर परिस्थिति से निपटने के लिए पूरी तैयारी रखना।
आईएएनएस: आत्मनिर्भरता सरकार की प्रमुख प्राथमिकता है और सेना भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। आप इसे किस तरह देखते हैं?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: आत्मनिर्भरता अब राष्ट्रीय सुरक्षा और भविष्य के युद्ध की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है। किसी संकट की स्थिति में देश को अपनी रक्षा प्रणाली, अपने औद्योगिक आधार और लंबे समय तक संघर्ष जारी रखने की क्षमता पर भरोसा होना चाहिए।
स्वदेशी रक्षा प्रणालियों ने अच्छा प्रदर्शन किया है और वे अब निगरानी, संचार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, सटीक सैन्य कार्रवाई, सूचना प्रबंधन और परिचालन निर्णय प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं। सैन्य तैयारी में स्वदेशी क्षमता अब पूरक नहीं, बल्कि आवश्यक तत्व बनती जा रही है।
साथ ही यह समझना होगा कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है। लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता, उन्नत गोला-बारूद, ड्रोन, एंटी-ड्रोन प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, सुरक्षित संचार, एआई आधारित निर्णय प्रणाली, स्वायत्त प्लेटफॉर्म और युद्धक्षेत्र की बेहतर निगरानी जैसी क्षमताओं की जरूरत लगातार बढ़ेगी। इसलिए रक्षा उद्योग को वर्तमान और भविष्य दोनों की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार रहना होगा।
भारत की भौगोलिक परिस्थितियां, सुरक्षा चुनौतियां और सैन्य आवश्यकताएं विशिष्ट हैं, इसलिए हमें भारतीय चुनौतियों के लिए भारतीय समाधान चाहिए। इसी उद्देश्य से डीआरडीओ, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों, निजी उद्योग, एमएसएमई, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों के साथ हमारा सहयोग लगातार बढ़ाया जा रहा है, ताकि परीक्षण तेज हों, बेहतर सहयोग मिले और नई प्रणालियों को शीघ्र सेना में शामिल किया जा सके।
आईएएनएस: अग्निपथ योजना को लेकर सेना का वास्तविक आकलन क्या है? क्या भविष्य में अग्निवीर मॉडल में बदलाव की जरूरत है, जैसे 25 प्रतिशत से अधिक सैनिकों को स्थायी सेवा में रखने पर विचार?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: अग्निपथ योजना एक महत्वपूर्ण मानव संसाधन सुधार है, जिसका उद्देश्य अधिक युवा, शारीरिक रूप से सक्षम, ऊर्जावान और भविष्य के युद्ध के लिए तैयार सेना तैयार करना है। युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और आज के सैनिक को शारीरिक रूप से मजबूत, मानसिक रूप से चुस्त तथा तकनीकी रूप से दक्ष होना चाहिए।
संचालनात्मक इकाइयों से शुरुआती प्रतिक्रिया उत्साहजनक रही है। अग्निवीर सैन्य जीवन, प्रशिक्षण और मैदानी परिस्थितियों के अनुरूप खुद को अच्छी तरह ढाल रहे हैं। ड्रोन, निगरानी प्रणाली, संचार नेटवर्क और अन्य तकनीक आधारित सैन्य प्रणालियों को अपनाने की उनकी क्षमता सकारात्मक साबित हुई है।
हालांकि यह योजना अभी शुरुआती चरण में है। पहला बैच अभी अपना पूरा सेवा चक्र पूरा नहीं कर पाया है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। भारतीय सेना लगातार प्रशिक्षण के परिणामों, इकाइयों में समावेशन, संचालनात्मक प्रदर्शन और कमांडरों से मिले फीडबैक का विश्लेषण कर रही है।
भविष्य में किसी भी बदलाव का आधार पूर्व निर्धारित संख्या नहीं, बल्कि संचालनात्मक आवश्यकताएं और वास्तविक अनुभव होना चाहिए। यदि भविष्य के मूल्यांकन में विशेषकर वायु रक्षा, ड्रोन, एंटी-ड्रोन प्रणाली, सिग्नल, निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसे तकनीक-प्रधान क्षेत्रों में बदलाव की आवश्यकता महसूस होती है, तो उस पर संस्थागत स्तर पर विचार किया जाएगा।
--आईएएनएस
पीएम/एएस
