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चीन के साथ बीआरआई समझौते को नौ साल, नेपाल अब भी खाली हाथ

काठमांडू, 16 मई (आईएएनएस)। नेपाल और चीन ने 12 मई 2017 को बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन नौ साल बाद भी नेपाल में इस परियोजना के तहत कोई बड़ा नया प्रोजेक्ट धरातल पर नहीं उतर सका है।
 
चीन के साथ बीआरआई समझौते को नौ साल, नेपाल अब भी खाली हाथ

काठमांडू, 16 मई (आईएएनएस)। नेपाल और चीन ने 12 मई 2017 को बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन नौ साल बाद भी नेपाल में इस परियोजना के तहत कोई बड़ा नया प्रोजेक्ट धरातल पर नहीं उतर सका है।

हालांकि चीन ने पश्चिमी नेपाल में बने पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को बीआरआई की बड़ी उपलब्धि बताया, लेकिन नेपाल सरकार ने इसे बीआरआई परियोजना मानने से इनकार कर दिया।

नेपाल का कहना है कि पोखरा एयरपोर्ट पर बातचीत चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा 2013 में बीआरआई की घोषणा से पहले शुरू हो चुकी थी।

जून 2023 में, तत्कालीन विदेश मंत्री एन पी सऊद ने नेपाल की संसद को बताया था कि हिमालयी देश में एक भी बीआरआई प्रोजेक्ट नहीं चला है। 2026 में भी स्थिति नहीं बदली है और कोई भी प्रोजेक्ट लागू नहीं हो सका, हालांकि इस परियोजना के तहत सोचे जा रहे कुछ प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है।

फिलहाल केरुंग-काठमांडू रेलवे प्रोजेक्ट और कुछ औद्योगिक परियोजनाओं पर प्रारंभिक काम जारी है, लेकिन नेपाल अब भी चीन के साथ संतुलित और सतर्क रणनीति अपनाने की कोशिश कर रहा है।

2017 में दोनों के बीच समझौते होने के बाद, नेपाली पक्ष ने 35 परियोजनाओं का प्रस्ताव रखा था। बाद में चीन के कहने पर सूची को घटाकर नौ कर दिया गया। बीआरआई के तहत प्रस्तावित परियोजनाओं में से एक, फुकोट करनाली हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट (480एमडब्ल्यू) की कमान भारत की एनएचपीसी लिमिटेड और विद्युत उत्पादन कंपनी लिमिटेड (वीयूसीएल) ने मिलकर संभाली है। दोनों कंपनियां संयुक्त रूप से इसे डेवलप कर रही हैं।

2020 में, नेपाल की हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी इन्वेस्टमेंट एंड डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड और पावरचाइना के बीच तमोर स्टोरेज हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट (756 एमडब्ल्यू) का विस्तृत अध्ययन करने के लिए एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे ताकि प्रोजेक्ट को मिलकर विकसित किया जा सके।

वहीं, अधिकारियों का कहना है कि इसमें भी झोल है। दरअसल, दोनों पक्षों के बीच प्रोजेक्ट को डेवलप करने को लेकर मतभेद है। यह उन प्रोजेक्ट्स में से भी एक है जिन्हें नेपाल ने शुरू में बीआरआई के तहत डेवलप करने का प्रस्ताव दिया था।

जब दोनों पक्षों ने दिसंबर 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की चीन यात्रा के दौरान बाआरआई कार्यान्वयन योजना पर हस्ताक्षर किए, तो बीआरआई के तहत विकसित किए जाने वाले परियोजनाओं की संख्या और नाम बदल दिए गए। कुल 10 परियोजनाएं चुनी गईं, जिनमें सीमा-पार रेलवे परियोजना भी शामिल थी।

प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की नई सरकार ने भी आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए अपनी नीतियों और कार्यक्रमों में घोषणा की कि वह चीन के साथ सीमा-पार रेलवे विकसित करने का प्रयास करेगी।

पूर्व विदेश मंत्री प्रकाश शरण महत ने आईएएनएस को बताया कि “नेपाल में बीआरआई शुरू न होने का मुख्य कारण यह है कि परियोजनाओं को लागू करने की शर्तों को लेकर भ्रम था।” बीआरआई एमओयू 2017 में महत के विदेश मंत्री के कार्यकाल में साइन किया गया था।

महत ने कहा कि यह स्पष्ट होना जरूरी था कि बीआरआई परियोजनाओं के लिए चीन से अनुदान मिलेगा या कर्ज, अगर कर्ज लिया गया तो ब्याज दर क्या होगी, और निर्माण में कितनी चीनी मानवशक्ति और सामग्री शामिल होगी। इन सभी मुद्दों को स्पष्ट किए बिना कोई परियोजना लागू नहीं हो सकती थी।

विश्व स्तर पर उच्च-ब्याज वाले चीनी कर्ज से “डेब्ट ट्रैप” की आशंका के बीच, महत ने कहा कि उनकी पार्टी, नेपाली कांग्रेस, केवल बीआरआई परियोजनाओं के लिए अनुदान देना चाहती थी। उन्होंने कहा, “हम बाद में कर्ज भी ले सकते हैं, क्योंकि अब तक बड़े पैमाने पर वादे किए गए चीनी अनुदान का उपयोग नहीं हुआ है।”

हालांकि नेपाली कांग्रेस ने शुरुआत में बीआरआई के प्रति नरम रुख अपनाया था, लेकिन बाद में चीन द्वारा नेपाल में वामपंथी दलों को एकजुट करने के प्रयासों के बाद इसका रुख कठोर हो गया। दिसंबर 2024 में ओली की चीन यात्रा से पहले नेपाली कांग्रेस के नेता जब दोनों पक्षों ने दिसंबर 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की चीन यात्रा के दौरान बाआरआई कार्यान्वयन योजना पर हस्ताक्षर किए, तो बीआरआई के तहत विकसित किए जाने वाले परियोजनाओं की संख्या और नाम बदल दिए गए। कुल 10 परियोजनाएं चुनी गईं, जिनमें सीमा-पार रेलवे परियोजना भी शामिल थी।

प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की नई सरकार ने भी आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए अपनी नीतियों और कार्यक्रमों में घोषणा की कि वह चीन के साथ सीमा-पार रेलवे विकसित करने का प्रयास करेगी।

पूर्व विदेश मंत्री प्रकाश शरण महत ने आईएएनएस को बताया कि “नेपाल में बीआरआई शुरू न होने का मुख्य कारण यह है कि परियोजनाओं को लागू करने की शर्तों को लेकर भ्रम था।” बीआरआई एमओयू 2017 में महत के विदेश मंत्री के कार्यकाल में साइन किया गया था।

महत ने कहा कि यह स्पष्ट होना जरूरी था कि बीआरआई परियोजनाओं के लिए चीन से अनुदान मिलेगा या कर्ज, अगर कर्ज लिया गया तो ब्याज दर क्या होगी, और निर्माण में कितनी चीनी मानवशक्ति और सामग्री शामिल होगी। इन सभी मुद्दों को स्पष्ट किए बिना कोई परियोजना लागू नहीं हो सकती थी।

विश्व स्तर पर उच्च-ब्याज वाले चीनी कर्ज से “डेब्ट ट्रैप” की आशंका के बीच, महत ने कहा कि उनकी पार्टी, नेपाली कांग्रेस, केवल बीआरआई परियोजनाओं के लिए अनुदान देना चाहती थी। उन्होंने कहा, “हम बाद में कर्ज भी ले सकते हैं, क्योंकि अब तक बड़े पैमाने पर वादे किए गए चीनी अनुदान का उपयोग नहीं हुआ है।”

हालांकि नेपाली कांग्रेस ने शुरुआत में बीआरआई के प्रति नरम रुख अपनाया था, लेकिन बाद में चीन द्वारा नेपाल में वामपंथी दलों को एकजुट करने के प्रयासों के बाद इसका रुख कठोर हो गया। दिसंबर 2024 में ओली की चीन यात्रा से पहले नेपाली कांग्रेस के नेता BRI परियोजनाओं के लिए चीनी कर्ज के खिलाफ थे।

उस यात्रा के दौरान नेपाल ने बीआरआई के तहत “ग्रांट सहायता वित्तपोषण” का प्रस्ताव रखा। बातचीत में चीनी पक्ष ने “ग्रांट” शब्द हटा दिया और “सहायता वित्तपोषण”शब्द का सुझाव दिया। नेपाल इससे असहज था क्योंकि यह वाणिज्यिक कर्ज भी दर्शा सकता था। इसके बाद नेपाल ने “सहायता अनुदान वित्तपोषण” शब्द का प्रस्ताव रखा, जिस पर चीनी पक्ष सहमत हो गया। इसका अर्थ था कि इसमें अनुदान, सॉफ्ट लोन और तकनीकी सहायता शामिल हो सकते हैं।

स्पष्ट कार्यान्वयन प्रक्रिया की कमी के अलावा, नेपाल ने अभी तक बीआरआई के तहत लागू करने के लिए तैयार परियोजनाओं का प्रस्ताव भी नहीं रखा। पूर्व नेपाली राजदूत बिष्णु पुकार श्रेष्ठ ने आईएएनएस को बताया कि समस्या मुख्य रूप से नेपाल में है, क्योंकि देश अभी तक बीआरआई के तहत लागू करने योग्य नई परियोजनाओं की सूची प्रस्तुत नहीं कर सका है।

उन्होंने कहा, “सरकार को उन परियोजनाओं की सूची प्रस्तुत करनी चाहिए जिनकी व्यवहार्यता अध्ययन पूरी हो चुका हो, साथ ही यह विवरण भी देना चाहिए कि नेपाल चीन से कितनी वित्तीय मदद चाहता है और स्वयं क्या योगदान देगा। बीआरआई परियोजनाएं संसाधन-साझाकरण के तहत लागू की जाती हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि बिना व्यापक बीआरआई योजना के भी, द्विपक्षीय समझौतों के जरिए व्यक्तिगत परियोजनाएं विकसित की जा सकती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि भू-राजनीतिक परिदृश्य ने भी नेपाल में बीआरआई के कार्यान्वयन को प्रभावित किया है। बीआरआईI को लेकर नेपाल की रणनीति उसके मुख्य साझेदारों—निकट पड़ोसी भारत और वैश्विक महाशक्ति अमेरिका—की धारणाओं से बहुत प्रभावित है।

भारत इसे एक रणनीतिक पहल के रूप में देखता है, जो दक्षिण एशिया में उसकी प्रभावशीलता को चुनौती देती है, जबकि अमेरिका इसे चीन के क्षेत्रीय प्रभुत्व को बढ़ाने का प्रयास मानता है।

यदि बीआरआई परियोजनाएं पूरी तरह से लागू हो जाएं, तो नेपाल के लिए अपना नाजुक भू-राजनीतिक संतुलन बनाए रखना कठिन हो सकता है। भारत शुरू से ही बीआरआई का विरोध करता रहा है क्योंकि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) से गुजरता है, जिस पर भारत अपने संप्रभु अधिकार का दावा करता है।

अमेरिकी अधिकारियों ने भी नेपाल को बार-बार चेतावनी दी है कि चीन की उच्च लागत वाली और अस्थायी ऋण-आधारित परियोजनाओं के कारण देश “डेब्ट ट्रैप” (कर्ज जाल) में फंस सकता है। अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि बीआरआई पर्याप्त पारदर्शिता प्रदान नहीं करता।

बीआरआई विवादों से जुड़ी रही है, जैसे श्रीलंका का हम्बनटोटा पोर्ट, जिसे 99 साल के लिए चीनी कंपनी को लीज पर दिया गया। भारत को अक्सर चिंता रहती है कि पड़ोस में ऐसी परियोजनाएं चीन द्वारा निगरानी और रणनीतिक उपयोग के लिए हो सकती हैं।

पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा — जिसे उद्घाटन के तीन साल बाद भी कोई नियमित अंतरराष्ट्रीय उड़ान नहीं मिली — आलोचकों के अनुसार, चीन की कथित “डेब्ट ट्रैप” कूटनीति का एक और उदाहरण बन गया है।

पूर्व विदेश मंत्री महत ने कहा, “हमारी कर्ज स्तर पहले से ही उच्च है, इसलिए हम किसी भी देश से उच्च-ब्याज वाले कर्ज नहीं ले सकते।” परियोजनाओं के लिए चीनी कर्ज के खिलाफ थे।

उस यात्रा के दौरान नेपाल ने बीआरआई के तहत “ग्रांट सहायता वित्तपोषण” का प्रस्ताव रखा। बातचीत में चीनी पक्ष ने “ग्रांट” शब्द हटा दिया और “सहायता वित्तपोषण” शब्द का सुझाव दिया। नेपाल इससे असहज था क्योंकि यह वाणिज्यिक कर्ज भी दर्शा सकता था। इसके बाद नेपाल ने “सहायता अनुदान वित्तपोषण” शब्द का प्रस्ताव रखा, जिस पर चीनी पक्ष सहमत हो गया। इसका अर्थ था कि इसमें अनुदान, सॉफ्ट लोन और तकनीकी सहायता शामिल हो सकते हैं।

स्पष्ट कार्यान्वयन प्रक्रिया की कमी के अलावा, नेपाल ने अभी तक बीआरआई के तहत लागू करने के लिए तैयार परियोजनाओं का प्रस्ताव भी नहीं रखा। पूर्व नेपाली राजदूत बिष्णु पुकार श्रेष्ठ ने आईएएनएस को बताया कि समस्या मुख्य रूप से नेपाल में है, क्योंकि देश अभी तक बीआरआई के तहत लागू करने योग्य नई परियोजनाओं की सूची प्रस्तुत नहीं कर सका है।

उन्होंने कहा, “सरकार को उन परियोजनाओं की सूची प्रस्तुत करनी चाहिए जिनकी व्यवहार्यता अध्ययन पूरी हो चुका हो, साथ ही यह विवरण भी देना चाहिए कि नेपाल चीन से कितनी वित्तीय मदद चाहता है और स्वयं क्या योगदान देगा। बीआरआई परियोजनाएं संसाधन-साझाकरण के तहत लागू की जाती हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि बिना व्यापक बीआरआई योजना के भी, द्विपक्षीय समझौतों के जरिए व्यक्तिगत परियोजनाएं विकसित की जा सकती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि भू-राजनीतिक परिदृश्य ने भी नेपाल में बीआरआई के कार्यान्वयन को प्रभावित किया है। बीआरआईI को लेकर नेपाल की रणनीति उसके मुख्य साझेदारों—निकट पड़ोसी भारत और वैश्विक महाशक्ति अमेरिका—की धारणाओं से बहुत प्रभावित है।

भारत इसे एक रणनीतिक पहल के रूप में देखता है, जो दक्षिण एशिया में उसकी प्रभावशीलता को चुनौती देती है, जबकि अमेरिका इसे चीन के क्षेत्रीय प्रभुत्व को बढ़ाने का प्रयास मानता है।

यदि बीआरआई परियोजनाएं पूरी तरह से लागू हो जाएं, तो नेपाल के लिए अपना नाजुक भू-राजनीतिक संतुलन बनाए रखना कठिन हो सकता है। भारत शुरू से ही बीआरआई का विरोध करता रहा है क्योंकि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) से गुजरता है, जिस पर भारत अपना संप्रभु अधिकार दावा करता है।

अमेरिकी अधिकारियों ने भी नेपाल को बार-बार चेतावनी दी है कि चीन की उच्च लागत वाली और अस्थायी ऋण-आधारित परियोजनाओं के कारण देश “डेब्ट ट्रैप” में फंस सकता है। अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि बीआरआई पर्याप्त पारदर्शिता प्रदान नहीं करता।

बीआरआई विवादों से जुड़ी रही है, जैसे श्रीलंका का हम्बनटोटा पोर्ट, जिसे 99 साल के लिए चीनी कंपनी को लीज पर दिया गया। भारत को अक्सर चिंता रहती है कि पड़ोस में ऐसी परियोजनाएं चीन द्वारा निगरानी और रणनीतिक उपयोग के लिए हो सकती हैं।

पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा — जिसे उद्घाटन के तीन साल बाद भी कोई नियमित अंतरराष्ट्रीय उड़ान नहीं मिली — आलोचकों के अनुसार, चीन की कथित “डेब्ट ट्रैप” कूटनीति का एक और उदाहरण बन गया है।

पूर्व विदेश मंत्री महत ने कहा, “हमारी कर्ज स्तर पहले से ही उच्च है, इसलिए हम किसी भी देश से उच्च-ब्याज वाले कर्ज नहीं ले सकते।”

--आईएएनएस

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