नए घरेलू सर्वे से पाकिस्तान में बढ़ती गरीबी की पुष्टि
नई दिल्ली, 14 जनवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान में गरीबी और मानव विकास संकट लगातार गहराता जा रहा है। छह साल के अंतराल के बाद जारी हाउसहोल्ड इंटीग्रेटेड इकोनॉमिक सर्वे (एचआईईएस) के ताजा आंकड़े देश में भयावह आर्थिक हालात की तस्वीर पेश करते हैं। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, खाद्य असुरक्षा झेलने वाले परिवारों का अनुपात 2018-19 में 15.9 फीसदी से बढ़कर 2024-25 में 24.4 फीसदी हो गया है, यानी हर चार में से एक पाकिस्तानी परिवार बुनियादी पोषण जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा।
कराची स्थित बिजनेस रिकॉर्डर की रिपोर्ट के अनुसार, लंबे समय से जारी महंगाई, घटती आय, बढ़ती गरीबी और असमानता ने पाकिस्तान को गहरे मानव विकास संकट में धकेल दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है, “एक चौथाई परिवारों के लिए खाली रसोई राष्ट्रीय संकट का सबसे स्पष्ट संकेत है।”
शहरों में खाद्य असुरक्षा दोगुने से ज्यादा बढ़कर 20.6 फीसदी पहुंच गई है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह दर 26.7 फीसदी है। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह अभी भी ज्यादा है, लेकिन शहरी इलाकों में इसकी रफ्तार तेज बताई गई है।
रिपोर्ट बताती है कि खाद्य असुरक्षा रेखा से ऊपर माने जाने वाले परिवार भी अब कम और घटिया भोजन कर रहे हैं। गेहूं, दूध, पोल्ट्री और अंडों जैसे जरूरी खाद्य पदार्थों की प्रति व्यक्ति खपत घटी है। लोग बीफ और मटन जैसे प्रोटीन की जगह गेहूं और चीनी जैसे सस्ते कार्बोहाइड्रेट पर ज्यादा निर्भर हो रहे हैं। यह बदलाव ऐसे देश के लिए चिंताजनक है, जहां पहले से ही टाइप-2 डायबिटीज की समस्या बढ़ रही है।
सर्वे में शिक्षा पर खर्च में भी तेज गिरावट दर्ज की गई है। औसत घरेलू खर्च 4 फीसदी से घटकर 2.5 फीसदी रह गया है। सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की कमजोरी के कारण निजी स्कूलों पर निर्भरता थी, लेकिन अब यह विकल्प भी आम परिवारों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक, डॉलर के हिसाब से वास्तविक घरेलू आय छह साल में 3.4 फीसदी घट गई, जबकि खर्च 4 फीसदी बढ़ा है। नतीजतन घरेलू बचत में 66 फीसदी तक की गिरावट आई है। कम बचत का मतलब कम निवेश और कमजोर उत्पादकता वृद्धि है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था तेजी से बाहरी सहारे पर टिकती जा रही है। घरेलू आय में रेमिटेंस की हिस्सेदारी 2018-19 में 5 फीसदी से बढ़कर 7.8 फीसदी हो गई है।
स्वरोजगार का हिस्सा 24.7 फीसदी से घटकर 21.7 फीसदी रह गया है, जो छोटे और सूक्ष्म उद्यमों के कमजोर होने का संकेत है। वेतनभोगी कर्मचारियों की संख्या बढ़ी है, लेकिन उत्पादक रोजगार नहीं बढ़ने से यह बदलाव स्वस्थ नहीं माना जा रहा। असमानता की स्थिति और गंभीर है, निचले 20 फीसदी वर्ग की वास्तविक आय 45 फीसदी तक गिर गई, जबकि शीर्ष वर्ग में यह गिरावट सिर्फ 6 फीसदी रही।
--आईएएनएस
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