चीन तिब्बत नेपाल बाढ़ त्रासदी को लेकर आपदा के वीडियो कर रहा डिलीट: रिपोर्ट
नई दिल्ली, 30 अगस्त (आईएएनएस)। एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय दैनिक की रिपोर्ट के अनुसार, चीन 26 अगस्त को ग्लेशियर के टूटने के बाद तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन से हुई तबाही को दिखाने वाले वीडियो डिलीट कर रहा है।
द टाइम्स ऑफ इजरायल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ग्लेशियर टूटने से ल्हेंडे खोला और फिर भोटे कोशी और त्रिशूली नदी प्रणालियों में कीचड़, चट्टान और पानी का एक बड़ा सैलाब आ गया, जिससे नेपाल-तिब्बत सीमा पर बड़े पैमाने पर तबाही हुई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस आपदा में पहले ही कई लोग हताहत हो चुके हैं। 28 अगस्त तक नेपाल में 579 मौतें हुई थीं और लगभग 1,924 लोग अभी भी लापता हैं। चीनी पक्ष में, तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में आधिकारिक तौर पर पांच मौतें और 558 लोगों के लापता होने की सूचना मिली थी, जिनमें 260 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं।
उत्तरी भारत में नदियों से दस शव भी बरामद किए गए थे। रविवार को नेपाल और तिब्बत में संयुक्त रूप से मरने वालों की संख्या 750 तक पहुंच गई थी और 3,000 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। अकेले नेपाल में 734 मौतें और 2,498 लोग लापता हैं।
हालांकि, रिपोर्ट में चीनी पक्ष पर विनाश के पैमाने को दिखाने वाले वीडियो को कथित तौर पर हटाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
टाइम्स ऑफ इजरायल के अनुसार, बाढ़ आने के कुछ घंटों के भीतर ही चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस आपदा के वीडियो प्रसारित होने लगे। सुरक्षा फुटेज में कीचड़ और मलबे की एक विशाल दीवार को ग्यिरोंग पोर्ट पर इमारतों पर गिरते हुए दिखाया गया, जबकि लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस लोकेशन और फुटेज की बाद में अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने पुष्टि की। रिपोर्ट में भूटानी पत्रकार का हवाला दिया गया, जिसने चीनी प्लेटफॉर्म से बाढ़ के फुटेज हटाए जाने पर प्रकाश डाला और इस बात पर जोर दिया कि यह सामग्री राजनीतिक विरोध या सरकार विरोधी गतिविधि के बजाय आपदा का फुटेज था।
पत्रकारों ने बताया कि चीनी पक्ष में फिल्माए गए नागरिक वीडियो डिलीट किए जा रहे थे, जबकि नेपाल के फुटेज व्यापक रूप से उपलब्ध रहे। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीनी प्लेटफॉर्म पर जो कुछ बचा था, वह काफी हद तक आधिकारिक बयान था, जिसमें बचाव अभियानों, सरकारी बयानों और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के निर्देशों के बारे में जानकारी के साथ-साथ विनाश की सीमा के बारे में सीमित जानकारी शामिल थी।
इसके उलट नेपाल में स्थिति अलग रही, जहां पत्रकारों को प्रभावित इलाकों में जाने, पीड़ितों से मिलने और तबाही की तस्वीरें व वीडियो सामने लाने की पूरी आजादी मिली।
रिपोर्ट में तिब्बत में, खासकर संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों में विदेशियों की पहुंच पर पाबंदी की ओर भी संकेत दिया गया। इसमें कहा गया कि सीमा पार जो हुआ उसकी तुलना में नेपाल में हुई तबाही को ज्यादा स्पष्ट रूप से देखा जा सका। इसमें आपदा के कारणों से जुड़े सवालों की भी जांच की गई। शुरुआती रिपोर्टों में कहा गया था कि भूकंप के कारण यह हिमस्खलन हुआ होगा। हालांकि, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने शुरू में 4.4 तीव्रता की भूकंपीय घटना दर्ज की थी, लेकिन बाद में पता चला कि यह संकेत भूकंप के बजाय भूस्खलन से ही उत्पन्न हुआ था।
रिपोर्ट में कहा गया, "सैटेलाइट तस्वीरों में ग्लेशियर और चट्टान का एक बड़ा हिस्सा टूटते हुए दिखा, जिसके बाद बर्फ और चट्टान का हिमस्खलन हुआ जिसने नदी को अस्थायी रूप से अवरुद्ध कर दिया और फिर प्राकृतिक बांध टूट गया। अभी भी जांच के लिए बहुत कुछ बाकी है।"
रिपोर्ट में नेपाल में तिब्बती पक्ष से बहकर आए विस्फोटक उपकरणों और क्या निर्माण या सुरंग बनाने से जुड़े विस्फोटों ने इलाके को अस्थिर करने में भूमिका निभाई हो सकती है, इस पर उठे सवालों का भी जिक्र किया गया।"
रिपोर्ट किए गए उपकरण क्या थे? वे कहां से आए? क्या वे निर्माण कार्य से जुड़े थे? क्या पहाड़ों में सुरंग बनाने या कटाई के लिए विस्फोटकों का इस्तेमाल किया जा रहा था? क्या उनका आपदा से कोई संबंध नहीं था?
रिपोर्ट में कहा गया, "इन सवालों का जवाब देने के लिए जरूरी स्थितियां ही मौजूद नहीं हैं। तिब्बती पक्ष में पहुंच प्रतिबंधित है, विदेशी पत्रकारों को गंभीर पाबंदियों का सामना करना पड़ता है और चीनी प्लेटफॉर्म से नागरिक फुटेज हटाए जा रहे हैं। इसी तरह से सूचना का अभाव पैदा होता है।"
रिपोर्ट का सुझाव है कि अगर बीजिंग चाहता है कि दुनिया आपदा के लिए किसी खास स्पष्टीकरण को स्वीकार करे, तो इसका जवाब सेंसरशिप नहीं बल्कि सबूत होना चाहिए।
तिब्बत से निकलने वाली नदी प्रणाली वहीं खत्म नहीं होती। ल्हेंडे खोला भोटे कोशी में मिलती है, जो नेपाल की त्रिशूली में बहती है, और अंततः भारत में गंडक बन जाती है। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि प्राकृतिक आपदा से निपटने वाली सरकार को नागरिकों द्वारा रिकॉर्ड किए गए फुटेज से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उसे संरक्षित करना चाहिए।
इसमें कहा गया है कि पत्रकारों को नुकसान का आकलन करने की अनुमति दी जानी चाहिए, जबकि वैज्ञानिकों और स्वतंत्र विशेषज्ञों को इलाके तक पहुंच और सैटेलाइट इमेजरी, चश्मदीदों के बयानों और आधिकारिक बयानों की तुलना करने में सक्षम होना चाहिए।
रिपोर्ट के अनुसार, तिब्बत से उभर रहा पैटर्न 'प्रतिबंधित पहुंच, गायब होते फुटेज और भारी-भरकम आधिकारिक बयान' का है। इन घटनाक्रमों ने इस बात को लेकर चिंता बढ़ा दी है कि बाहरी दुनिया स्वतंत्र रूप से आपदा का कितना आकलन कर सकती है।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया कि मुद्दा केवल वीबो या डॉयिन जैसे प्लेटफॉर्म से अलग-अलग वीडियो हटाए जाने का नहीं है, बल्कि इसमें तर्क दिया गया कि चिंता एक ऐसी आपदा के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को नियंत्रित करने के बारे में है जिसका असर तीन देशों तक फैला है।
--आईएएनएस
केके/डीकेपी
