यौन अपराधों पर फैसलों में एकरूपता और संवेदनशीलता जरूरी : एनसीडब्ल्यू प्रमुख
नई दिल्ली, 17 अक्टूबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने शनिवार को लैंगिक संवेदनशील न्याय, तथा न्यायिक प्रक्रिया में निरंतरता, संवेदनशीलता और करुणा की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े हाईकोर्ट के दो फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि इन मामलों में अपराध की गंभीरता को कम करके आंका गया प्रतीत होता है।
उन्होंने महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से संबंधित दो उच्च न्यायालय के फैसलों का जिक्र किया, जिनमें अपराधों की गंभीरता को कमतर आंका गया प्रतीत होता है।
रहाटकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में उन दो मामलों का विवरण साझा किया, जिनमें उच्च न्यायालयों ने आरोपियों के अपराधों की व्याख्या कम गंभीर दंड प्रावधानों के तहत की और उन्हें "दुष्कर्म के प्रयास" के लिए दोषी ठहराने की याचिकाओं को खारिज कर दिया।
एनसीडब्ल्यू प्रमुख ने कहा, "न्याय कानून और साक्ष्य द्वारा निर्देशित होना चाहिए, जबकि इसकी भाषा और तर्क प्रत्येक पीड़ित की गरिमा को बनाए रखना चाहिए। न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास मजबूत करने के लिए लैंगिक संवेदनशीलता से न्याय करना आवश्यक है।"
रहाटकर ने कहा, "राष्ट्रीय महिला आयोग मानता है कि प्रत्येक मामले का फैसला उसके तथ्यों, परिस्थितियों, साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर होना चाहिए। साथ ही, ये फैसले यौन अपराधों में 'तैयारी' और 'प्रयास' के बीच कानूनी अंतर को लागू करने में स्पष्टता और एकरूपता के महत्व को उजागर करते हैं।"
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष द्वारा उद्धृत मामलों में से एक पटना हाईकोर्ट का मोहम्मद ऐनुल हक बनाम बिहार राज्य का मामला था। दूसरा मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय का था।
पटना उच्च न्यायालय के मामले में आदेश में कहा गया, "अपीलकर्ता द्वारा देर रात सो रही विधवा के घर में प्रवेश करना, दीपक बुझाना, उसका मुंह दबाना आईपीसी की धारा 354 (लज्जा भंग करना) के तहत अपराध स्थापित करने के लिए पर्याप्त था, हालांकि कपड़े उतारने या प्रवेश की दिशा में किसी भी कृत्य के साक्ष्य के अभाव में यह कृत्य दुष्कर्म का प्रयास (आईपीसी की धारा 376 को धारा 511 के साथ पढ़ा जाए) नहीं माना जा सकता।"
एनसीडब्ल्यू प्रमुख ने बताया कि दूसरा मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश से संबंधित था, जिसमें पीड़िता के कपड़े खींचने के कृत्य का जिक्र था, जिसके चलते सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की।
रहाटकर ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी द्वारा प्रकाशित हैंडबुक "जजमेंट्स एंड जेंडर: सेंसिटिविटी एंड कंपैशन इन राइटिंग जजमेंट्स" का भी उल्लेख किया। उन्होंने न्यायिक तर्कों और न्यायिक भाषा में लैंगिक संवेदनशीलता को और मजबूत करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि न्याय प्रदान करते समय संवेदनशील, संतुलित और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना बेहद जरूरी है।
एनसीडब्ल्यू अध्यक्ष ने पुस्तिका में शामिल प्रमुख सिद्धांतों की ओर इशारा किया, जिनमें पीड़ितों द्वारा अनुभव किए गए आघात के संदर्भ में साक्ष्य को समझना; ऐसी भाषा से बचना जो किसी पीड़ित की गरिमा को रूढ़िबद्ध, कलंकित या कमतर आंकती हो और यौन अपराधों को शारीरिक स्वायत्तता, व्यक्तिगत गरिमा और व्यक्तिगत अधिकारों के उल्लंघन के रूप में पहचानना, न कि उन्हें पवित्रता, पारिवारिक सम्मान या नैतिकता की धारणाओं के माध्यम से देखना शामिल है।
न्यायिक भाषा में संवेदनशीलता की वकालत करते हुए रहाटकर ने कहा कि लैंगिक संवेदनशील फैसलों में निष्पक्षता, गरिमा और सहानुभूति का स्पष्ट प्रतिबिंब होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यौन हिंसा की पीड़िताओं के साथ सम्मान और करुणा का व्यवहार किया जाना चाहिए तथा न्यायिक टिप्पणियों या भाषा में ऐसा कोई संकेत नहीं होना चाहिए जिससे यह प्रतीत हो कि अपराध के लिए पीड़िता स्वयं किसी रूप में जिम्मेदार है।
--आईएएनएस
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