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एनजीटी ने कोटपूतली एसटीपी की जगह बदलने से किया इनकार, पर्यावरण सुरक्षा उपाय का दिया आदेश

जयपुर, 30 जुलाई (आईएएनएस)। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की भोपाल स्थित सेंट्रल जोन बेंच ने कोटपूतली-बहरोड़ जिले के चतुर्भुज गांव में प्रस्तावित 10 मिलियन लीटर प्रति दिन (एमएलडी) क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की जगह बदलने की मांग को खारिज कर दिया है। साथ ही, ट्रिब्यूनल ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे लोगों की सेहत और आस-पास के इकोसिस्टम की सुरक्षा के लिए पर्यावरण से जुड़े कड़े सुरक्षा उपाय लागू करें। अधिकारियों ने गुरुवार को यह जानकारी दी।
 

जयपुर, 30 जुलाई (आईएएनएस)। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की भोपाल स्थित सेंट्रल जोन बेंच ने कोटपूतली-बहरोड़ जिले के चतुर्भुज गांव में प्रस्तावित 10 मिलियन लीटर प्रति दिन (एमएलडी) क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की जगह बदलने की मांग को खारिज कर दिया है। साथ ही, ट्रिब्यूनल ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे लोगों की सेहत और आस-पास के इकोसिस्टम की सुरक्षा के लिए पर्यावरण से जुड़े कड़े सुरक्षा उपाय लागू करें। अधिकारियों ने गुरुवार को यह जानकारी दी।

यह आदेश जस्टिस शिव कुमार सिंह (ज्यूडिशियल मेंबर) और डॉ. प्रशांत गर्गवा (एक्सपर्ट मेंबर) की बेंच ने 'सत्यनारायण शर्मा और अन्य बनाम राजस्थान राज्य और अन्य' मामले का निपटारा करते हुए दिया।

यह एप्लीकेशन स्थानीय निवासियों ने प्रस्तावित एसटीपी की जगह बदलने की मांग को लेकर दायर की थी। उनका तर्क था कि चुनी गई जगह प्राचीन मंदिरों, एक सरकारी स्कूल, गौशाला, रिहायशी इलाकों और पीने के पानी के सार्वजनिक स्रोतों के बहुत करीब है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इस प्रोजेक्ट से बदबू, शोर, मच्छरों के पनपने और भूजल के दूषित होने जैसी समस्याओं के कारण लोगों की सेहत और पर्यावरण पर बुरा असर पड़ सकता है।

उन्होंने एक दूसरी जगह का भी सुझाव दिया और कहा कि वह ज्यादा सही रहेगी।

सभी पक्षों की बातें सुनने और जगह का मुआयना करने के लिए बनी संयुक्त समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद, ट्रिब्यूनल ने पाया कि अमृत योजना के तहत लगभग 25.5 करोड़ रुपए की लागत से बन रहा एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) आधुनिक 'सीक्वेंसिंग बैच रिएक्टर' (एसबीआर) तकनीक पर आधारित है। इसे म्युनिसिपल सीवेज को बहाने या दोबारा इस्तेमाल करने से पहले वैज्ञानिक तरीके से ट्रीट करने के लिए डिजाइन किया गया है।

जांच में प्रस्तावित जगह के पास मंदिर, गौशाला, रिहायशी घर, पीएचईडी के बोरवेल और पेड़-पौधे होने की पुष्टि हुई। साथ ही, स्थानीय लोगों ने बदबू, प्रदूषण और आस-पास के धार्मिक स्थलों व पशुधन पर संभावित असर को लेकर चिंताएं भी जताईं।

ट्रिब्यूनल ने माना कि आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट शहरी पर्यावरण इंफ्रास्ट्रक्चर का जरूरी हिस्सा हैं और नदियों, भूजल व आस-पास के इकोसिस्टम को प्रदूषण से बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। उसने यह भी कहा कि भले ही राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास एसटीपी के लिए जगह चुनने के कोई खास नियम नहीं हैं, फिर भी पर्यावरण से जुड़े सुरक्षा उपायों और सावधानी के सिद्धांतों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।

प्रोजेक्ट को दूसरी जगह ले जाने की अपील को खारिज करते हुए बेंच ने प्रतिवादियों की बात मान ली कि आवेदकों द्वारा सुझाई गई दूसरी जगह नदी के पास है और वहां बाढ़ का खतरा है। बेंच ने यह भी माना कि प्रोजेक्ट को दूसरी जगह ले जाना तकनीकी रूप से संभव नहीं होगा और इससे सरकारी खजाने पर काफी अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

हालांकि, ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया कि 'जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974' के तहत राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से 'स्थापना के लिए जरूरी मंजूरी' लिए बिना एसटीपी का निर्माण या संचालन शुरू नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा, ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिया कि प्रदूषण की किसी भी संभावना को खत्म करने के लिए पास के सार्वजनिक पीने के पानी वाले बोरवेल को ठीक से सुरक्षित किया जाए या दूसरी जगह स्थानांतरित किया जाए।

पर्यावरण सुरक्षा के कई उपाय बताते हुए ट्रिब्यूनल ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे एसटीपी के चारों ओर घने पेड़-पौधों के साथ एक चौड़ा 'ग्रीन बफर' बनाएं; बदबू, शोर और मच्छरों के पनपने को रोकने के लिए असरदार सिस्टम लगाएं; यह पक्का करें कि बिना साफ किया हुआ सीवेज कभी भी खुली जमीन या प्राकृतिक जल स्रोतों में न छोड़ा जाए; और साफ किए गए पानी का ज्यादा से ज्यादा दोबारा इस्तेमाल सड़क किनारे पेड़-पौधों, पार्कों, बगीचों और दूसरे मंजूर कामों के लिए करें।

--आईएएनएस

एमएस/