मद्रास हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, इस्तीफा देने वाले विधायकों को उपचुनाव लड़ने से रोकने की याचिका खारिज
चेन्नई, 24 सितंबर (आईएएनएस)। मद्रास हाई कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मांग की गई थी कि जो विधायक राजनीतिक कारणों से इस्तीफा देते हैं, उन्हें इस्तीफे के बाद होने वाले उपचुनाव का खर्च उठाना पड़े और उन पर चुनाव लड़ने से पांच साल का प्रतिबंध लगाया जाए।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता जिन बदलावों की मांग कर रहे हैं, उनके लिए कानून बनाने की जरूरत होगी और यह संसद या विधानसभा का काम है। जनहित याचिका को खारिज करते हुए बेंच ने कहा कि जज कोर्ट के आदेश के जरिए ऐसे नियम लागू नहीं कर सकते।
यह याचिका चेन्नई के सैदापेट के वकील सुधन ने दायर की थी। उन्होंने तर्क दिया कि जो विधायक चुनाव जीतने के तुरंत बाद इस्तीफा दे देते हैं, वे मतदाताओं से मिले जनादेश का अनादर करते हैं और जनता को एक और चुनाव का खर्च उठाने के लिए मजबूर करते हैं।
उन्होंने अदालत से चुनाव आयोग को निर्देश देने का आग्रह किया कि वह ऐसी प्रक्रिया बनाए, जिसके तहत ऐसे पूर्व विधायक उपचुनाव लड़ने के लिए नामांकन पत्र दाखिल करते समय उपचुनाव का खर्च जमा करें। उनकी याचिका में एक कानूनी संशोधन की भी मांग की गई थी जो राजनीतिक कारणों से इस्तीफा देने वाले विधायकों को पांच साल तक चुनाव लड़ने से रोकेगा।
एक अंतरिम उपाय के रूप में, सुधन चाहते थे कि अदालत उनकी याचिका पर फैसला होने तक मदुरंतकम और धारापुरम निर्वाचन क्षेत्रों में उपचुनावों पर रोक लगा दे।
यह मामला चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की बेंच के सामने आया। सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता ने इस संभावना का जिक्र किया कि कोई चुना हुआ प्रतिनिधि जीत के दो हफ्ते के अंदर इस्तीफा दे सकता है और फिर किसी दूसरी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर दोबारा चुनाव लड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि जो विधायक ऐसे हालात में चुनाव की नौबत लाते हैं, उन्हें ही इससे होने वाले खर्च के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि भले ही इसके लिए कोई मौजूदा कानूनी प्रावधान न हो, फिर भी कोर्ट इस समस्या से निपटने के लिए निर्देश जारी कर सकता है।
उन्होंने यह भी पूछा कि अगर बड़ी संख्या में विधायक एक साथ इस्तीफा दे दें, तो क्या होगा?
चुनाव आयोग ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि नतीजे घोषित होने के बाद किसी विधायक के इस्तीफे के फैसले में उसकी कोई भूमिका नहीं होती। आयोग ने यह भी तर्क दिया कि यह याचिका अदालत द्वारा विचार किए जाने लायक नहीं है।
बेंच ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सवाल उठाया कि क्या अदालत चुनाव कानून में बदलाव का आदेश दे सकती है, जिनकी मांग की गई थी। अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया और बाद में याचिका को खारिज कर दिया।
--आईएएनएस
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