दिल्ली हाईकोर्ट ने 2020 के दंगों की 'बड़ी साजिश' के मामले में सलीम मलिक को जमानत दी
नई दिल्ली, 21 मई (आईएएनएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े बड़ी साजिश के मामले में सलीम मलिक उर्फ मुन्ना को जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि उसकी भूमिका कुछ ऐसे सह-आरोपियों जैसी ही थी, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट पहले ही जमानत दे चुका है।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की डिवीजन बेंच ने पाया कि मलिक पर लगे आरोपों से वह स्थानीय-स्तर के मददगार की श्रेणी में आते हैं, न कि उस मुख्य साजिशकर्ता की श्रेणी में, जिसने कथित बड़ी साजिश की योजना बनाने में भूमिका निभाई हो।
दिल्ली हाई कोर्ट ने पाया कि मलिक की भूमिका और मोहम्मद सलीम खान तथा शादाब अहमद की भूमिका में कोई बड़ा अंतर नहीं था। मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को इस साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने 'गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य (दिल्ली सरकार)' मामले में जमानत दे दी थी।
आदेश में कहा गया कि अपीलकर्ता की भूमिका पर विचार करने के बाद इस अदालत की राय है कि उनकी भूमिका वैसी ही है जैसी मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद की थी, जिन्होंने बैठकों, विरोध प्रदर्शनों और चक्का जाम में हिस्सा लिया था।
जस्टिस सिंह की अध्यक्षता वाली बेंच ने आगे कहा कि मलिक पांच साल और दस महीने से ज्यादा समय से हिरासत में हैं, और ट्रायल कोर्ट में अभी भी आरोपों पर बहस चल रही है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने सख्त शर्तों के साथ जमानत देते हुए कहा कि ट्रायल में अभी कुछ समय लगेगा।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, मलिक ने फरवरी 2020 के मध्य में हुई बैठकों में हिस्सा लिया था, और उन पर विरोध प्रदर्शनों की योजना बनाने, भड़काऊ भाषण देने और दंगा-फसाद की गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है। इन गतिविधियों में पत्थर फेंकना और पुलिस के साथ झड़प के लिए लोगों को उकसाना शामिल है।
जमानत याचिका का विरोध करते हुए दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दलील दी कि मलिक ने साजिश में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था, और गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर लगी रोक अभी भी लागू होती है।
हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने 'गुलफिशा फातिमा' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कथित साजिश के मुख्य वैचारिक सूत्रधारों और स्थानीय-स्तर के मददगारों के बीच अंतर स्पष्ट किया था।
जस्टिस सिंह की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कुछ अंशों को दोहराते हुए कहा कि मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद पर साजिश के रचयिता होने के बजाय, उसे जमीनी स्तर पर लागू करने वाले और परिचालन समन्वयक होने का आरोप था। इसमें कहा गया कि मलिक पर लगे आरोप एक ऑपरेशनल और काम को अंजाम देने वाले रोल को भी दिखाते हैं, और उन्हें उन आरोपियों की कैटेगरी में नहीं रखते, जिन पर बड़ी साजिश रचने या उसे डायरेक्ट करने का आरोप है।
मलिक को जमानत देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कई शर्तें रखीं, जिनमें 2 लाख रुपए का पर्सनल बॉन्ड भरना और दो जमानतदार लाना, बिना पहले से इजाजत लिए दिल्ली से बाहर न जाना, अपना पासपोर्ट जमा करना, और सप्ताह में दो बार क्राइम ब्रांच के एसएचओ के सामने पेश होना शामिल है। इस आदेश में उन्हें गवाहों से संपर्क करने, रैलियों या पब्लिक गैदरिंग में हिस्सा लेने, केस से जुड़ी कोई भी चीज पब्लिश करने, या एफआईआर से जुड़े किसी भी ग्रुप से जुड़ने से भी रोक दिया गया है, जब तक कि ट्रायल खत्म न हो जाए।
--आईएएनएस
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