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गुजरात : यूसीसी के दायरे में लिव-इन रजिस्ट्रेशन और संपत्ति के समान अधिकार अहम

गांधीनगर, 27 मार्च (आईएएनएस)। लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण और बेटे-बेटियों के लिए विरासत में समान अधिकार, गुजरात सरकार द्वारा 'यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल, 2026' के तहत हाल ही में तैयार किए गए विस्तृत मसौदे का हिस्सा हैं।
 
गुजरात : यूसीसी के दायरे में लिव-इन रजिस्ट्रेशन और संपत्ति के समान अधिकार अहम

गांधीनगर, 27 मार्च (आईएएनएस)। लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण और बेटे-बेटियों के लिए विरासत में समान अधिकार, गुजरात सरकार द्वारा 'यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल, 2026' के तहत हाल ही में तैयार किए गए विस्तृत मसौदे का हिस्सा हैं।

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा कि ये प्रावधान महिलाओं को कानूनी सुरक्षा देने के लिए बनाए गए हैं।

इस सप्ताह की शुरुआत में राज्य विधानसभा में पास हुए इस कानून के तहत, लिव-इन रिलेशनशिप को रजिस्टर करवाना जरूरी है। ऐसा न करने पर तीन महीने तक की जेल या 10,000 रुपए का जुर्माना हो सकता है।

जिन मामलों में ऐसे रिश्तों में शामिल लोगों की उम्र 18 से 21 साल के बीच है, उनके माता-पिता को इस रजिस्ट्रेशन के बारे में जानकारी दी जाएगी।

यह बिल उन मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान करता है जहां सहमति जबरदस्ती, डरा-धमकाकर या धोखे से ली गई हो; साथ ही, नाबालिगों से जुड़े मामलों में 'यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम' (पॉक्सो) के तहत कार्रवाई का भी प्रावधान है।

इसमें उन लोगों के लिए भी सजा का प्रावधान है जो पहले से शादीशुदा होते हुए भी लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं।

इन प्रावधानों के तहत, लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को रिश्ता टूट जाने पर गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है; वहीं, ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों को भी कानूनी मान्यता दी गई है, जिसमें पहचान, गुजारा भत्ता और विरासत से जुड़े अधिकार शामिल हैं।

सरकार ने कहा कि रजिस्ट्रेशन से ऐसे रिश्तों को व्यवस्थित करने और महिलाओं व बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने में मदद मिलेगी।

यह बिल शादी, तलाक़ और विरासत से जुड़े मामलों के लिए एक समान ढांचा भी पेश करता है। इसके तहत, शादी के 60 दिनों के भीतर उसका रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य है; ऐसा न करने पर 10,000 रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।

जबरदस्ती, दबाव या धोखे से की गई शादियों के साथ-साथ एक से ज्यादा शादियों के मामलों में सात साल तक की जेल हो सकती है।

सरकार ने कहा कि अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से शादी को कानूनी मान्यता मिलेगी और शादीशुदा होने की स्थिति को प्रमाणित करने में मदद मिलेगी, जिससे धोखाधड़ी की गुंजाइश कम हो जाएगी।

इस कानून के तहत, तलाक़ की प्रक्रिया अदालतों के ज़रिए पूरी की जाएगी और उसके बाद उसे रजिस्टर करवाना जरूरी होगा। कानूनी दायरे से बाहर किए गए तलाकों को अमान्य माना जाएगा।

नियमों का उल्लंघन करने पर 3 साल तक की जेल की सजा हो सकती है।

इन प्रावधानों के तहत महिलाओं को कानूनी रूप से मान्य तलाक के बाद बिना किसी शर्त के दोबारा शादी करने की भी अनुमति होगी।

सरकार के अनुसार, इन उपायों का उद्देश्य धोखे से अलग होने, अवैध तलाक और वैवाहिक स्थिति के बारे में गलत जानकारी देने जैसी घटनाओं को रोकना है, साथ ही भविष्य में होने वाली शादियों में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।

यह कानून सभी धर्मों के लिए भरण-पोषण के एक समान प्रावधान स्थापित करता है और बेटे-बेटियों को विरासत में बराबर का अधिकार देता है।

सरकार ने कहा कि इससे लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा, महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा मजबूत होगी और एक अधिक न्यायसंगत पारिवारिक ढांचा सुनिश्चित होगा।

विधानसभा में बिल पेश करते हुए मुख्यमंत्री पटेल ने कहा कि यह कदम समानता के प्रति हमारी व्यापक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

उन्होंने कहा, "यह महज एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में समानता, न्याय और एकता के प्रति राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को और मज़बूत करने का हमारा पक्का इरादा है।"

व्यापक संदर्भ का जिक्र करते हुए उन्होंने आगे कहा, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल साहब के एक एकजुट और अविभाजित भारत के सपने को साकार करने के लिए 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' का विचार दिया है। यही 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मूल तत्व है। अगर देश में एक समान कानून और विकास के लिए एक समान अवसर नहीं होंगे, तो इस लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता।"

सरकार ने बताया कि इस बिल को मौजूदा भारतीय कानूनों, जिनमें हिंदू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम और भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम शामिल हैं, के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसलों का गहन अध्ययन करने के बाद तैयार किया गया है।

जिन मामलों का अध्ययन किया गया, उनमें मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985), सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995), शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) और शबनम हाशमी बनाम भारत संघ (2014) जैसे मामले प्रमुख हैं।

सरकार ने यह भी बताया कि इस कानून का ढांचा उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और अन्य देशों में प्रचलित इसी तरह के कानूनी मॉडलों, जैसे कि फ्रांसीसी नागरिक संहिता, जर्मन 'बर्गरलिचेस गेसेट्जबुच' और तुर्की नागरिक संहिता, से प्रेरित है।

अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह कानून धार्मिक रीति-रिवाजों और परंपराओं में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा, बल्कि यह केवल नागरिक-कानूनी पहलुओं को विनियमित करने तक ही सीमित रहेगा।

--आईएएनएस

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