पश्चिमी देशों में खालिस्तानी उग्रवाद को बढ़ावा देना सिख हितों के खिलाफ, बोझ बन रहा आंदोलन: रिपोर्ट
ओटावा, 19 अक्टूबर (आईएएनएस)। पश्चिमी देशों की राजधानियों में खालिस्तानी उग्रवाद को लगातार बढ़ावा दिया जाना सिख समुदाय के हितों के खिलाफ है। इससे समुदाय मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ता है, उस पर संदेह बढ़ता है और एकीकरण, युवाओं के कट्टरपंथीकरण तथा नशीले पदार्थों और गैंग नेटवर्क जैसी गंभीर चुनौतियों से ध्यान भटकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, कुछ निष्कर्षों में इन नेटवर्कों का संबंध अलगाववादी गतिविधियों के वित्तपोषण से भी जोड़ा गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि खालिस्तान आंदोलन की वजह से पहले भी भारी मानवीय कीमत चुकानी पड़ी है, चाहे वह एयर इंडिया बमकांड हो या पंजाब में सालों तक चला उग्रवाद और खून-खराबा।
खालसा वॉक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा के ब्रैम्पटन में सभा मंदिर में लगे कांसुलर शिविर के दौरान खालिस्तान समर्थक उग्र तत्वों ने श्रद्धालुओं पर लाठी-डंडों और झंडों से हमला किया था। इस घटना के दो साल बाद कनाडा के पत्रकार डेनियल बोर्डमैन खुद अनजाने में इस पूरे मामले के केंद्र में आ गए।
कनाडा के प्रसारक सीबीसी ने जिस तरह इस हिंसा को उनके इर्द-गिर्द घुमाकर पेश किया, उसी से दो साल तक चली एक वैश्विक पड़ताल की शुरुआत हुई। इसी पड़ताल के नतीजे के तौर पर सामने आई है डॉक्यूमेंट्री 'फाइंडिंग खालिस्तान', जो बंटवारे के बाद हुए खून-खराबे और अस्सी के दशक में भड़के उग्रवाद से लेकर पश्चिम में आज सक्रिय इसके बंद दायरे वाले समर्थक समूहों तक, इस आंदोलन के पूरे सफर को सामने रखती है।
रिपोर्ट में कहा गया, "यह फिल्म ऐसे दौर में आई है, जब इस विचारधारा की भारी कीमत से मुंह मोड़ना अब मुमकिन नहीं रहा। खालिस्तान सिखों की जायज आकांक्षाओं का प्रतीक नहीं है। यह एक ऐसी राजनीतिक परियोजना है, जो बार-बार हिंसा का रास्ता अपना चुकी है, जिसे बाहर से समर्थन मिलता रहा है और जो गुरुओं की बुनियादी शिक्षाओं के बिल्कुल खिलाफ है। गुरु नानक ने मजहबी कट्टरता और सियासी बंटवारे को नकारा था, जबकि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में बार-बार मानव एकता का संदेश दिया गया- 'ना को बैरी, नहि बेगाना'।"
रिपोर्ट में कहा गया, "खालसा की स्थापना दबे-कुचलों की रक्षा के लिए हुई थी, न कि आतंक और धमकी के बल पर एक मजहबी राज्य बनाने के लिए। आज की खालिस्तानी गतिविधियां, मंदिरों पर हमले, आतंकवादियों का महिमामंडन और कनाडा के सामुदायिक केंद्रों में कराए जा रहे तथाकथित 'जनमत संग्रह', का उस आध्यात्मिक और नैतिक विरासत से कोई लेना-देना नहीं है।"
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और विदेशों में रहने वाले ज्यादातर सिख खालिस्तान आंदोलन को किसी मकसद के बजाय बोझ के रूप में देखते हैं।
खालसा वॉक्स ने लिखा, "पंजाब में इसे न के बराबर चुनावी समर्थन हासिल है। कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया के पूर्व प्रधानमंत्री उज्जल दोसांझ कई बार कह चुके हैं कि पांच प्रतिशत से भी कम कनाडाई सिख इसका समर्थन करते हैं। ज्यादातर लोग सिर्फ काम करना, परिवार पालना और बिना किसी ठप्पे के अपने धर्म का पालन करना चाहते हैं। इसके बावजूद, मुखर अल्पसंख्यक ने लोगों के मन में 'सिख' को 'खालिस्तानी' के बराबर खड़ा कर दिया है।"
रिपोर्ट में कहा गया, "इसका नतीजा यह है कि आम सिखों को दुनियाभर में बदनामी की कीमत चुकानी पड़ रही है। मेहनती ट्रक ड्राइवर, कारोबारी, सैनिक और पेशेवर, जिनका समुदाय सेवा और समृद्धि के लिए जाना जाता है। आज देखते हैं कि उनकी पहचान उन लोगों द्वारा हथिया ली गई है, जो कुछ मामलों में संगठित अपराध में लिप्त हैं।"
--आईएएनएस
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