निर्जला एकादशी पर एलजी मनोज सिन्हा ने श्रीनगर में किया रुद्राभिषेक, शांति और समृद्धि की कामना
श्रीनगर, 25 जून (आईएएनएस)। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने गुरुवार को श्रीनगर के मैसूमा स्थित श्री आनंदीश्वर भैरव नाथ जी महाराज अस्थापन में शिवाचार्य अभिनवगुप्त जयंती और निर्जला एकादशी के पावन अवसर पर आयोजित रुद्राभिषेक समारोह में भाग लिया।
एलजी मनोज सिन्हा ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर लिखा, "आज श्रीनगर के मैसूमा स्थित श्री आनंदीश्वर भैरव नाथ जी महाराज अस्थापन में शिवाचार्य अभिनवगुप्त जयंती और निर्जला एकादशी के पावन अवसर पर आयोजित रुद्राभिषेक समारोह में शामिल हुआ।"
उन्होंने कहा, "कश्मीर शैव दर्शन के प्रमुख प्रवर्तक शिवाचार्य अभिनवगुप्त का जीवन और उनकी शिक्षाएं आज भी भारत की आध्यात्मिक विरासत को आलोकित कर रही हैं। सौंदर्यशास्त्र से लेकर आत्म-प्रत्यभिज्ञा (स्व-चेतना की पहचान) के गहन दर्शन तक, उनकी दृष्टि अद्वैत चेतना की एक कालातीत प्रेरणा बनी हुई है।"
एलजी ने श्रद्धालुओं से बातचीत की और उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं दीं।
एलजी सिन्हा ने कहा कि श्री आनंदिश्वर भैरव नाथ जी महाराज अस्थापन, जम्मू-कश्मीर के लोगों की सामूहिक चेतना में एक खास जगह रखता है।
उन्होंने सभी की शांति, भलाई और समृद्धि के लिए प्रार्थना की।
उन्होंने कहा कि महान ऋषियों की सोच हमें याद दिलाती है कि हमारा सामूहिक विकास और आपसी तालमेल खूबसूरती से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
इस मौके पर श्री आनंदीश्वर भैरव नाथ स्थापन ट्रस्ट की आयोजन और प्रबंधन समिति के सदस्य, वरिष्ठ सिविल और पुलिस अधिकारी मौजूद थे।
आचार्य अभिनवगुप्त (950–1025 ईस्वी) कश्मीर के 10वीं सदी के एक महान दार्शनिक, रहस्यवादी और बहुज्ञ विद्वान थे। उन्हें कश्मीर शैव मत का सबसे प्रमुख व्याख्याता और उसे व्यवस्थित करने वाला माना जाता है। यह एक अद्वैतवादी परंपरा है, जो पूरे ब्रह्मांड को शिव-चेतना की ही एक दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में देखती है।
उनकी शिक्षाओं और योगदान का दायरा कई मुख्य क्षेत्रों तक फैला है। अभिनवगुप्त ने सिखाया कि यह ब्रह्मांड कोई भ्रम नहीं है, बल्कि भगवान शिव की ऊर्जा (शक्ति) का एक वास्तविक और आनंदमय विस्तार है।
उन्होंने 'प्रत्यभिज्ञा' (आत्म-साक्षात्कार का मार्ग) पर जोर दिया यानी इस बात का अहसास कि व्यक्तिगत आत्मा और भगवान शिव मूल रूप से एक ही हैं।
उनकी ज्ञान-कोश जैसी महान रचना, 'तंत्रलोक', पहले से मौजूद जटिल तांत्रिक और शैव परंपराओं को एक साथ पिरोकर एक व्यापक आध्यात्मिक मार्गदर्शिका बनाती है।
भारतीय साहित्य में सौंदर्यशास्त्र पर अपनी टीकाओं, खासकर 'अभिनवभारती' (भरत के नाट्यशास्त्र पर उनकी टीका) के लिए उन्हें समान रूप से सराहा जाता है। इसमें बताया गया है कि कला किस तरह 'रस' (सौंदर्यपूर्ण भावना) जगाकर दर्शकों को चेतना की एक अलौकिक अवस्था में ले जाती है।
आचार्य अभिनवगुप्त ने मठों की सख़्त परंपराओं से हटकर यह सिखाया कि सच्ची चाहत रखने वाला कोई भी व्यक्ति, चाहे उसका सामाजिक दर्जा या लिंग कुछ भी हो, आध्यात्मिक मुक्ति पा सकता है।
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उनके समकालीन उन्हें स्वयं भगवान शिव का अवतार मानते थे।
क्षेत्रीय लोककथाओं के अनुसार, उन्होंने कश्मीर की पवित्र भैरव गुफा में अपने 1,200 शिष्यों के साथ प्रवेश करके अंतिम मोक्ष प्राप्त किया।
--आईएएनएस
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