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वैश्विक प्रतिस्पर्धा ही विदेशी निवेश आकर्षित करने की कुंजी, भारत को लगातार सुधार करते रहना होगा: सीईए नागेश्वरन

नई दिल्ली, 25 सितंबर (आईएएनएस)। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने शुक्रवार को भारत की विदेशी पूंजी आकर्षित करने की क्षमता की सराहना करते हुए कहा कि देश ने विनिर्माण क्षेत्र और व्यापक आर्थिक सुधारों के जरिए निवेशकों का विश्वास बढ़ाया है। हालांकि उन्होंने जोर देकर कहा कि उद्योग जगत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहना है।
 

नई दिल्ली, 25 सितंबर (आईएएनएस)। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने शुक्रवार को भारत की विदेशी पूंजी आकर्षित करने की क्षमता की सराहना करते हुए कहा कि देश ने विनिर्माण क्षेत्र और व्यापक आर्थिक सुधारों के जरिए निवेशकों का विश्वास बढ़ाया है। हालांकि उन्होंने जोर देकर कहा कि उद्योग जगत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहना है।

राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित 13वें पीएएफआई वार्षिक फोरम को संबोधित करते हुए नागेश्वरन ने कहा कि जब भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को बढ़ाने की बात होती है तो आम धारणा यह रहती है कि देश को और अधिक प्रयास करने चाहिए। उन्होंने कहा कि बेहतर करने की गुंजाइश हमेशा रहती है, लेकिन निवेश के फैसले अब ऐसे वैश्विक माहौल में लिए जा रहे हैं जो पहले की तुलना में काफी बदल चुका है।

उन्होंने कहा कि भारत विदेशी निवेश के लिए अपनी आकर्षण क्षमता बढ़ाने के लिए लगातार कदम उठा रहा है, लेकिन दुनिया तेजी से बदल रही है। ऐसे में भारत को भी लगातार अपनी नीतियों और व्यवस्था को बेहतर बनाना होगा। नागेश्वरन ने कहा कि केवल सुधारों की सूची पूरी कर देने से यह जरूरी नहीं कि अगले ही दिन विदेशी पूंजी का प्रवाह शुरू हो जाए।

उन्होंने कहा कि कई बार कोई देश सभी सही कदम उठाता है, लेकिन फिर भी तत्काल परिणाम नहीं दिखाई देते। इससे लोगों में यह धारणा बनती है कि और अधिक सुधारों की जरूरत है। जबकि वास्तविकता यह है कि वैश्विक आर्थिक और वित्तीय परिदृश्य लगातार बदल रहा है और निवेशकों के फैसले उसी व्यापक संदर्भ में लिए जाते हैं।

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने आगे कहा कि 7 प्रतिशत या उससे अधिक की स्थिर आर्थिक वृद्धि, घटती मुद्रास्फीति और राजकोषीय अनुशासन जैसे संकेतकों का निवेशकों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि इन्हीं कारकों के चलते भारत को हाल के वर्षों में क्रेडिट रेटिंग अपग्रेड का लाभ भी मिला है।

नागेश्वरन ने बताया कि निवेशकों की सुरक्षा, कर नीति में स्थिरता और पूर्वानुमेयता, कुशल कार्यबल की उपलब्धता तथा मजबूत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क जैसे कारक भी निवेश निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि यदि अर्थव्यवस्था में व्यापक स्थिरता मौजूद नहीं है, तो केवल इन उपायों के आधार पर निवेश आकर्षित करना आसान नहीं होता।

उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक ब्याज दरों के बदलते माहौल का भी विदेशी निवेश प्रवाह पर गहरा प्रभाव पड़ता है। पूंजी की लागत और सीमा-पार निवेश के फैसले अब पहले की तुलना में अधिक संवेदनशील हो गए हैं।

इस सप्ताह जारी एसोचैम के एक अध्ययन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की एफडीआई नीति का अगला चरण केवल निवेश आकर्षित करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके बजाय ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जिसमें निवेश लंबे समय तक टिक सके, उसका विस्तार हो सके और वह भारतीय औद्योगिक तथा आर्थिक तंत्र के साथ अधिक गहराई से जुड़ सके।

आधिकारिक डीपीआईआईटी और आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल एफडीआई प्रवाह वित्त वर्ष 2000-01 के लगभग 4 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 95 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसी अवधि में एफडीआई इक्विटी निवेश 2 अरब डॉलर से बढ़कर 59 अरब डॉलर हो गया।

आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2000-01 से लेकर वित्त वर्ष 2025-26 तक भारत को कुल मिलाकर लगभग 1.16 ट्रिलियन डॉलर का एफडीआई प्राप्त हुआ है, जबकि एफडीआई इक्विटी निवेश का संचयी प्रवाह 791 अरब डॉलर रहा है।

--आईएएनएस

डीबीपी