भारतीय स्टील इंडस्ट्री ने वित्त वर्ष 26 में दर्ज की 10.7 प्रतिशत की वृद्धि
नई दिल्ली, 8 अप्रैल (आईएएनएस)। भारत की स्टील इंडस्ट्री का उत्पादन वित्त वर्ष 26 में सालाना आधार पर 10.7 प्रतिशत बढ़कर 168.4 मिलियन टन हो गया है। इससे विश्व के दूसरे सबसे बड़े स्टील उत्पादक के रूप देश का आधार मजबूत हुआ है। यह जानकारी स्टील मंत्रालय द्वारा बुधवार को दी गई।
मंत्रालय के मुताबिक, वित्त वर्ष 26 में घरेलू मांग प्रमुख विकास चालक बनी रही, जिसमें तैयार स्टील की खपत 164 मिलियन टन रही, जो बुनियादी ढांचे, निर्माण, रेलवे और विनिर्माण क्षेत्रों में बढ़ी हुई गतिविधि के कारण लगभग 7-8 प्रतिशत तक बढ़ गई।
बयान में कहा गया कि सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और शहरीकरण पर लगातार जोर देने से इस अवधि के दौरान स्टील की खपत में बढ़ोतरी हुई है।
वित्त वर्ष 2025-26 की एक प्रमुख उपलब्धि भारत का मजबूत निर्यात प्रदर्शन रहा। अप्रैल-मार्च के दौरान तैयार इस्पात का निर्यात 35.9 प्रतिशत बढ़कर 60 लाख टन से अधिक हो गया, जबकि आयात में 31.7 प्रतिशत की भारी गिरावट आई।
बयान में बताया गया है कि इस बदलाव से भारत ने स्टील के शुद्ध निर्यातक के रूप में अपनी स्थिति पुनः प्राप्त कर ली है और मध्य पूर्व, यूरोप और दक्षिण पूर्व एशिया जैसे वैश्विक बाजारों में अपनी उपस्थिति मजबूत की है।
बाजारों के विविधीकरण और भारतीय स्टील उत्पादों की बेहतर प्रतिस्पर्धात्मकता ने भी निर्यात में वृद्धि को बढ़ावा दिया।
वित्त वर्ष 26 उत्पादन क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से उद्योग में निरंतर निवेश जारी रहा। इस दौरान भारत की कुल स्टील उत्पादन क्षमता बढ़कर 2.2 करोड़ टन तक पहुंच गई और सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के निवेशों के समर्थन से 2030 तक 3 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है।
सेल, टाटा स्टील और जेएसडब्ल्यू स्टील जैसी प्रमुख कंपनियों ने क्षमता विस्तार, टेक्नोलॉजी अपग्रेड और वैल्यू एडेड स्टील उत्पादन में निवेश जारी रखा, जो दीर्घकालिक मांग वृद्धि में उनके विश्वास को दर्शाता है।
भारत में स्टील की कीमतों में पिछले तीन वर्षों में गिरावट देखी गई, लेकिन 2026 की शुरुआत में इनमें सुधार हुआ। हालांकि, कच्चे माल की लागत, विशेष रूप से कोकिंग कोयले की लागत में उतार-चढ़ाव और वैश्विक कीमतों में अस्थिरता के कारण मुनाफे पर दबाव बना रहा।
बयान में कहा गया है कि भू-राजनीतिक संकट के कारण वर्ष के अंत में बढ़ी हुई लॉजिस्टिक्स और माल ढुलाई लागत ने भी मार्जिन को प्रभावित किया।
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