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चोरबाट ला युद्ध : सेना ने कारगिल के नायकों को दी श्रद्धांजलि, बर्फीले दर्रे को पाकिस्तानी घुसपैठियों से कराया था मुक्त

नई दिल्ली, 30 मई (आईएएनएस)। भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने दिवंगत कर्नल सोनम वांगचुक और 3 लद्दाख स्काउट्स के जवानों की वीरता को श्रद्धांजलि अर्पित की है। सेना ने 30 मई 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान बटालिक सेक्टर में हुई चोरबाट ला की लड़ाई में उनके अदम्य साहस और पराक्रम को याद किया, जो उस युद्ध की एक महत्वपूर्ण सैन्य कार्रवाई थी।
 
चोरबाट ला युद्ध : सेना ने कारगिल के नायकों को दी श्रद्धांजलि, बर्फीले दर्रे को पाकिस्तानी घुसपैठियों से कराया था मुक्त

नई दिल्ली, 30 मई (आईएएनएस)। भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने दिवंगत कर्नल सोनम वांगचुक और 3 लद्दाख स्काउट्स के जवानों की वीरता को श्रद्धांजलि अर्पित की है। सेना ने 30 मई 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान बटालिक सेक्टर में हुई चोरबाट ला की लड़ाई में उनके अदम्य साहस और पराक्रम को याद किया, जो उस युद्ध की एक महत्वपूर्ण सैन्य कार्रवाई थी।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए गए एक पोस्ट में कॉर्प्स ने कर्नल (तत्कालीन मेजर) सोनम वांगचुक के उस वक्तव्य को उद्धृत किया, जिसमें उन्होंने कहा था, “चोरबाट ला में मैंने जो किया, वह मेरा कर्तव्य था, कोई असाधारण कार्य नहीं।” पोस्ट में बताया गया कि अत्यंत कठिन परिस्थितियों में उन्होंने अग्रिम मोर्चे से नेतृत्व किया, जिससे ‘ऑपरेशन विजय’ के दौरान भारत को शुरुआती महत्वपूर्ण सफलताओं में से एक प्राप्त हुई।

पोस्ट में आगे कहा गया, “मेजर सोनम वांगचुक और 3 लद्दाख स्काउट्स के बहादुर जवानों ने बटालिक सेक्टर में चोरबाट ला की लड़ाई के दौरान इतिहास रच दिया। शून्य से नीचे के तापमान, बर्फीले तूफानों, दुश्मन की गोलीबारी और बेहद कठिन भूभाग का सामना करते हुए मेजर वांगचुक ने अग्रिम पंक्ति से नेतृत्व किया। उन्होंने सोनम-1 और सोनम-2 में निगरानी चौकियां स्थापित कीं, दुश्मन का सफाया किया और पाकिस्तानी सैनिकों को लद्दाख पर्वत श्रृंखला की रिजलाइन पर नियंत्रण स्थापित करने से रोक दिया। भारत उन्हें गर्व और कृतज्ञता के साथ याद करता है।”

अत्यधिक ऊंचाई और हिमाच्छादित क्षेत्र में लड़ी गई चोरबाट ला की लड़ाई, कारगिल संघर्ष के दौरान घुसपैठियों द्वारा कब्जा किए गए रणनीतिक ठिकानों को पुनः हासिल करने के लिए भारत द्वारा चलाए गए व्यापक ‘ऑपरेशन विजय’ का हिस्सा थी।

‘स्नो वॉरियर्स’ (हिम योद्धा) के नाम से प्रसिद्ध लद्दाख स्काउट्स ने इस अभियान के दौरान उच्च हिमालयी युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने नियंत्रण रेखा (एलओसी) के साथ दुनिया की सबसे कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों में अभियान संचालित किए।

आधिकारिक अभिलेखों और सैन्य विवरणों के अनुसार मई 1999 की शुरुआत में घुसपैठ का पता चलने के बाद लद्दाख स्काउट्स उन पहली इकाइयों में शामिल थी जिन्हें बटालिक सेक्टर में तैनात किया गया था। इस इकाई ने प्रमुख पर्वतीय रिजलाइनों से दुश्मन को खदेड़ने के लिए कई हमले और टोही अभियान चलाए। ये अभियान अक्सर 18,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर भारी तोपखाने की गोलाबारी और कठोर मौसम के बीच संचालित किए गए।

इस क्षेत्र में मेजर वांगचुक की कार्रवाइयों को भारत के लिए शुरुआती सामरिक सफलताएं सुनिश्चित करने का श्रेय दिया जाता है। बटालिक क्षेत्र में रिजलाइनों पर नियंत्रण, नियंत्रण रेखा के साथ आने-जाने वाले मार्गों पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।

भारतीय सेना के एक सम्मानित अधिकारी और लद्दाख की सबसे प्रतिष्ठित सैन्य हस्तियों में से एक कर्नल सोनम वांगचुक को ‘ऑपरेशन विजय’ के दौरान उनके असाधारण साहस के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। ‘लायन ऑफ लद्दाख’ (लद्दाख का शेर) के नाम से प्रसिद्ध कर्नल वांगचुक को 1999 के कारगिल युद्ध में उनके निर्भीक नेतृत्व के लिए याद किया जाता है। विशेष रूप से बटालिक सेक्टर में चोरबाट ला की लड़ाई के दौरान उनके साहसिक कार्यों के लिए, जो भारतीय सैन्य इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय बन चुके हैं।

कर्नल सोनम वागंचुक का 10 अप्रैल 2026 को हार्ट अटैक से निधन हो गया था। सेना में आज भी उनके योगदान को सम्मान की नजर से देखा जाता है।

--आईएएनएस

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