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भारत ने प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ के खिलाफ दर्ज कराई आपत्ति

वाशिंगटन, 2 जुलाई (आईएएनएस)। भारत अगले सप्ताह अपने निर्यात पर प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ के खिलाफ समन्वित तरीके से चुनौती दे रहा है। सरकारी अधिकारियों और प्रमुख उद्योग संगठनों का कहना है कि जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) को लेकर वॉशिंगटन के निष्कर्ष कानूनी रूप से कमजोर हैं, पर्याप्त साक्ष्यों पर आधारित नहीं हैं और इनसे दुनिया की सबसे बड़ी तथा पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच जुड़ी आपूर्ति श्रृंखलाएं प्रभावित हो सकती हैं।
 

वाशिंगटन, 2 जुलाई (आईएएनएस)। भारत अगले सप्ताह अपने निर्यात पर प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ के खिलाफ समन्वित तरीके से चुनौती दे रहा है। सरकारी अधिकारियों और प्रमुख उद्योग संगठनों का कहना है कि जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) को लेकर वॉशिंगटन के निष्कर्ष कानूनी रूप से कमजोर हैं, पर्याप्त साक्ष्यों पर आधारित नहीं हैं और इनसे दुनिया की सबसे बड़ी तथा पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच जुड़ी आपूर्ति श्रृंखलाएं प्रभावित हो सकती हैं।

यह चुनौती 8 जुलाई को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ऑफिस (यूएसटीआर) की सेक्शन 301 कमेटी के सामने पेश की जाएगी। फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एफआईसीसीआई) की पूर्णिमा शेनॉय और कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) की शुचिता सोनालिका पैनल 8 के दौरान गवाही देंगी।

पैनल 9 में उनके बाद वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के डॉ. बृज मोहन और कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए) के शुभम अरोड़ा होंगे। ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एसीएमए) के डायरेक्टर जनरल विनी मेहता 9 जुलाई को गवाही देंगे।

यह सुनवाई यूएसटीआर के उस प्रस्ताव के बाद हो रही है जिसमें सेक्शन 301 की जांच के तहत भारत से आयात पर 12.5 फीसदी की अतिरिक्त ड्यूटी लगाने का प्रस्ताव है। यह जांच इस बात की जांच करेगी कि क्या देश जबरदस्ती मजदूरी से बनाए गए सामान के निर्यात पर रोक लगाते हैं और उसे असरदार तरीके से लागू करते हैं। आखिरी फैसला लेने से पहले यह प्रस्ताव पब्लिक कमेंट्स के लिए खुला है।

भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने यूएसटीआर के नतीजों को खारिज कर दिया है। अपनी रिपोर्ट में, मंत्रालय ने कहा है कि भारत में एक मजबूत घरेलू कानूनी सिस्टम है जो एक स्ट्रक्चर्ड और प्रोग्रेसिव अप्रोच दिखाता है, जिसमें कानूनी रोक, संस्थागत प्रणाली और जबरदस्ती मजदूरी की कमजोरी को कम करने के मकसद से चल रहे पॉलिसी उपाय शामिल हैं।"

भारत का यह भी तर्क है कि इस बात के पर्याप्त और ठोस साक्ष्य नहीं हैं कि भारत की आयात व्यवस्था अमेरिकी व्यापार पर कोई अनुचित बोझ डालती है या उसे प्रतिबंधित करती है, जबकि सेक्शन 301 के तहत कार्रवाई करने के लिए इस तरह के प्रमाण होना आवश्यक है।

कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री ने प्रस्तावित कार्रवाई के खिलाफ एक विस्तृत कानूनी और आर्थिक मामला बनाया है।

सीआईआई का कहना है कि यूएस ट्रेड एक्ट के सेक्शन 301 के तहत भारत का पॉलिसी फ्रेमवर्क गलत या भेदभावपूर्ण नहीं है। भारत के कानूनी सुरक्षा उपाय संविधान के आर्टिकल 23 में शामिल हैं और बॉन्डेड लेबर सिस्टम (एबोलिशन) एक्ट, चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट एक्ट और 2019 और 2020 के बीच अपनाए गए चार लेबर कोड से और मजबूत हुए हैं।

इंडस्ट्री बॉडी ने सूचीबद्ध कंपनियों के लिए अनिवार्य पर्यावरण, सामाजिक और गवर्नेंस (ईएसजी) रिपोर्टिंग तथा बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (बीआरएसआर) के प्रावधानों का भी उल्लेख किया।

संगठन ने कहा कि भारत ने जबरन श्रम और बाल श्रम के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के प्रमुख समझौतों का अनुमोदन किया है। सीआईआई ने यूएसटीआर रिपोर्ट में दिए गए उदाहरणों पर आपत्ति जताई है।

इसमें कहा गया है कि भारत ने 2021-2025 के रिव्यू पीरियड के दौरान म्यांमार से कोई चावल और मलावी से कोई तंबाकू आयात नहीं किया। इसका तर्क है कि ये उदाहरण भारत के आयात और जबरन मजदूरी के बीच कोई सीधा संबंध साबित नहीं करते हैं।

सीआईआई ने यह भी कहा कि भारत ने 2021 और 2025 के बीच 1.537 बिलियन अमेरिकी डॉलर का अमेरिकी कॉटन आयात किया, जो चीन से उसके आयात का लगभग दोगुना है। इससे पता चलता है कि इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं है कि भारत की नीतियां अमेरिकी कॉमर्स पर गलत तरीके से बोझ डालती हैं।

सीआईआई का आगे कहना है कि फोर्जिंग, फाउंड्री और खेती की मशीनरी जैसे क्षेत्रों में कैपिटल-इंटेंसिव, स्किल-डिपेंडेंट और ग्लोबली इंटीग्रेटेड हैं। जबरदस्ती मजदूरी का इस्तेमाल इन उद्योगों के साथ बिल्कुल भी मेल नहीं खाता। अमेरिकी मैन्युफैक्चरर्स को सप्लाई करने वाले भारतीय एक्सपोर्टर्स पहले से ही बायर-डायरेक्टेड कम्प्लायंस सिस्टम और वॉलंटरी सर्टिफिकेशन प्रोग्राम के तहत काम करते हैं।

सीआईआई का कहना है, "प्रस्तावित 12.5 फीसदी अतिरिक्त ड्यूटी से भारतीय इनपुट पर निर्भर अमेरिकी मैन्युफैक्चरर्स की लागत बढ़ेगी, जबकि नीति का मकसद पूरा नहीं होगा।" यह यूएसटीआर से अपील करता है कि वह दंडात्मक टैरिफ के ज्यादा प्रभावी और सही विकल्प के तौर पर स्थापित भारत-अमेरिका ट्रेड पॉलिसी फोरम के जरिए कंप्लायंस-आधारित सहयोग को आगे बढ़ाए।

एफआईसीसीआई ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया है। इंडस्ट्री बॉडी का कहना है कि अमेरिकी बाजार में सर्विस देने वाली भारतीय एक्सपोर्ट सप्लाई चेन पहले से ही अच्छी तरह से बने हुए कम्प्लायंस फ्रेमवर्क के अंदर काम करती हैं, जो ट्रेसेबिलिटी, सप्लायर ड्यू डिलिजेंस, इंडिपेंडेंट ऑडिट और जिम्मेदार सोर्सिंग के आस-पास बने हैं।

इसका तर्क है कि बड़े पैमाने पर टैरिफ से अमेरिकी व्यवसाय और उपभोक्ताओं की लागत बढ़ेगी, जबकि हाल के सालों में काफी बढ़ी हुई मजबूत सप्लाई चेन में रुकावट आएगी।

एपीईडीए कमिटी के सामने भारत के कृषि निर्यात का बचाव करने का प्लान बना रहा है। एफआईसीसीआई का कहना है कि भारत का चावल सेक्टर जबरन मजदूरी नहीं लेता है और न ही वह जबरदस्ती मजदूरी से बने या इस्तेमाल किए गए इनपुट आयात करता है। इसका तर्क है कि भारतीय चावल एक्सपोर्ट मान्यता प्राप्त स्टैंडर्ड का पालन करता है और उस पर प्रस्तावित अतिरिक्त ड्यूटी नहीं लगनी चाहिए।

एसीएमए ने मैन्युफैक्चरिंग पर पड़ने वाले प्रभाव पर फोकस किया है। इसका कहना है कि भारत की ऑटोमोटिव कंपोनेंट इंडस्ट्री ऑर्गनाइज्ड, टेक्नोलॉजी से चलने वाली और पहले से मौजूद लेबर कंप्लायंस फ्रेमवर्क से चलने वाली है।

एसोसिएशन ने यूएसटीआर से ऑटोमोटिव कंपोनेंट्स को छूट देने के लिए कहा है। इसका तर्क है कि अतिरिक्त ड्यूटी से इंटीग्रेटेड सप्लाई चेन में रुकावट आएगी, अमेरिकी मैन्युफैक्चरर्स के लिए लागत बढ़ेगी और अमेरिकन ऑटोमोटिव इंडस्ट्री के लिए सोर्सिंग में अनिश्चितता पैदा होगी।

सेक्शन 301 की जांच 60 अर्थव्यवस्था को कवर करती है और इस बात पर फोकस करती है कि क्या देशों ने पूरी तरह या कुछ हद तक जबरदस्ती मजदूरी से किए गए आयात पर कानूनी रोक लगाई है और उसे प्रभावी तरीके से लागू किया है। यूएसटीआर का कहना है कि ऐसे उपायों की कमी से अमेरिकी बिजनेस के लिए गलत कॉम्पिटिशन पैदा होता है।

भारत का कहना है कि उसके संवैधानिक सुरक्षा, लेबर कानून, रेगुलेटरी फ्रेमवर्क और कॉर्पोरेट कंप्लायंस सिस्टम पहले से ही जबरदस्ती मजदूरी के खिलाफ मजबूत सुरक्षा उपाय देते हैं। उसका कहना है कि इसलिए प्रस्तावित टैरिफ गैर-जरूरी है और इससे भारत-अमेरिका की बढ़ती व्यापार साझेदारी कमजोर हो सकती है।

--आईएएनएस

केके/पीएम