आईएएनएस रिव्यू: मेघना गुलजार की ‘दायरा’ वास्तविकता से जुड़ा रोमांचक सिनेमाई अनुभव
मुंबई, 17 सितंबर (IANS)। रेटिंग: 4.5 स्टार। निर्देशक: मेघना गुलजार। कलाकार: करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन। कुछ फिल्में सिर्फ एक कहानी सुनाती हैं, जबकि कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो आपको यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि आखिर न्याय और अन्याय के बीच की रेखा कहां खींची जानी चाहिए। मेघना गुलजार की ‘दायरा’ इसी दूसरी श्रेणी की फिल्म है।
फिल्म में करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन मुख्य भूमिकाओं में हैं। दोनों ऐसे पुलिस अधिकारियों का किरदार निभाते हैं जो न्याय में विश्वास रखते हैं, लेकिन न्याय दिए जाने के तरीके को लेकर उनकी सोच बिल्कुल अलग है। एक परेशान करने वाले दुष्कर्म मामले और उसके बाद की घटनाओं की पृष्ठभूमि में बनी ‘दायरा’ कानून, जवाबदेही, संस्थागत शक्ति और उस असहज धुंधले क्षेत्र की पड़ताल करती है, जहां कानूनी रूप से सही चीज भावनात्मक तौर पर सही महसूस होने वाली चीज से अलग हो सकती है।
मेघना गुलजार, करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन की यह पहली साथ में फिल्म है और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी चर्चाओं में से एक है। तीनों का यह संयोजन पर्दे पर काफी प्रभावशाली नजर आता है।
‘दायरा’ की कहानी डीसीपी अजूनी कोहली, जिसका किरदार करीना कपूर खान ने निभाया है, और डीसीपी रमन कुमार, जिसकी भूमिका पृथ्वीराज सुकुमारन ने निभाई है, के इर्द-गिर्द घूमती है। एक गंभीर दुष्कर्म का मामला दोनों को एक साथ लाता है, लेकिन न्याय को लेकर उनके अलग-अलग नजरिए उन्हें व्यवस्था के दो अलग-अलग पक्षों में खड़ा कर देते हैं।
रमन का मानना है कि इस तरह के जघन्य अपराध के लिए जिम्मेदार लोगों को सबसे कठोर सजा मिलनी चाहिए, भले ही इसके लिए प्रक्रिया पारंपरिक कानूनी सीमाओं से बाहर क्यों न चली जाए। वहीं, अजूनी को एक मुठभेड़ की जांच और उसके पीछे की परिस्थितियों को समझने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है।
जो शुरुआत में एक जांच के तौर पर सामने आता है, वह धीरे-धीरे कहीं ज्यादा जटिल होता चला जाता है। जैसे-जैसे अजूनी मामले की गहराई में जाती है, कहानी पुलिस के अधिकार, सबूत, जनदबाव और उस सामाजिक नजरिए पर सवाल खड़े करती है, जिसके तहत पीड़ित होने के बावजूद अक्सर महिलाओं को ही समाज के फैसले का सामना करना पड़ता है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह संघर्ष को पूरी तरह काले और सफेद के रूप में पेश नहीं करती। दोनों किरदारों के पास न्याय को लेकर अपनी-अपनी समझ है और इन दोनों विश्वासों का टकराव कहानी में लगातार तनाव बनाए रखता है। करीना कपूर खान डीसीपी अजूनी कोहली के किरदार में फिल्म की सबसे मजबूत प्रस्तुतियों में से एक देती हैं।
उनके किरदार में न तो अनावश्यक रूप से चीखना-चिल्लाना है और न ही जरूरत से ज्यादा आक्रामकता। इसके बजाय करीना अपने बॉडी लैंग्वेज, चेहरे के भाव और शांत अधिकार के जरिए किरदार को प्रभावी बनाती हैं। वह ऐसी अधिकारी के रूप में नजर आती हैं जिसने वर्षों तक व्यवस्था को समझा है और जिसे पता है कि कब बोलना है और कब चुप रहना है।
अजूनी को सामान्य फिल्मों में दिखाए जाने वाले रूढ़िवादी ‘कठोर महिला पुलिस अधिकारी’ के रूप में भी पेश नहीं किया गया है। वर्दी के अलावा उसके किरदार की अपनी पहचान और व्यक्तित्व है, जो उसे ज्यादा वास्तविक बनाता है। करीना भावनात्मक दृश्यों में भी संयम बनाए रखती हैं और किरदार की गंभीरता को स्वाभाविक तरीके से सामने आने देती हैं।
वहीं, पृथ्वीराज सुकुमारन भी अपने किरदार में तीव्रता लेकर आते हैं, लेकिन उसे जरूरत से ज्यादा नहीं बढ़ाते। डीसीपी रमन कुमार के रूप में वह उतने ही प्रभावी हैं। उनके किरदार में गुस्सा, दृढ़ विश्वास और न्याय की अपनी परिभाषा को लेकर मजबूत आस्था है। लेकिन पृथ्वीराज रमन को सिर्फ एक आक्रामक पुलिस अधिकारी के रूप में पेश नहीं करते। वह अपने अभिनय को संतुलित रखते हैं। उनके बोलने, प्रतिक्रिया देने और टकराव से निपटने के तरीके में एक अंदरूनी तीव्रता लगातार महसूस होती है।
करीना और पृथ्वीराज के किरदारों के बीच पेशेवर टकराव फिल्म के सबसे दिलचस्प हिस्सों में से एक बन जाता है। उनके बीच का संघर्ष सिर्फ व्यक्तिगत नहीं है। असल में यह कानून, सजा और न्याय की दो अलग-अलग व्याख्याओं के बीच टकराव है। कनवलजीत सिंह, तृप्ति खामकर और क्षिती जोग सहित सहायक कलाकार भी कहानी को मजबूती देते हैं और फिल्म की तनावपूर्ण दुनिया में स्वाभाविक रूप से फिट बैठते हैं।
मेघना गुलजार ने लगातार ऐसी कहानियों में रुचि दिखाई है, जहां किसी व्यक्ति की पसंद और फैसले व्यापक सामाजिक मुद्दों से जुड़ते हैं और ‘दायरा’ भी इसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाती है। मेघना गुलजार, सीमा अग्रवाल और यश केसवानी की पटकथा मामले के आसान जवाबों की तरफ जल्दबाजी से नहीं बढ़ती। इसके बजाय यह जांच को धीरे-धीरे आगे बढ़ने देती है और मामले से जुड़ी जटिलताओं को सामने आने का समय देती है।
फिल्म में जो बात विशेष रूप से प्रभावी है, वह यह है कि यौन हिंसा को केवल दर्शकों को चौंकाने वाले एक आसान माध्यम के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया गया है। फिल्म इसके बाद होने वाली घटनाओं, जांच और संस्थागत प्रतिक्रिया को देखती है। साथ ही यह भी दिखाती है कि ऐसे मामलों में लोगों की धारणा और सामाजिक फैसला किस तरह प्रभाव डाल सकता है।
फिल्म के केंद्र में एक सीधा लेकिन असहज सवाल लगातार बना रहता है- जब न्याय मिलने में बहुत देर हो जाए तो आखिर किस बिंदु पर यह इंतजार खुद अन्याय जैसा महसूस होने लगता है? यही सवाल ‘दायरा’ को भावनात्मक और समकालीन प्रासंगिकता देता है।
हालांकि, फिल्म पूरी तरह खामियों से मुक्त नहीं है। दूसरे हाफ में मुठभेड़ की जांच के दौरान फिल्म कुछ ज्यादा तकनीकी और संवाद प्रधान हो जाती है और यहां इसकी गति थोड़ी धीमी महसूस होती है। कानूनी और प्रक्रियात्मक हिस्सों को भी कुछ जगहों पर थोड़ा ज्यादा स्वाभाविक बनाया जा सकता था। हालांकि, फिल्म के कुल प्रभाव को देखते हुए ये कमियां अपेक्षाकृत मामूली लगती हैं।
‘दायरा’ एक ऐसी रोमांचक क्राइम ड्रामा फिल्म है जो आसान जवाब देने के बजाय सवाल खड़े करती है। मेघना गुलजार फिल्म को गंभीर और वास्तविक धरातल पर रखती हैं, जबकि करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन कहानी को जरूरी भावनात्मक और नैतिक वजन देते हैं। न्याय को लेकर दोनों के अलग-अलग नजरिए कहानी का केंद्रीय संघर्ष तैयार करते हैं और पटकथा दर्शकों को जांच की प्रक्रिया से जोड़े रखती है।
फिल्म विचार करने पर मजबूर करती है, लेकिन अपने थ्रिलर वाले तत्व को भी नहीं खोती। इसकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह आपको यह नहीं बताती कि आपको क्या सोचना चाहिए। यह आपके सामने एक परिस्थिति रखती है, विरोधाभासी नजरिए पेश करती है और सवालों को आपके साथ छोड़ देती है।
मजबूत अभिनय, सधी हुई निर्देशन शैली और आज भी बेहद प्रासंगिक विषय के साथ ‘दायरा’ सिनेमाघरों में देखने लायक एक प्रभावशाली अनुभव बनती है।
‘दायरा’ का निर्माण जंगली पिक्चर्स और डॉ. जयंतीलाल गड़ा (पेन स्टूडियोज) ने किया है। फिल्म का वितरण पेन मरुधर द्वारा किया गया है। फिल्म 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है।
--आईएएनएस
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