गुजरात : धोलेरा में ड्रम प्लांटेशन तकनीक से खारी जमीन हुई हरी-भरी, पायलट प्रोजेक्ट हुआ सफल
गांधीनगर, 4 जून (आईएएनएस)। गुजरात के धोलेरा के अत्यधिक खारे इलाके में ड्रम-आधारित पौधरोपण का उपयोग करने वाली एक प्रायोगिक वनीकरण तकनीक ने शुरुआती दौर में ही शानदार नतीजे दिखाए हैं।
इस तकनीक के तहत पहले बंजर रही जमीन पर लगाए गए 3,200 से अधिक पौधे न केवल जीवित रहे बल्कि कई मामलों में तो एक साल के अंदर ही 12 फुट तक बढ़ गए; जिसके परिणामस्वरूप, इस परियोजना का विस्तार अब अतिरिक्त 20 हेक्टेयर जमीन पर किया जा रहा है।
यह पहल अहमदाबाद जिले के धोलेरा स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन (डीएसआईआर) के एक्टिवेशन एरिया के ब्लॉक नंबर 29 में लागू की गई है, जिसे धोलेरा स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (डीएसआईआरडीए) से फंडिंग सपोर्ट मिला है।
वन विभाग ने बताया कि यह पहल मिट्टी में अत्यधिक खारापन और लंबे समय तक जलभराव की समस्या को दूर करने के लिए डिजाइन की गई थी जिसकी वजह से ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र में पेड़-पौधों का उगना बेहद मुश्किल रहा है।
अधिकारियों ने बताया कि साइट के कुछ हिस्सों में मिट्टी में बहुत ज्यादा इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी और बहुत कम कार्बन की मात्रा पाई जाती है जबकि जलभराव छह महीने तक बना रह सकता है। ऐसी परिस्थितियों में पारंपरिक तरीके से पेड़ लगाने के तरीके ज्यादातर असफल रहे हैं।
अगस्त 2025 में अहमदाबाद सोशल फॉरेस्ट्री डिवीजन द्वारा विकसित 'ड्रम प्लांटेशन' तरीके का इस्तेमाल करके पौधे लगाए गए थे। इस तरीके में छोटे पौधों को प्लास्टिक के ड्रमों के अंदर रखा जाता है, जिनमें रेत, पोषक तत्वों से भरपूर मिट्टी, वर्मी कम्पोस्ट, कोकोपीट और सूखी घास का एक नियंत्रित मिश्रण भरा होता है।
ड्रमों में छेद किए जाते हैं ताकि हवा का आवागमन बना रहे और उन्हें जमीन में लगभग एक फुट नीचे गाड़ दिया जाता है। इससे पौधों की जड़ें मिट्टी की सबसे ज्यादा खारी परतों से ऊपर रहती हैं।
अहमदाबाद सोशल फॉरेस्ट्री डिवीजन की उप वन संरक्षक, डॉ. मीनल जानी ने बताया कि इस तरीके को क्षेत्र की पर्यावरणीय बाधाओं को दूर करने के लिए अपनाया गया था।
उन्होंने कहा, "मिट्टी में बहुत ज्यादा इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी थी, कार्बन की मात्रा न के बराबर थी, और खारापन बहुत ज्यादा था। इसके अलावा, इस क्षेत्र में छह महीने तक पानी जमा रहता है, जिससे पौधों का उगना लगभग असंभव हो जाता है।"
उन्होंने आगे कहा, "इस समस्या को हल करने के लिए, हमने 'ड्रम प्लांटेशन' तकनीक अपनाई, जिसमें पौधों को विशेष रूप से तैयार किए गए माध्यम से भरे ड्रमों के अंदर, जमीन से कुछ ऊपर की सतह पर लगाया जाता है।"
उन्होंने बताया कि पूरे प्लांटेशन क्षेत्र में एक 'ड्रिप इरिगेशन' (बूंद-बूंद सिंचाई) सिस्टम लगाया गया है, और डीएसआईआरडीए ने सिंचाई की जरूरतों को पूरा करने के लिए खारा पानी उपलब्ध कराया है।
उनके अनुसार, इस व्यवस्था की वजह से, विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लगाए गए पौधों के जीवित रहने की दर काफी अच्छी रही है।
डॉ. जानी ने कहा, "एक साल से भी कम समय में, कई पौधे बढ़कर 12 फुट तक ऊंचे हो गए हैं, जो इस तरह की जमीन के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।"
उन्होंने यह भी बताया कि कुछ प्रजातियों में फूल और फल आने शुरू हो गए हैं, जिससे प्लांटेशन क्षेत्र में परागण करने वाले कीटों की वापसी हुई है और पक्षियों की गतिविधियां भी बढ़ी हैं। इस प्लांटेशन में 15 से ज्यादा तरह के पेड़ शामिल हैं, जिनमें साल्वाडोरा पर्सिका, ब्यूटिया मोनोस्पर्मा, बॉम्बैक्स सीइबा, थेस्पेसिया पॉपुलनिया, फिकस बेंघालेंसिस, फिकस रिलिजियोसा, पेल्टोफोरम पेटरोकार्पम, एकासिया निलोटिका, पोंगामिया पिनाटा, टर्मिनलिया अर्जुन, पिथेसेलोबियम डल्से, अजाडिराक्टा इंडिका, कॉर्डिया डाइचोटोमा और टैमारिंडस इंडिका शामिल हैं।
अधिकारियों ने बताया कि जिस इलाके को पहले पौधों के लगातार बढ़ने के लिए ठीक नहीं माना जाता था, वहां अब पेड़-पौधे उगने लगे हैं। इससे इकोलॉजिकल हलचल के शुरुआती संकेत मिलने लगे हैं, जैसे कि उस जगह के कुछ हिस्सों में कीड़े-मकोड़े, तितलियां और अपने आप उगने वाली घास का वापस आना।
वन विभाग ने आगे बताया कि इस प्रयोग में इस्तेमाल किए गए प्लास्टिक के ड्रमों को आने वाले चरणों में हटाकर रीसायकल किया जाएगा, ताकि पर्यावरण के नियमों का पालन हो सके और यह पहल लंबे समय तक बनी रहे।
इस पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद, डीएसआईआरडीए ने धोलेरा एक्टिवेशन एरिया में इस पहल को 20 हेक्टेयर और जमीन पर फैलाने की मंजूरी दे दी है।
अगले चरण में, अधिकारियों को उम्मीद है कि वे इसी तकनीक का इस्तेमाल करके प्लांटेशन को और भी बड़े इलाके में फैला पाएंगे, जिसके तहत 50,000 से ज्यादा पौधे लगाने की योजना है।
यह प्रोजेक्ट धोलेरा में चल रहे औद्योगिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण को बेहतर बनाने के बड़े प्रयासो का एक हिस्सा है। धोलेरा को गुजरात में एक बड़े औद्योगिक और इंफ्रास्ट्रक्चर हब के तौर पर विकसित किया जा रहा है।
--आईएएनएस
एससीएच/पीएम
