वैश्विक व्यवस्था उभरती चुनौतियों के अनुरूप खुद को नहीं ढाल पाई: पीएम मोदी
नई दिल्ली, 22 अक्टूबर (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को कहा कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था और उसके संस्थान तेजी से बदलती दुनिया के साथ कदमताल करने में विफल रहे हैं। इसके कारण आज की वास्तविकताओं और पुराने पड़ चुके निर्णय लेने के तंत्र के बीच अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।
नई दिल्ली में एनडीटीवी वर्ल्ड समिट को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया इस समय बदलाव के दौर से गुजर रही है और एक ऐसी स्थिति में है, जिसे ‘व्यवस्थाओं के बीच की दुनिया’ कहा जा सकता है।
प्रधानमंत्री ने इस संदर्भ में दो प्रमुख सवाल उठाए। पहला, वैश्विक व्यवस्था में बदलाव क्यों हो रहा है और पुरानी व्यवस्था आज की चुनौतियों का सामना करने में क्यों सक्षम नहीं है? दूसरा, बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की क्या भूमिका होनी चाहिए?
वैश्विक व्यवस्था में बदलाव के कारणों पर बात करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि यह परिवर्तन स्वाभाविक होने के साथ-साथ अपरिहार्य भी है।
द्वितीय विश्व युद्ध से मिले सबक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि केवल ताकत और स्वार्थ पर आधारित वैश्विक व्यवस्था लंबे समय तक कायम नहीं रह सकती। संवाद, सहयोग और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान बेहद जरूरी हैं। इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी। हालांकि, उन्होंने कहा कि इसके बाद से दुनिया में व्यापक बदलाव हुए हैं। लोगों की आकांक्षाएं बदली हैं, नई आर्थिक शक्तियां और ताकतें उभरी हैं तथा तकनीक ने समाज, अर्थव्यवस्था और शक्ति की प्रकृति को पूरी तरह बदल दिया है। जिन देशों को मूल वैश्विक व्यवस्था तैयार करते समय जगह नहीं मिली थी, वे अब वैश्विक मंच पर अपना उचित स्थान मांग रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “सवाल यह है कि क्या वैश्विक व्यवस्था इन बदलावों के साथ कदमताल कर पाई है? इसका जवाब है- नहीं।” उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकार करते हुए कहा कि समकालीन चुनौतियों से निपटने में उनकी सीमाएं अब स्पष्ट रूप से सामने आ गई हैं।
पीएम मोदी ने कहा कि नई शक्तियां उभर रही हैं, नई आवाजें व्यवस्था में अपनी भागीदारी की मांग कर रही हैं और नई समस्याओं के लिए नए समाधानों की जरूरत है। जब दुनिया की वास्तविकताएं बदल जाती हैं, लेकिन निर्णय लेने के तंत्र स्थिर बने रहते हैं, तो बदलती वैश्विक परिस्थितियों और मौजूदा व्यवस्थाओं के बीच दूरी बढ़ने लगती है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज दुनिया ठीक इसी स्थिति का सामना कर रही है। उनकी इन टिप्पणियों में वैश्विक संस्थानों में सुधार की भारत की लंबे समय से चली आ रही मांग भी झलकी। भारत का जोर है कि इन संस्थानों को 21वीं सदी की जरूरतों के अनुरूप अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, समावेशी और जवाबदेह बनाया जाए, ताकि वे बदलती वैश्विक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सकें।
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