हिंदी दिवस विशेष: भाषा की ताकत इस बात में है कि उसके शब्द रोजमर्रा की जिंदगी में कितने जीवंत हैं- लेखक वसीम अकरम
नई दिल्ली, 15 सितंबर (आईएएनएस)। हिंदी दिवस के मौके पर भाषा के बदलते स्वरूप, हिंग्लिश के बढ़ते चलन और सोशल मीडिया पर हिंदी के लोकतांत्रिकरण को लेकर लेखक वसीम अकरम ने आईएएनएस से खास बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंशः
सवालः हिंदी से हिंग्लिश तक-क्या हम एक नई हिंदी के जन्म के दौर में हैं?
जवाबः भाषा हमेशा समय के साथ चलती है। जहां तक बात हिंदी के नए दौर की है तो ऐसा हर दौर में कहा जाता रहा है। जब भी हिंदी रचनाशीलता में कुछ नया प्रयोग होता है और वह लोगों को आकर्षित करता है तो उसे हिंदी का नया दौर कहा जाने लगता है। हालांकि मैं इसे हिंदी का नया जन्म जैसी संज्ञा नहीं दे सकता। ऐसे में हिंग्लिश भी हिंदी के बदलते स्वरूप का एक स्वाभाविक पड़ाव है। यह गलत नहीं है। या यूं कह लें कि हिंदी के लिए एक नया दौर है। इसलिए हमें नई पीढ़ी की भाषा को खारिज करने के बजाय उसमें हिंदी की मिठास और अपनी जड़ों से जुड़ाव बनाए रखना चाहिए। नई हिंदी वही होगी जो आधुनिक भी हो, सहज भी हो और अपनी पहचान पर गर्व भी करे।
सवाल- हिंदी गहरा समुद्र है, फिर भी जेन-जी, जैन-अल्फा, जैसे नए अन्य भाषी शब्द जन्म ले रहे हैं, उस दौर में हिंदी के शब्द ऐसे ट्रेंड में क्यों नहीं आ पाते हैं?
जवाबः हिंदी में शब्दों की कोई कमी नहीं है। कमी है उन्हें नए संदर्भों, नए माध्यमों और नई पीढ़ी की बातचीत में सहजता से पहुंचाने की। लेकिन अक्सर लोग इस बात को खारिज कर देते हैं कि हिंदी में नयापन नहीं है। दरअसल, शब्दों के प्रयोग के नए तरीकों से नई तरह की भाषा का जन्म होता है। चूंकि अंग्रेजी के शब्द बोलचाल में आसानी से जुबान पर उतर जाते हैं इसलिए जेन-जी जैसे शब्दों का प्रयोग बढ़ जाता है। इसमें गलत नहीं है। इसी तरह अगर हम अपने हिंदी शब्दों को रोचक तरीके से सोशल मीडिया, सिनेमा, संगीत और तकनीक से जोड़ें, तो वे भी ट्रेंड बना सकते हैं। भाषा की ताकत उसके शब्दकोश में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उसके शब्द लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में कितने जीवंत हैं।
सवालः आज भी उच्च पदों, न्यायपालिका और तकनीकी क्षेत्रों में अंग्रेजी का वर्चस्व है। ऐसे में हिंदी भाषी लोगों के लिए क्या संदेश होगा?
जवाबः अंग्रेजी सीखना जरूरी हो सकता है, लेकिन अपनी भाषा को कमतर समझना बिल्कुल जरूरी नहीं है। आज एआई जैसी अत्याधुनिक तकनीक भी भारत में हिंदी के भरोसे है। ऐसे में यह कहना कि अंग्रेजी का वर्चस्व ज्यादा है, यह उचित नहीं होगा। क्योंकि हम भले अंग्रेजी में बात कर लें, लिख लें लेकिन हम सोच तो सिर्फ हिंदी में ही सकते हैं। इसलिए हमें ऐसी व्यवस्था के लिए आवाज उठानी चाहिए, जहां हिंदी में पढ़ने, सोचने और काम करने वाले व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान मिले। अंग्रेजी ही क्यों, दूसरी भाषाएं भी सीखिए। भाषाओं में सोचने से वर्चस्व बढ़ता है। अपनी भाषा में आत्मविश्वास बनाए रखिए, क्योंकि भाषा ज्ञान की सीमा नहीं, ज्ञान तक पहुंचने का माध्यम है।
सवालः जब विश्व के अनेक नेता हिंदी शब्दों को चुनने लगे हैं। बहुत सारे यूट्यूबर आज हिंदी गानों या हिंदी डायलॉग्स को रील्स में इस्तेमाल कर रहे हैं। बावजूद इसके भारत के अंदर हिंदी का विरोध, हिंदी के नाम पर हिंसा और उससे बार-बार नकारना? आप कैसे देखते हैं?
जवाबः हिंदी अपने भीतर दूसरी भाषाओं के शब्दों को समेट लेती है और उसके प्रयोग का हिंदीकरण कर देती है, इसलिए लोगों को लगता है कि दूसरी भाषाओं का वर्चस्व ज्यादा है। ऐसा नहीं है। इससे तो हिंदी का ही सम्मान बढ़ता है। यहां यह बात लाजमी कहना चाहूंगा कि हिंदी का सम्मान बढ़ना खुशी की बात है, लेकिन किसी दूसरी भारतीय भाषा का अपमान करके हिंदी को मजबूत नहीं किया जा सकता। भारत की खूबसूरती ही इसकी बहुभाषिता है, इसलिए हिंदी को प्रेम और संवाद की भाषा बनना चाहिए, दबाव या टकराव की नहीं। हिंदी तभी सचमुच मजबूत होगी, जब वह दूसरी भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हुए पूरे देश को जोड़ने का काम करेगी।
सवालः क्या सोशल मीडिया ने हिंदी को ज्यादा लोकतांत्रिक बना दिया? पहले “सही हिंदी” का निर्धारण साहित्यकार, शिक्षक और संपादक करते थे। अब यूट्यूब, इंस्टाग्राम और एक्स पर करोड़ों लोग अपनी हिंदी गढ़ रहे हैं। क्या अब हिंदी का नया व्याकरण जनता लिख रही है?
जवाबः सोशल मीडिया ने हिंदी को किताबों और संस्थानों की सीमाओं से निकालकर करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की अभिव्यक्ति बना दिया है। कुछ साल पहले तक हम हिंदी रोमन इंगलिश में लिखते थे, लेकिन हिंदी की व्यापकता को देखते हुए टेक कंपनियों ने हिंदी फोंट को बढ़ावा दिया और आज देखिए कि सोशल मीडिया पर हर कोई हिंदी में ही लिखना चाहता है। इस तरह से आम जनता नए शब्द और नए मुहावरे गढ़ रही है, जिन्हें समय की कसौटी पर टिकने पर हिंदी अपना लेती है। हालांकि व्याकरण की भूमिका तो हर भाषा के लिए जरूरी होती है, लेकिन भाषा का भविष्य हमेशा उसके बोलने और बरतने वाले लोग ही तय करते हैं।
सवाल- अगर हिंदी लगातार दूसरी भाषाओं से शब्द लेती रही है, तो ‘शुद्ध हिंदी’ आखिर है क्या?
जवाबः शुद्धता का मानक एक बहस का विषय है। किसी को कुछ पसंद होता है तो किसी दूसरे को कुछ और पसंद आता है। उसी तरह से भाषा को बरतने के लिए भी लोग अपने-अपने नजरिये से शब्दों का चयन करते हैं। इसलिए मेरे लिए शुद्ध हिंदी वह नहीं है, जिसमें दूसरी भाषाओं का एक भी शब्द न हों, बल्कि वह है जिसमें विचार स्पष्ट, अभिव्यक्ति सहज और भाव सच्चे हों। शब्द तो अभिव्यक्त करने के लिए ही होते हैं। यदि हिंदी बोलते समय हम किसी और भाषा के किसी एक शब्द को बरतते हैं और सामने वाला उससे संतुष्ट हो जाता है तो यह भी भाषा की शुद्धता का एक मानक हो सकता है। लेकिन अगर हम शुद्ध हिंदी बोलें और किसी को समझ में ही न आए तो ऐसी शुद्धता भी किसी काम की नहीं है। हिंदी ने संस्कृत, फारसी, अरबी, तुर्की, अंग्रेजी और अनेक भारतीय भाषाओं से शब्द लेकर खुद को समृद्ध किया है। इसलिए हिंदी की खूबसूरती उसकी शुद्धता में नहीं, बल्कि उसकी उस उदारता में है, जो नए शब्दों को अपनाकर भी अपनी पहचान बनाए रखती है।
--आईएएनएस
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