हिंदी दिवस विशेष : बदलाव के हर दौर को समेटकर और भी मजबूत हो रही हमारी मातृभाषा
नई दिल्ली, 15 सितंबर (आईएएनएस)। हिंदी के लिए कहा जाता है कि वह 'सदा नीरा' है। इसका तात्पर्य है कि एक ऐसी नदी जो हमेशा बहती रहती है और अपने रास्तों से नए-नए शब्दों को समेटती चलती है। बीते दिन ही 14 सितंबर को 'हिंदी दिवस' मनाया गया है। आज, यह सवाल जनमानस से लेकर साहित्यकारों तक को मथ रहा है कि क्लासिक हिंदी और आधुनिक हिंदी के बीच का यह फासला कहीं भाषा का पतन तो नहीं है। आज की हिंदी में उर्दू, स्थानीय बोलियों के साथ-साथ अंग्रेजी और इंटरनेट स्लैंग की ऐसी घुसपैठ हुई है कि देवनागरी का संसार अब रोमन लिपि के कीपैड तक सिमटता दिख रहा है।
बदलते परिदृश्य के साथ मौजूदा समय में खान-पान, पहनावे से लेकर हिंदी भाषा में बदलाव देखने को मिला है। इसी संदर्भ में हमने पत्रकार एवं कवि प्रताप सोमवंशी से बातचीत की और हिंदी साहित्य में होने वाली चुनौतियों और संभावनाओं को लेकर बात की।
क्लासिक हिंदी और आधुनिक हिंदी के बीच का अंतर समझाते हुए प्रताप सोमवंशी कहते हैं कि एक आम वाक्य लीजिए कि "मैंने उसको कॉल किया था, लेकिन उसने पिक नहीं किया।" , यह कोई आधुनिक हिंदी नहीं है बल्कि यह खराब हिंदी है। भाषा विज्ञान की नजर से देखें, तो जब किसी वाक्य में केवल सहायक क्रिया (जैसे- किया था, रहा है) हिंदी की रह जाए और मुख्य क्रिया या संज्ञा अंग्रेजी की हो जाए, तो इसे भाषा का क्षरण ही माना जाएगा। अंग्रेजी शब्दों का यूं मिल जाना शायद इसलिए है क्योंकि हमने अंग्रेजी को रोजगार और अभिजात्य वर्ग की भाषा मान लिया है। आज स्थिति यह है कि अंग्रेजी न आने पर व्यक्ति शर्मिंदा होता है लेकिन हिंदी न आने पर वह गर्व से कहता है, "सॉरी, माय हिंदी इज वीक।" जब तक अपनी भाषा के प्रति यह 'गर्व' और 'शर्म' का पैमाना नहीं बदलेगा, हिंदी और हिंग्लिश के बीच का यह द्वंद्व जारी रहेगा।
आपने आम तौर पर कई लोगों को यह बात करते जरूर सुना होगा कि 'अगर हिंदी दूसरी भाषाओं से शब्द लेती रही है, तो आखिर 'शुद्ध हिंदी' क्या है?'
इस पर सोमवंशी कहते हैं कि 'शुद्ध हिंदी' जैसा कुछ है ही नहीं। एक वह हिंदी है जो छायावादी कवियों या संस्कृतनिष्ठ ग्रंथों में मिलती है और दूसरी वह जो हम आम बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं। राजभाषा का दर्जा मिलने के बावजूद, हिंदी को उसकी असली ताकत सरकारी फाइलों से नहीं बल्कि जनमानस और संस्कृति से मिली है। आज चुनौती यह है कि अपनी भाषा को छोड़ना केवल कुछ शब्दों को छोड़ना नहीं बल्कि अपनी 'सांस्कृतिक पहचान' को खो देना है। अवधी, भोजपुरी या मैथिली केवल बोलियां नहीं हैं बल्कि वे हमारी जड़ें हैं।
हिंदी साहित्य में भी एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला है। आज के साहित्य और वेब सीरीज में गालियों को एक स्वाभाविक संवाद के रूप में परोसा जा रहा है। तो ऐसे में लोगों के मन में सवाल उत्पन्न होता है कि "क्या साहित्य को समाज की इस कड़वी सच्चाई को ज्यों का त्यों दिखाने का अधिकार है?" इस पर प्रताप सोमवंशी कहते हैं कि यह लेखक की 'नीयत' (बोध) पर निर्भर करता है।
साहित्य में मर्यादा की सीमा कोई बाहरी संस्था तय नहीं कर सकती है। यह लेखक का अपना स्व-विवेक होता है। अगर कोई पात्र ऐसा है जिसकी पृष्ठभूमि में गाली देना स्वाभाविक है, तो वहां यथार्थवाद के नाम पर इसे स्वीकार किया जा सकता है। अगर सिर्फ सनसनी फैलाने, फैंटेसी रचने या आधुनिक दिखने के लिए गालियों को ठूंसा जा रहा है, तो यह साहित्य का नहीं बल्कि लेखक की सोच का पतन है। सबसे कठिन होता है 'सरल' होना। कबीर और तुलसीदास इसलिए महान नहीं बने क्योंकि उन्होंने क्लिष्ट भाषा लिखी बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने जनमानस की सरल भाषा में लिखा।
सोशल मीडिया और हिंदी भाषा पर बात करते हुए प्रताम सोमवंशी कहते हैं कि तकनीक ने अभिव्यक्ति को आसान तो किया है लेकिन इस जल्दबाजी में व्याकरण और भाषा के सौंदर्य की अनदेखी हो रही है। सोशल मीडिया ने संचार बढ़ाया है लेकिन साहित्य और भाषा की गहराई को 'कंटेंट' की भीड़ में कहीं खो दिया है।
आज हम हिंदी से 'हिंग्लिश' के जिस दौर से गुजर रहे हैं, वह शायद एक 'नई हिंदी' के जन्म का संक्रमण काल है। हिंदी की सबसे बड़ी चुनौती अब उसके अस्तित्व को बचाना नहीं है (क्योंकि इतने बड़े बाजार में हिंदी खत्म नहीं हो सकती) बल्कि उसकी 'सांस्कृतिक आत्मा' को बचाना है।
प्रताप सोमवंशी ने कहा कि हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम भाषा को थोपें नहीं बल्कि उसे अपनी जड़ों से जोड़कर रखें। हम अंग्रेजी जरूर बोलें लेकिन अपनी मातृभाषा को भी उतना ही सम्मान दें। जो समाज अपनी 'मां' (मातृभाषा) के सम्मान के लिए खड़ा नहीं हो सकता, उसका अपना कोई सम्मान नहीं बचता।
--आईएएनएस
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