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दिल्ली हाईकोर्ट ने टेरर केस में कश्मीरी अलगाववादी आसिया अंद्राबी की याचिका पर एनआईए से मांगा जवाब

नई दिल्ली, 3 अगस्त (आईएएनएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को कश्मीरी अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी की उस याचिका पर नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी से जवाब मांगा, जिसमें उन्होंने आतंकी साजिश के मामले में मिली उम्रकैद की सजा को चुनौती दी है।
 

नई दिल्ली, 3 अगस्त (आईएएनएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को कश्मीरी अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी की उस याचिका पर नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी से जवाब मांगा, जिसमें उन्होंने आतंकी साजिश के मामले में मिली उम्रकैद की सजा को चुनौती दी है।

जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और विकास महाजन की डिवीजन बेंच ने अंद्राबी की साथियों, सूफी फहमीदा और नाहिदा नसरीन की अपील पर एनआईए को नोटिस जारी किया है। इन दोनों ने ट्रायल कोर्ट द्वारा उन्हें सुनाई गई 30 साल की सजा को चुनौती दी है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने सजा पर रोक लगाने की दोषियों की अर्जी पर एंटी-टेरर एजेंसी से जवाब मांगा है और मामले की सुनवाई अक्टूबर में तय की है।

इस साल की शुरुआत में, दिल्ली की एक अदालत ने अंद्राबी को आतंकवादी गतिविधियों की साजिश रचने और भारत सरकार के खिलाफ जंग छेड़ने जैसे अपराधों के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जबकि फहमीदा और नसरीन को 30 साल की जेल की सजा दी थी।

सजा की अवधि पर आदेश सुनाते हुए, कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशन जज चंद्र जीत सिंह ने कहा था कि दोषियों के काम भारत के अस्तित्व पर चोट करते हैं और इनका मकसद देश के अभिन्न अंग जम्मू-कश्मीर को अलग करना था।

ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि दोषियों ने हिंसा से किनारा नहीं किया और मारे गए उग्रवादियों की तारीफ करके और अलगाववादी विचारधारा का प्रचार करके अप्रत्यक्ष रूप से इसे बढ़ावा दिया

अदालत ने कहा कि लोगों, खासकर युवाओं के मन में यह बात बैठाना कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है, ऐसी भावनाएं पैदा कर सकता है जिससे वे हिंसा सहित हर तरह के तरीके अपना सकते हैं।

यह मामला 2018 की एनआईए जांच से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अंद्राबी के नेतृत्व वाले प्रतिबंधित संगठन 'दुख्तरान-ए-मिल्लत' ने सोशल मीडिया, सार्वजनिक भाषणों और अन्य प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान में विलय की वकालत की थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों ने उग्रवादियों की तारीफ की, पत्थरबाजी जैसी गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए उकसाया और वीडियो, ऑनलाइन पोस्ट और रिकॉर्ड पर रखी गई अन्य सामग्री के जरिए 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' पर आधारित नैरेटिव को बढ़ावा दिया।

अंद्राबी को गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की विभिन्न धाराओं, जिनमें धारा 18 (आतंकवादी गतिविधियों की साजिश) और धारा 20 (आतंकवादी संगठन की सदस्यता) शामिल हैं। इसके तहत दोषी ठहराया गया था। इसके अलावा, उन्हें आईपीसी के तहत आपराधिक साजिश और राज्य के खिलाफ जंग छेड़ने जैसे अपराधों के लिए भी दोषी ठहराया गया था

फहमीदा और नसरीन को भी एंटी-टेरर कानून और आईपीसी की कई धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया था।

अंद्राबी ने 1987 में महिलाओं के अलगाववादी संगठन 'दुख्तरान-ए-मिल्लत' की स्थापना की थी, उन्हें अप्रैल 2018 में गिरफ्तार किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि उनकी गिरफ्तारी के बाद यह संगठन काफी हद तक निष्क्रिय हो गया था।

सजा सुनाए जाने के बाद, इस फैसले पर मिली-जुली राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आई। जहां भाजपा नेताओं ने इसे आतंकवाद के खिलाफ एक कड़ा संदेश बताया, वहीं नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता शेख बशीर ने कहा कि फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए क्योंकि यह उचित न्यायिक प्रक्रिया के बाद सुनाया गया था और अंद्राबी के पास ऊपरी अदालत में कानूनी उपाय अपनाने का विकल्प खुला था।

पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने अंद्राबी के साथ वैचारिक मतभेदों को मानते हुए भी मानवीय पहलुओं पर विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि अंद्राबी पहले ही कई साल जेल में बिता चुकी हैं और उन्होंने उनके मामले पर फिर से विचार करने की अपील की।

--आईएएनएस

डीकेएम/पीएम